Posted on Leave a comment

HCS Online Preparation | Sociology Study Material | Important Topics

HCS Online Preparation | Sociology Study Material | Important Topics

HCS Online Preparation | Sociology Study Material | Important Topics

Important Concepts-

महत्वपूर्ण अवधारणायें-

Sociological Imagination-

  • C. Wright Mills used the expression ‘the sociological imagination’ to demonstrate how sociological theories help us to see familiar situations in new ways or give us insights into unfamiliar situations.
  • According to Mills, the sociological imagination can help in differentiating between personal troubles and public issues. The sociological imagination is the ability to link our personal lives and experiences with our social world.
  • He tells how personal troubles occur within the ‘character of the individual and within the range of his immediate relationships with others’, whereas public issues are a ‘public matter- some values cherished by public which they feel are threatened’. According to Mills, an individual may be able to solve a trouble, but a public issue can only be resolved by society and its social structures. For ex., one person unemployed is his own personal trouble but unemployment on  a large level is a public issue.
  • The sociological imagination challenges the view that the problem is ‘natural’ or based on individual limitations.  It tells how the problem is rooted in society and emphasizes the structural bases of social problems. Individuals may have agency, the ability to make their own choices, but their actions and choices are regulated or limited by the realities of the social structure.
  • According to Jeanne Ballantine and Keith Roberts, sociologists examine the software and hardware of society.  The software is our culture that act as a guideline for living. A culture includes norms, values and beliefs. The hardware includes the social structures that bring order to our lives like positions that we occupy in society, social groups to which we belong and social institutions.

समाजवादी कल्पना-

  • सी. राइट मिल्स ने ‘समाजवादी कल्पना’ शब्द का प्रयोग यह दर्शाने के लिए किया है कि कैसे समाजवादी सिद्धांत परिचित परिस्थितियां नए तरह से देखने में हमें मदद करते हैं या अपरिचित परिस्थितियों में मार्ग दिखाते हैं |
  • मिल्स के अनुसार, समाजवादी कल्पना व्यक्तिगत समस्या और सार्वजानिक मामलों में अंतर करने में मदद कर सकती है | समाजवादी कल्पना हमारे व्यक्तिगत जिन्दगी और अनुभवों को हमारे सामाजिक दुनिया के साथ जोड़ने की क्षमता है |
  • वह बताते हैं कि कैसे व्यक्तिगत समस्याएं ‘एक व्यक्ति के चरित्र और उसके दूसरों के साथ निकट संबंधों के सीमा के अन्दर’ होती है, जबकि सार्वजनिक परेशानियां ‘सार्वजनिक मुद्दे हैं – कुछ ऐसी बातें जिन्हें लोग समझते हैं कि ये उनके लिए खतरा है’ | मिल्स के अनुसार, एक व्यक्ति एक समस्या का समाधान करने में सक्षम हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक समस्या का समाधान सिर्फ समाज और इसके सामाजिक सरंचना द्वारा ही हो सकता है | उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जो बेरोजगार है ये उसकी अपनी निजी समस्या है जबकि बड़े पैमाने पर बेरोजगारी एक सार्वजनिक समस्या है |
  • सामाजिक सोच को देखते हुए यह समस्या सामने आती है कि समस्या ‘प्राकृतिक’ है या निजी सीमाओं पर आधारित है | यह बताता है कि समस्या समाज में कैसे निहित है और सामाजिक समस्याओं का सरंचनात्मक आधार पर प्रभाव डालता है |व्यक्तियों में एजेंसी हो सकती है, अपनी पसंद बनाने की क्षमता हो सकती है, लेकिन उनके पसंद और कार्य सामाजिक सरंचना के वास्तविकता द्वारा सीमित या विनियमित होते हैं |
  • जेंने बेलेन्टाइन और कीथ रोबर्ट्स के अनुसार, समाजशास्त्री समाज के सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर की जांच करते हैं | सोफ्टवेयर हमारी संस्कृति है जो जीवनयापन के लिए दिशानिर्देश की तरह कार्य करती है | एक संस्कृति में अनुशासन, महत्त्व और विश्वास शामिल होते हैं | हार्डवेयर में सामाजिक सरंचना होती है जो हमारे जीवन में एक अनुशासन लाती है जैसे कि वे पद जो समाज में हम ग्रहण किये रहते हैं, वे सामाजिक समूह जिनमें हम शामिल रहते हैं और सामाजिक संस्थाएं |

Society-

  • Generally, Society consists of the intricate network of social relationships by which every human being is interconnected with his fellowmen.
  • Reciprocal recognition and commonness are the essential features of every social relationship. This reciprocal and mutual recognition, accompanied with feeling of ‘commonness’ may be the ‘conscience of kind’ as said by Giddings, the ‘we-feeling’ of Cooley, or a ‘common propensity’ of W.I. Thomas.
  • Society is a group of individuals held together by certain enduring relationships in the pursuance of common ends. The elements of unity, plurality, stability and community are the characteristics of a society.

HCS Online Preparation
समाज-

  • सामान्यतः, समाज सामाजिक रिश्तों के एक जटिल जाल से बना होता हुआ है जिससे हर इंसान अपने प्रियजनों से जुड़ा हुआ है |
  • पारस्परिक मान्यता और समानता हर सामाजिक रिश्ते के अनिवार्य विशेषताएं हैं | यह पारस्परिक और आपसी पहचान, ‘समानता’ के अहसास से जुड़ी होती है, या जैसा कि गिदिंग्स ने कहा है कि ‘विवेक की तरह’ या कोली के ‘हम-भावना’ या डबल्यू. आई. थॉमस के ‘समान प्रवृत्ति’ से जुड़ी हो सकती है |
  • समाज सामान्य अंत के अनुसरण में कुछ स्थायी संबंधों द्वारा साथ जुड़े हुए व्यक्तियों का एक समूह है | समाज की विशेषता एकता, बहुलता, स्थिरता और समुदाय के तत्व हैं 

Features of Society necessary to understand social theory:

  • Society consists of the social institutions and social relationships that are both concrete and abstract at the same time. Some features of society are necessary to understand social theory.
  • It is the abstract nature of much of society and our experiences in society that necessitates the need for social theory.
  • Another feature of society necessary for theorizing it is that it is patterned, i.e., society and humans living in it follow routines and have regularities that are open to theorizing by sociologists.

समाज की विशेषताएं जो सामाजिक सिद्धांत समझने के लिए अनिवार्य हैं :

  • समाज में सामाजिक संस्थाएं और सामाजिक रिश्तें हैं जो कि एक ही समय पर ठोस और सार दोनों हैं | समाज की कुछ विशेषताएं सामाजिक सिद्धांत को समझने के लिए आवश्यक हैं |
  • समाज की दूसरी विशेषता जो सिद्धांत निर्माण करने के लिए आवश्यक है कि यह एक निश्चित प्रर्रूप वाली है, अर्थात् इसमें रहने वाले समाज और इंसान एक समान दिनचर्या का पालन करते हैं और उनकी नियमितता होती हैं जो कि समाजशास्त्रियों द्वारा सिद्धांत निर्माण करने के लिए स्वतन्त्र होती हैं |

Sociology Theory-

Theory:

A sociological theory is a set of ideas which explains how society or aspects of society work.

Features of theory:

  • It is a generalized statement about a social phenomenon.
  • It tries to explain social phenomenon citing reasons why differences occur in society and why changes are occurring. It helps in predicting future patterns and influencing social policies to benefit society.
  • Theoretical statements should be allowed to be checked by others who are not involved in their development.

The subject matter of social theory:

  • The subject matter of social theory is human society and the related social activities.
  • For sociologists and social theorists, it is the patterns of social interactions between social actors and how these are affected by social contexts that matters. Social theory is involved in identifying and describing the elements that make up social interaction (social actors, contexts, practices) and developing sensible propositions about the dynamic processes taking place between them.

समाजवादी सिद्धांत-

सिद्धांत :

एक समाजवादी सिद्धांत विचारों का एक सेट है जो यह वर्णन करता है कि किस समाज या उनके पहलू कार्य करते हैं |

सिद्धांत की विशेषताएं :

  • यह एक सामाजिक स्थिति के बारे में सामान्यीकृत विवरण है |
  • यह सामाजिक घटनाओं का हवाला देते हुए बताने की कोशिश करता है कि समाज में क्यों अंतर पैदा होती हैं और क्यों परिवर्तन होते हैं | यह भविष्य के पैटर्न का पूर्वानुमान करने और समाज के हित के लिए सामाजिक नीतियों को प्रभावित करने में मदद करता है |
  • सैद्धांतिक विवरणों को उन अन्य व्यक्तियों द्वारा जांचा जाने की अनुमति मिलनी चाहिए जो इनके निर्माण में शामिल नहीं हैं |

सामाजिक सिद्धांत की विषय-वस्तु :

  • सामाजिक सिद्धांत की विषय-वस्तु मानव समाज और सम्बंधित सामाजिक गतिविधियाँ हैं |
  • समाजशास्त्रियों और सामाजिक सिद्धान्तवादियों के लिए, यह सामाजिक व्यक्तियों के बीच सामाजिक सम्बन्ध का प्रारूप है और यह है कि कैसे ये सामाजिक सन्दर्भों से प्रभावित होते हैं,  बस महत्वपूर्ण है | सामाजिक सिद्धांत उन तत्वों की पहचान और वर्णन करने में शामिल है जो सामाजिक संपर्क (सामाजिक अभिनेता, सन्दर्भों, प्रथाओं ) का निर्माण करते हैं और इनके बीच होने वाले गतिशील प्रक्रियाओं के बारे में समझदारी भरा प्रस्तावों का विकास करते हैं |

 

 

Join Frontier IAS Online Coaching Center to prepare for UPSC/HCS/RAS Civil Service comfortably at your home at your own pace/time.

HCS(Prelims+Mains+Interview)   HCS Prelims(Paper 1+Paper 2)

IAS+HCS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    

  RAS+IAS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    RAS(Prelims+Mains+Interview)     RAS Prelims     UPSC IAS Prelims      UPSC  IAS (Prelims+Mains+Interview)

Click Here to subscribe Our YouTube Channel

Posted on Leave a comment

Mission HCS Sociology | Online Study Content | Exam Preparation 2018

Mission HCS Sociology | Online Study Content | Exam Preparation 2018

Mission HCS Sociology | Online Study Content | Exam Preparation 2018

Weber – Ideal Types-

  • While social science is value relevant, it must also be value-neutral, according to Weber. Weber stresses that there is a fundamental difference between “existential knowledge” and “normative knowledge”. Every person has his values and the choice of these values is always subjective. Consequently, science can never state an opinion on “true” values, but must rather limit itself to analyzing the effects of various actions.

Ideal Types:

  • To solve the problem of the relationship of science to values and the value-neutrality of science. Weber developed ideal-type methodology.
  • Weber states that social reality by its very nature is infinitely complex and cannot be comprehended in its totality by the human mind. Therefore, selectivity is unavoidable and in order to exercise selectivity sociologists should build “ideal types”.
  • There is a reality gap between the ideas and concepts used by social theorists and the really real world, which they try to explain. Weber suggested that this could be advantageous. Given that we are free to make up whatever concepts we like, it might be useful for social theorists to develop concepts that represent the purest form, or ‘ideal type’, of a particular phenomenon. Ex., Sociologists have developed the ideal-typical descriptions of ‘nuclear family’ and ‘extended family’ as part of their methodology.
  • Ideal types provide a way of conceptualising differences even if the ideal type is never obtained in its pure form. Weber uses the technique of ideal type in his own analysis of social action, religious ideology, and authority specifically bureaucracy.
  • An ideal type is a mental construct that the investigator uses to approach the complex reality, and its utility lies in its “success in revealing concrete phenomena in their interdependence, their causal conditions and their significance”.
  • The investigator arrives at the ideal type through “the one-sided accentuation of one or more point of view and by the synthesis of a great many diffuse, discrete, more or less present and occasionally absent concrete individual phenomena, which are arranged according to those one-sidedly emphasized viewpoints into  a unified analytical construct”.
  • An ideal type is an analytical construct that serves the investigator as a measuring rod to ascertain similarities as well as deviations in concrete cases.
  • It is a mental construct, an organization of intelligible relations within a historical entity, formed by exaggerating certain essential features of a given phenomenon so that no case of that phenomenon falls within the definitional framework. Ideal types do not and cannot mirror the reality faithfully. Ex., as constructed by Weber, the ideal type of capitalism did not fully describe any of the various types of capitalism – mercantile, entrepreneurial etc.
  • For Weber, an ideal type is strictly a “methodological device”. The ideal type is a rational grid for logical observation and analysis.
  • Weber uses his ideal-type methodology in part to reject the idea that science can capture reality “as it is objectively”. As a Neo-Kantian, Weber believed that concepts (ideal types) are always creations of human reason that never have a counterpart in reality. This also applies to the “laws”. When Weber discusses Marx he says the laws Marx and the Marxists thought they had found in history and in bourgeois society were actually nothing but ideal types. As ideal types, they have an important significance if they are used in a comparison with reality, but according to Weber they are actually dangerous if we believe that they are empirically valid.

Mission HCS Sociology
वेबर- आदर्श भेद-

  • जहाँ सामाजिक विज्ञान मूल्यपरक है, वेबर के अनुसार इसे मूल्य-तटस्थ भी होना चाहिये | वेबर ने इस बात पर जोर डाला कि “अस्तित्ववान ज्ञान” और “मानक ज्ञान” के बीच एक मूल अंतर है | प्रत्येक व्यक्ति के अपने मूल्य होते हैं और इन मूल्यों का चयन हमेशा व्यक्तिपरक होता है | परिणामस्वरूप, विज्ञान “सत्य” मूल्यों पर कोई भी अपना पक्ष नहीं रख सकता है, लेकिन खुद को विभिन्न कार्यों के प्रभावों के विश्लेषण तक सीमित रखना चाहिए |

आदर्श भेद :

  • मूल्य और विज्ञान के मूल्य-तटस्थता के प्रति विज्ञान के सम्बन्ध की समस्या के समाधान के लिए वेबर ने आदर्श भेद प्रणाली विज्ञान को विकसित किया |
  • वेबर ने बताया कि सामाजिक वास्तविकता अपनी प्रकृति में अनंत रूपी जटिल है और मानव मन द्वारा इसकी सम्पूर्णता में समझाई नहीं जा सकती | इसलिए चयनात्मकता अपरिहार्य है और चयनात्मकता के निष्पादन के क्रम में समाजशास्त्रियों को “आदर्श भेद” बनाना चाहिए |
  • सामाजिक सिद्धान्तवादियों और वास्तविक असली दुनिया द्वारा प्रयोग किये जाने वाले विचारों व धारणाओं, जिन्हें वे वर्णित करने की कोशिश करते हैं, के बीच एक वास्तविकता अंतर है | वेबर ने सुझाव दिया कि यह लाभप्रद हो सकता है | यह देखते हुए कि हम अपनी पसंद के धारणाओं को बनाने के लिए स्वतन्त्र है, जो कि एक विशेष घटना के शुद्धतम रूप या “आदर्श प्रकार” को प्रतिनिधित्व करने वाली धारणाओं को विकसित करने में सामाजिक सिद्धान्तकारों के लिए सहयोगी हो सकता है | उदाहरण; समाजशास्त्रियों ने अपनी प्रणाली विज्ञान के हिस्से के रूप में ‘एकल परिवार’ और ‘विस्तृत परिवार’ के आदर्श-विशिष्ट विवरण विकसित किये हैं |
  • आदर्श प्रकार अंतरों को संकल्पनाकृत करने के तरीके को प्रदान करता है भले ही आदर्श प्रकार अपने शुद्ध रूप में नहीं प्राप्त किया गया हो | वेबर आदर्श प्रकार के तकनीक का प्रयोग सामाजिक क्रिया, धार्मिक विचार और विशेष रूप से नौकरशाही प्राधिकार के अपने विश्लेषण में प्रयोग करते हैं |
  • एक आदर्श प्रकार मानसिक निर्माण है जो एक जांचकर्ता जटिल वास्तविकता से संपर्क बनाने के लिए प्रयोग करता है और इसका उपयोग “उनकी परस्पर निर्भरता, उनकी कारणीय परिस्थितियों और उनके महत्त्व में ठोस घटनाओं में इसकी सफलता प्रकट करने” में निहित है |
  • जांचकर्ता “एक या अधिक दृष्टिकोण के एक तरफ़ा बल और एक अधिक फ़ैल, असतत, करीब-करीब और कभी कभी अनुपस्थित ठोस व्यक्तिगत घटनाओं के संश्लेषण, जिन्हें एक तरफ़ा जोर डाली गई दृष्टिकोणों के अनुसार  एकीकृत विश्लेषणात्मक निर्माण में व्यवस्थित किया जाता है” द्वारा आदर्श प्रकार पर आते हैं |
  • एक आदर्श प्रकार एक विश्लेषणात्मक निर्माण है जो जांचकर्ता को एक मापन माध्यम के रूप में ठोस मामलों में विचलनों के साथ साथ समानताओं को प्राप्त करने में सहयोग करता है |
  • यह एक मानसिक निर्माण है, एक एतिहासिक इसकी के भीतर सुगम संबंधों का एक संगठन है, जो एक दिए हुए घटना के कुछ अनिवार्य विशेषताओं को अतिशयोक्ति कर निर्मित होता है ताकि पारिभाषिक ढाँचे के भीतर इस घटना का कोई भी मामला न आये | आदर्श प्रकार ईमानदारी से वास्तविकता का न तो दर्पण बनाते हैं और न बना सकते हैं | उदाहरण; वेबर अनुसार निर्मित , पूंजीवाद का आदर्श प्रकार ने पूंजीवाद के विभिन्न प्रकारों – व्यापारिक, उद्यमशीलता इत्यादि में से किसी को भी पूर्ण रूप से वर्णित नहीं किया |
  • वेबर के लिए, एक आदर्श प्रकार एक दृढ “पद्धतिगत उपकरण” है | आदर्श प्रकार तार्किक अवलोकन और विश्लेषण के लिए एक विवेकी ग्रिड है |
  • वेबर अपने आदर्श-प्रकार प्रणाली विज्ञान का प्रयोग उस विचार को अस्वीकार करने में प्रयोग करते हैं कि विज्ञान वास्तविकता को बता सकता है “क्योंकि यह निष्पक्ष है” | एक नव-कान्तियन के रुप में, वेबर का विश्वास था कि धारणाएँ (आदर्श प्रकार) हमेशा मानव कारण के सृजन रहे हैं जिसका वास्तविकता में कोई कभी कोई प्रतिरूप नहीं होता है | यह “नियमों” पर भी लागू होता है | जब वेबर मार्क्स की चर्चा करते हैं, उनका कहना है मार्क्स और मार्क्सवादियों ने जिन नियमों को सोचा कि उन्होंने इसे इतिहास और श्रमजीवी समाजों में पाया है वे और कुछ नहीं सिर्फ आदर्श प्रकार थे | आदर्श प्रकार के रूप में, यदि वास्तविकता के साथ एक तुलना में उनका प्रयोग किया जाता है तो इनकी एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन वेबर के अनुसार ये वास्तविक रूप में खतरनाक है यदि हम ये विश्वास करे कि ये अनुभवजन्य रूप से वैध है |

Important elements of Weber’s methodology:

  • The methodology of sociology consists in building ideal types of social behaviour and applying Verstehen method to explain this. Weber’s general conception of the nature of social reality influenced other approaches. The origin of symbolic interactionism can be traced to Max Weber’s argument that people act according to their interpretation of the meaning of their social world. Alfred Schutz was inspired by the ideas of Max Weber. He contributed to the rise of phenomenological approach which gave rise to ethnomethodological approach in sociology.
  • Causal pluralism – The social reality is very complex and therefore no social phenomena can be explained adequately in terms of a single cause.
  • Weber also stresses on the value-neutrality of social science methodology. He argues that since social science deals with phenomena that are value-laden, the researcher, both in choosing what to study and in reporting his findings, has to be aware of his own value and of the value-content of the phenomenon she is researching.
  • Weber notes that values are not objective material entities and cannot be assessed, measured or compared in an entirely logical and dispassionate way. Social-theoretical knowledge is the product of subjective judgement, is partial and selective, and, in at least some respects, arbitrary.

वेबर की प्रणाली विज्ञान के महत्वपूर्ण तत्व :

  • समाजशास्त्र की प्रणाली विज्ञान सामाजिक व्यावहार के आदर्श प्रकार के निर्माण में और इसको व्याख्या करने के लिए वेर्सेहें प्रणाली को लागू करने में निहित है | वेबर की सामाजिक वास्तविकता की प्रकृति के सामान्य अवधारणा अन्य दृष्टिकोणों से प्रभावित होती हैं | प्रतीकात्मक परस्परवाद के मूल को मैक्स वेबर के इस तर्क में ढूंढा जा सकता है कि लोग ओने सामाजिक दुनिया के अर्थ के अपने व्याख्या के अनुसार कार्य करते हैं | अल्फ्रेड शुत्ज़ मैक्स वेबर के विचारों से प्रभावित थे | उन्होंने अभूतपूर्व दृष्टिकोण के उदय में योगदान दिया जिसने समाजशास्त्र में नृवंशविज्ञान दृष्टिकोण को जन्म दिया |
  • कारणीय बहुलता : सामाजिक वास्तविकता अत्यधिक जटिल है और इसलिए एक एकल कारण के संदर्भ में किसी सामाजिक घटना को नहीं वर्णित किया जा सकता |
  • वेबर ने सामाजिक विज्ञान कार्यप्रणाली के मूल्य-तटस्थता पर भी जोर दिया | उनका तर्क है कि चूँकि सामाजिक विज्ञान उन घटनाओं से समबन्धित होता है जो कि मूल्य-लादेन है, शोधकर्ता को अध्ययन करने योग्य विषय को चयन करने में और उसके निष्कर्षों को रिपोर्ट करने में उसके स्वयं के महत्त्व के और उस घटना, जिसका वह अध्ययन कर रही है, के मूल्य-सामग्री के बारे में पता होना चाहिए |
  • वेबर इस बात को महत्वपूर्ण बताते हैं कि मूल्य निष्पक्ष भौतिक इकाई नहीं हैं और इनका पूरी तरह तर्कसंगत और निपुण तरीके से मूल्याङ्कन, मापन या तुलना नहीं किया जा सकता है | सामाजिक-सैद्धांतिक ज्ञान व्यक्तिपरक निर्णय का उत्पाद है, आंशिक और चयनात्मक है और कुछ मामलों में कुछ हद तक कम से कम मनमाना हैं |

 

Join Frontier IAS Online Coaching Center to prepare for UPSC/HCS/RAS Civil Service comfortably at your home at your own pace/time.

HCS(Prelims+Mains+Interview)   HCS Prelims(Paper 1+Paper 2)

IAS+HCS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    

  RAS+IAS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    RAS(Prelims+Mains+Interview)     RAS Prelims     UPSC IAS Prelims      UPSC  IAS (Prelims+Mains+Interview)

Click Here to subscribe Our YouTube Channel

 

 

Posted on Leave a comment

Sociology Online Study Notes | HCS RAS PCS Exam Preparation 2018

Sociology Online Study Notes | HCS RAS PCS Exam Preparation 2018

Sociology Online Study Notes | HCS RAS PCS Exam Preparation 2018

Qualitative and Quantitative Methods-

Sociologists can be identified as:

  • Positivists:

Sociologists who advocated the use of scientific and also quantitative methods. Ex., Auguste Comte, Herbert Spencer, Durkheim etc.

  • Anti-Positivists:

Sociologists who advocated the use of more humanistic and qualitative methods.

गुणात्मक एवं मात्रात्मक विधियाँ

समाजशास्त्रियों को वर्गीकृत किया जा सकता है :

  • प्रत्यक्षवादी :

वे समाजशास्त्री जिन्होंने वैज्ञानिक तथा साथ ही मात्रात्मक विधियों के उपयोग की वकालत की | उदाहरण – आगस्त कॉम्त, हरबर्ट स्पेंसर, दुर्खीम आदि |

  • गैरप्रत्यक्षवादी :

वे समाजशास्त्री जिन्होंने अधिक मानवतावादी तथा गुणात्मक विधियों के प्रयोग की वकालत की |

Quantitative Methods-

Features of Quantitative research in sociology:

  • Comte being a positivist, believed that the scientific study of society should be restricted to collecting information about phenomena that can be objectively observed. He asserted that sociologists should not be concerned with feelings, emotions of people as these only exists in consciousness and they cannot be observed. Durkheim argued that social facts should be treated as ‘things’. It implies that the belief systems, customs and institutions of society should be considered as things in a similar manner as the objects of the natural world.
  • Positivists advocate the use of statistical data. Since it is possible to classify the social world in an objective way, it is also possible to count sets of observable social facts and so produce statistics. For ex., Durkheim collected data on social facts such as the suicide-rate and membership of different religions.
  • Positivist methods tries to establish correlations between different social facts. Durkheim, in his study of suicide, found an apparent correlation between a particular religion, Protestantism and a high suicide rate.
  • The quantitative research methods try to establish causal relationship between variables. If there is a strong correlation between two or more types of social phenomena, then a positivist sociologist might suspect that one of these phenomena was causing the other to take place. Ex., Durkheim, in his study of suicide, explained that low solidarity among the Protestants was the causal factor for high suicide rate amongst them.
  • Generalization- Quantitative methods are concerned with establishing the result of a particular investigation which can be generalized to the larger population. Positivists like Comte, Durkheim believed that just as natural sciences could arrive at universal laws with regard to matter, similarly laws of human behaviour can also be discovered in social sciences.
  • Replicability- Positivism views science as using a mainly inductive methodology. An inductive methodology starts by collecting the data. The data are then analysed and then theories are developed. Once the theory has been developed, it can be tested against other sets of data to see if it is confirmed or not. If it is repeatedly confirmed (replicated), then positivists assume that they have discovered a law of human behaviour.
  • Fred Kerlinger said “There’s no such thing as qualitative data. Everything is either 1 or 0”.

Sociology Online Study Notes
 

 मात्रात्मक विधियाँ-

समाजशास्त्र में मात्रात्मक अनुसंधान की विशेषताएं :

  • एक प्रत्यक्षवादी होने के नाते कॉम्त का यह मानना था कि समाज का वैज्ञानिक अध्ययन उस घटना के बारे में सुचना एकत्रित करने तक सीमित होना चाहिए जो निष्पक्ष रूप से देखी जा सकती है | उन्होंने जोर दिया कि समाजशास्त्रियों को लोगों की भावनाओं से चिंतित नहीं होना चाहिए क्योंकि वे केवल चेतना में मौजूद हैं तथा उन्हें देखा नहीं जा सकता है | दुर्खीम ने यह तर्क दिया कि सामाजिक तथ्यों को “चीजों” के रूप में मानना चाहिए | इसका अर्थ है कि आस्था प्रणालियाँ, रीति-रिवाज तथा समाज के संस्थानों को ऐसी वस्तुएं मानना चाहिए कि मानों वे प्राकृतिक दुनिया की वस्तुएं हों |
  • प्रत्यक्षवादी सांख्यिकीय आंकड़ो के उपयोग की वकालत करते हैं | चूँकि सामाजिक दुनिया को वस्तुओं के रूप में वर्गीकृत करना संभव है, अतः प्रत्यक्ष सामाजिक तथ्यों के समुच्चय की गणना तथा इस प्रकार आंकड़े तैयार करना भी संभव है | उदाहरण के लिए, दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों पर आंकड़ों को इकठ्ठा किया, जैसे कि आत्महत्या-दर तथा विभिन्न धर्मों की सदस्यता |
  • प्रत्यक्षवादी विधियाँ विभिन्न सामाजिक तथ्यों के बीच सह-सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयत्न करती हैं | दुर्खीम ने अपने आत्महत्या वाले अध्ययन में एक विशेष धर्म, प्रोटोस्टेंट धर्म तथा उच्च आत्महत्या दर के बीच एक स्पष्ट सह-सम्बन्ध पाया |
  • मात्रात्मक अनुसंधान विधियाँ चरों के बीच एक करणीय सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास करती हैं | यदि किसी दो या दो से अधिक प्रकारों की  सामाजिक घटनाओं के बीच एक मजबूत सहसंबंध है, तो कोई प्रत्यक्षवादी समाजशास्त्री को यह संदेह हो सकता है कि इनमें से कोई एक घटना दूसरी घटना के होने के कारण पैदा कर रही थी | उदाहरण – दुर्खीम ने अपने आत्महत्या वाले अध्ययन में, यह वर्णन किया कि प्रोटोस्टेंट धर्म वालों की निम्न एकजुटता उनके उच्च आत्महत्या दर की करणीय कारक थी |
  • सामान्यीकरण : मात्रात्मक विधियाँ एक विशेष जांच के परिणाम की स्थापना से सम्बंधित हैं जिसे बड़ी आबादी के लिए सामान्यीकृत किया जा सकता है | कॉम्त तथा दुर्खीम जैसे प्रत्यक्षवादियों का यह मानना था कि जिस प्रकार प्राकृतिक विज्ञान पदार्थ के सम्बन्ध में सार्वभौमिक नियमों तक पँहुच सका, उसी प्रकार सामाजिक विज्ञानों में मानव व्यवहार के भी नियम खोजे जा सकते हैं |
  • प्रतिकृतिता-  प्रत्यक्षवाद विज्ञान को मुख्य रूप से एक प्रेरक कार्यप्रणाली का प्रयोग करते हुए देखता है | एक प्रेरक कार्यप्रणाली आंकड़ों को संगृहित करने से शुरू होती है | इन आकड़ों का तब विश्लेषण किया जाता है तथा फिर सिद्धांत विकसित होते हैं | एक बार जब सिद्धांत विकसित हो गया हो, तो यह आकड़ों के अन्य समुच्चयों के साथ भी यह देखने के लिए जांचा जा सकता है कि यह पुष्टिकृत है या नहीं | यदि यह बार बार पुष्टिकृत (प्रतिरूपित )  होता है, तो प्रत्यक्षवादी यह मान लेते हैं कि उन्होंने मानव व्यवहार के एक नियम की खोज की है |
  • फ्रेड कर्लिंगर ने कहा था “गुणात्मक डाटा जैसी कोई चीज नहीं है | हर चीज या तो है या”  

Qualitative Methods-

  • Qualitative research includes study of the social world which seeks to describe and analyse the culture and behaviour of humans and their groups from the point of view of those who are being studied.
  • The qualitative data is richer, more vital having greater depth and more likely to present a true picture of a way of life, of people’s experiences, attitudes and beliefs.
  • Participant observation, unstructured interview, focus group discussion, case study are major techniques of data collection in qualitative research.

Features of qualitative research in sociology:

  • Qualitative research describes social reality, i.e., it views events, actions, norms, values etc from the perspective of the people being studied.
  • It prefers contextualism to understand events, behaviour etc. in their respective context. It is almost inseparable from another theme in qualitative research namely ‘holism’ – to examine social entities as wholes to be analysed and understood in their entirety.
  • Qualitative research views social life in processual, rather than static terms. It implies social order is interconnected and changing which reflects the reality of everyday life.
  • Qualitative researchers favour open and unstructured research strategy. It provides them flexibility to view unexpectedly important topics and increase their scope of study.

गुणात्मक विधियाँ-

  • गुणात्मक अनुसंधान में सामाजिक दुनिया का अध्ययन शामिल है जो अध्ययन किये जा रहे लोगों के दृष्टिकोण से मनुष्यों तथा उनके समूहों की संस्कृति तथा व्यवहार को परिभाषित एवं विश्लेषित करने का प्रयास करता है |
  • गुणात्मक आंकड़े प्रचुर, अधिक महत्वपूर्ण तथा अधिक गहराई वाले होते हैं तथा उनमें जीवन व्यतीत करने के तरीके, लोगों के अनुभव, विचार तथा आस्था की सच्ची तस्वीर पेश करने की अधिक संभावना होती है |
  • सहभागी अवलोकन, असंरचित साक्षात्कार, केन्द्रित सामूहिक चर्चा, केस स्टडी,  आदि गुणात्मक अनुसंधान में आंकड़े संगृहित करने की प्रमुख तकनीकें हैं |

समाजशास्त्र में गुणात्मक अनुसंधान की विशेषताएं :

  • गुणात्मक अनुसंधान समाज की वास्तविकता को बयां करता है | अर्थात् यह घटनाओं, क्रियाओं, नियमों, मूल्यों, आदि को अध्ययन किये जा रहे लोगों की दृष्टिकोण से देखता है |
  • यह उनके संबंधित संदर्भ में घटनाओं, व्यवहार आदि को समझने के लिए सन्दर्भवाद को पसंद करता है। यह गुणात्मक अनुसंधान में एक और विषय साकल्यवाद से लगभग अविभाज्य है | सकल्यवाद – सामाजिक संस्थाओं की   उनकी समग्रता में समष्टियों के रूप में विश्लेषित करने तथा समझने हेतु जांच करना |
  • गुणात्मक अनुसंधान सामाजिक जीवन को स्थिर के बजाय प्रक्रियात्मक रूप में देखते हैं | इसका अर्थ है कि सामाजिक क्रम परस्पर जुड़े हुए हैं तथा परिवर्तित हो रहे हैं, जो हर रोज के जीवन की वास्तविकता को दर्शाता है |
  • गुणात्मक शोधकर्ता खुली और असंरचित अनुसंधान रणनीति का समर्थन करते हैं। यह उन्हें अप्रत्याशित रूप से महत्वपूर्ण विषयों को देखने और अध्ययन के क्षेत्र में वृद्धि करने के लिए लचीलापन प्रदान करता है।

Combination of both Approaches-

Some sociologists have advocated combining both quantitative and qualitative methodology.

Alan Bryman has suggested some ways in which a plurality of methods (a practice known as triangulation) can be useful.

  • Quantitative and qualitative data can be used to check the accuracy of the conclusions drawn on the basis of each of them.
  • Qualitative research can be used to produce hypotheses which can then be checked using quantitative methods.
  • Both of them can be used together to produce a complete picture of the social group being studied.
  • Qualitative research may be used to explain why certain variables are statistically correlated. Ex., Durkheim, in his study of suicide, concluded that the rate of suicide varies from religion to religion because of their varying degree of solidarity.
  • Bryman believes that neither quantitative nor qualitative research can produce totally valid and completely reliable data, but both can provide useful insights into social life. Quantitative data tends to produce rather static pictures, but it can allow researchers to examine and discover overall patterns and structures in a society as a whole. Qualitative data allow in-depth understanding of the process of change in social life.

दोनों दृष्टिकोणों का संयोजन-

कुछ समाजशास्त्रियों ने मात्रात्मक तथा गुणात्मक दोनों पद्धतियों को संघटित करने की वकालत की है |

एलन ब्रायमैन ने कुछ तरीके सुझाए हैं जिसमें विधियों की अनेकता ( एक पद्धति जिसे त्रिभुजन के नाम से जाना जाता है ) उपयोगी हो सकती है |

  • मात्रात्मक तथा गुणात्मक आंकड़े उनमें से प्रत्येक के आधार पर निकाले गए निष्कर्षों की सटीकता को जांचने हेतु उपयोग किये जा सकते हैं |
  • गुणात्मक अनुसंधान का इस्तेमाल परिकल्पना का निर्माण करने के लिए किया जा सकता है, जिसे फिर मात्रात्मक  विधियों का उपयोग करके जांचा जा सकता है |
  • दोनों का उपयोग एकसाथ अध्ययन किये जाने वाले सामाजिक समूह की पूरी तस्वीर का निर्माण करने के लिए किया जा सकता है |
  • गुणात्मक अनुसंधान का इस्तेमाल यह बताने के लिए किया जा सकता है कि क्यों कुछ चर सांख्यिकीय रूप से सहसम्बद्ध होते हैं | उदाहरण – दुर्खीम ने अपने आत्महत्या वाले अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला कि एकजुटता के परिमाण में भिन्नता होने के कारण एक धर्म से दूसरे धर्म की आत्महत्या दर में भिन्नता पायी जाती है |
  • ब्रायमैन यह मानते हैं कि ना तो मात्रात्मक ना ही गुणात्मक अनुसंधान पूर्ण रूप से मान्य तथा भरोसेमंद आंकड़े का निर्माण कर सकता है, किन्तु दोनों सामाजिक जीवन में उपयोगी अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकते हैं | मात्रात्मक आंकड़े कुछ कुछ स्थिर तस्वीर का निर्माण करते हैं किन्तु ये अनुसंधानकर्ताओं को एक समष्टि के रूप में किसी समाज में सभी प्रारूपों एवं संरचनाओं की जांच तथा खोज करने की अनुमति देते है | गुणात्मक आंकड़े सामाजिक जीवन में परिवर्तन की प्रक्रिया को गहराई से समझने में सहायता करते हैं |

 

Join Frontier IAS Online Coaching Center to prepare for UPSC/HCS/RAS Civil Service comfortably at your home at your own pace/time.

HCS(Prelims+Mains+Interview)   HCS Prelims(Paper 1+Paper 2)

IAS+HCS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    

  RAS+IAS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    RAS(Prelims+Mains+Interview)     RAS Prelims     UPSC IAS Prelims      UPSC  IAS (Prelims+Mains+Interview)

Click Here to subscribe Our YouTube Channel

Posted on Leave a comment

HCS Sociology Online Exam || Study Content 2018 || Exam Preparation

HCS Sociology Online Exam || Study Content 2018 || Exam Preparation

HCS Sociology Online Exam || Study Content 2018 || Exam Preparation

Fact, Value and Objectivity-

Fact:

  • A Fact is something that has really occurred or actually the case. A Fact is an empirically verifiable observation.
  • It is objective in nature.

Theory:

  • A theory is an abstract and generalized statement which tends to establish a logical interrelationship between facts.
  • Sociology theory is a set of ideas which provides an explanation for human society.

Hypothesis:

  • Sociology is a scientific study of society and scientific research is a guided search for facts based on the formulated hypothesis.
  • A hypothesis is a tentative statement asserting a relationship between certain facts. A researcher conducts a field research and collects data in order to test the hypothesis. After data collection, data is processed. Then, the researcher tests the hypothesis against the processed data. If the hypothesis is proved then it becomes thesis – if it is repeatedly proved, it becomes a theory and if it is almost universally true, then it becomes the law.
  • Thesis —–> Theory —–> Law

तथ्य. महत्त्व और वस्तुनिष्ठता-

तथ्य :

  • एक तथ्य वह है जो वास्तव में घटित हुआ है या जो वास्तव में है | एक तथ्य अनुभवजन्य सत्यसाधनीय अवलोकन है |
  • यह प्रकृति में वस्तुनिष्ठ है |

सिद्धांत :

  • एक सिद्धांत सार व सामान्यीकृत विवरण है जो तथ्यों के बीच तार्किक अन्तर्निहित सम्बन्ध स्थापित करता है |
  • समाजशास्त्र सिद्धांत विचारों का एक समूह है जो मानव समाज के लिए एक व्याख्या प्रदान करता है |

परिकल्पना :

  • समाजशास्त्र समाज की एक वैज्ञानिक अध्ययन है और वैज्ञानिक शोध तैयार परिकल्पनाओं पर आधारित तथ्यों के लिए निर्देशित खोज है |
  • एक परिकल्पना कुछ तथ्यों के बीच सम्बन्ध पर जोर देते हुए एक प्रयोगात्मक विवरण है | एक शोधकर्ता एक क्षेत्रीय शोध को करता है और परिकल्पना की जांच करते समय जानकारी को संग्रह करता है | जानकारी संग्रहण के बाद, जानकारी को प्रसंस्कृत किया जाता है | तब शोधकर्ता प्रसंस्कृत जानकारी के सन्दर्भ में परिकल्पना की जांच करता है | यदि परिकल्पना प्रमाणित हो जाती है तो यह थीसिस (मान्यता) हो जाती है – यदि यह बार-बार प्रमाणित होती है तो यह एक सिद्धांत बन जाता है और यह लगभग सार्वभौमिकतः सत्य हो जाता है तो यह एक नियम बन जाता है |
  • थीसिस —–> सिद्धांत —–> नियम

Relationship between Theory and Facts:

  • R.K. Merton in his essay ‘The bearing of sociological theory on empirical research’ argues that without any theoretical approach, we would not know what facts to look for to begin a study or to interpret the results of research. Existing theories act as a source for hypothesis formulation and thus guide further research resulting in discovery of new facts. Ex., Marxian theory suggests that increasing economic inequalities are the main reason of alienation and class conflict in modern capitalist societies. This theory helps to understand the increasing dicontentment among people.
  • Theory establishes a rational link between two or more variables and thus act as a tool for prediction and control. Ex., Female education is related to overall social development.
  • Theory is an abstract and generalized statement which tries to establish a logical relationship between facts. Ex., Weber’s ideal type of bureaucracy is nothing but an abstraction which helps in comparative study of bureaucratic models across various societies.

सिद्धांत और तथ्यों के बीच सम्बन्ध :

  • आर. के. मेरोन ने उनके निबंध “अनुभवजन्य शोध पर समाजशास्त्रीय सिद्धांत का असर” में यह तर्क दिया है कि बिना किसी सैद्धांतिक दृष्टिकोण के हम नहीं जान सकते कि शोध के परिणामों की व्याख्या या उसके अध्ययन के लिए किन तथ्यों को रखना चाहिए | मौजूदा सिद्धांत परिकल्पना के निर्माण में स्रोत के रूप में कार्य करते हैं और आगे के शोध इस प्रकार नए तथ्यों की खोज में सहायक होते हैं | उदाहरण के लिए, मार्क्सवादी सिद्धांत का यह मानना है कि बढती हुई आर्थिक असमानताएं आधुनिक पूंजीवादी समाजों में वर्गों के बीच विवाद व अलगाव का मुख्य कारण है | यह सिद्धांत लोगों के बीच बढ़ते असंतोष को समझने में सहायता करता है |
  • सिद्धांत दो या अधिक चरों के बीच एक तर्कसंगत लिंक स्थापित करता है और इस प्रकार पूर्वानुमान और नियंत्रण के लिए एक युक्ति की तरह कार्य करता है | उदाहरण के लिए, स्त्री शिक्षा सम्पूर्ण सामाजिक विकास से सम्बंधित है |
  • सिद्धांत एक सार व सामान्यीकृत विवरण है जो तथ्यों के बीच एक तार्किक सम्बन्ध की स्थापना की कोशिश करता है | उदाहरण के लिए, वेबर ले आदर्श नौकरशाही कुछ नहीं सिर्फ एक सारग्रहण है को विभिन्न समाजों में सत्तावाद नमूनों के तुलनात्मक अध्ययन में सहायता करता है |

HCS Sociology Online Exam
Serendipity:

  • R.K. Merton is his essay ‘The bearing of empirical research on sociological theory’ asserts that the empirical research is usually assigned a passive role – verification of hypothesis. But research plays an active role. It initiates, reformulates, deflects and clarifies theory.
  • Serendipity means that in the course of research some unanticipated but strategic data may come to light, which may initiate a new theory altogether.
  • Ex., Elton Mayo conducted many experiments designed to investigate the relationship between working conditions and productivity. He assumed that productivity was determined by the physical conditions of work environment, the aptitude of the worker and the financial incentives. While conducting research, Mayo struck upon the role of informal groups and group norms in determining the productivity.

नसीब :

  • आर. के. मेरोन ने अपने लेख “समाजशास्त्रीय सिद्धांत पर अनुभवजन्य शोध का असर” में यह माना है कि अनुभवजन्य शोध की भूमिका सामान्यतः निष्क्रिय होती है – परिकल्पना का सत्यापन | लेकिन शोध की एक सक्रिय भूमिका रहती है | यह सिद्धांत की शुरुआत, पुनर्निर्माण, विक्षेपित और स्पष्ट करता है |
  • नसीब  का अर्थ है कि शोध करते समय कुछ अप्रत्याशित लेकिन  महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो सकती है, जो पूर्ण रूप से एक नए सिद्धांत की खोज कर सकता है |
  • उदाहरण के लिए, एल्टन मेयो ने कार्यशील परिस्थितियाँ व उत्पादकता के बीच सम्बन्ध की जाँच के लिए कई सारी प्रयोगों के डिजाईन किया है | उन्होंने यह माना कि उत्पादकता का निर्धारण कार्य पर्यावरण के भौतिक परिस्थितियाँ, श्रमिक के योग्यता और वित्तीय प्रोत्साहन द्वारा होता है | शोध करते वक्त, मेयो ने उत्पादकता के निर्धारण में अनौपचारिक समूहों और सामूहिक मानदंडों की भूमिका पर जोर दिया |

Role of values in sociological enquiry:

  • The subject matter of sociology is the study of human behaviour in society which is guided by values. Value is a belief that something is good and desirable. Values differ in different societies and different cultures. Ex., Materialism is a dominant value in West, while moksha is a dominant value in India.
  • For proper understanding of social behaviour of man, the unique meanings, motives and values underlying such behaviour should also be taken into consideration. This view was supported by anti- positivists like Rickert, Dilthey, Windelband. Later Weber also argued that unlike matter, man has consciousness and therefore his actions are meaningful.

समाजशास्त्रीय समीक्षा में महत्वों की भूमिका :

  • समाजशास्त्र की विषय-वस्तु समाज में मानव व्यवहार का अध्ययन है जिसका मार्गदर्शन महत्वों द्वारा किया जाता है | महत्त्व एक विश्वास है कि कुछ वांछनीय व अच्छा है | महत्त्व विभिन्न समाज व संस्कृतियों में अलग होते हैं | उदाहरण के लिए पश्चिम में भौतिकवाद एक महत्वपूर्ण महत्त्व  है जबकि भारत में प्रभावी महत्त्व मोक्ष है |
  • मनुष्य के सामाजिक व्यवहार के सही समझ के लिए, उन व्यवहारों में अन्तर्निहित विशेष अर्थ, उद्देश्य व महत्वों को भी विचार में लाना चाहिए | इस दृष्टिकोण का समर्थन गैर-प्रत्यक्षवादी जैसे रिकेर्ट, दिल्थे, विन्देल्बंद के द्वारा किया गया | बाद में वेबर ने भी यह तर्क दिया कि पदार्थों के उलट, इंसान के पास चेतना है और इसलिए उसके कार्य सार्थक होते हैं |
  • अगस्ते कॉम्टे ने एक प्रत्यक्षवादी के रूप में माना है कि इंसान का व्यवहार, पदार्थों के व्यवहार की तरह निष्पक्ष रूप से मापा जा सकता है | भावनाएं, एहसास, उद्देश्य इत्यादि जैसे करक जिनका अवलोकन नहीं किया जा सकता है महत्वपूर्ण नहीं है और भ्रामक हो सकते हैं |

Objectivity:

  • Objectivity is a ‘frame of mind’ so that the personal prejudices or preferences of the social scientists do not contaminate the collection and analysis of data.
  • Durkheim in his ‘Rules of Sociological Method’ states that social facts must be treated as ‘things’ and all preconceived notions about the social facts must be abandoned.
  • Max Weber stressed on the need of objectivity when he said that sociology must be value-free.
  • Radcliffe Brown asserted that social scientist must abandon his ethnocentric and egocentric biases while carrying out researches.
  • Malinowski advocated ‘cultural relativism’ while conducting anthropological fieldwork in order to ensure objectivity.

Problem of Objectivity:

  • Gunnar Myrdal believes that complete objectivity is a myth. The subjectivity creeps in at various stages in the course of sociological research.

निष्पक्षता :

  • निष्पक्षता एक ‘मन की सीमा’ है ताकि सामाजिक वैज्ञानिकों की व्यक्तिगत पूर्वाग्रह या प्राथमिकताएं जानकारी के संग्रह और विश्लेषण को दूषित न करें |
  • दुर्खेम ने अपने ‘समाजशास्त्रीय तरीके के नियम’ में कहा है कि सामाजिक तथ्यों को ‘वस्तुओं’ की तरह माना जाना चाहिए और सामाजिक तथ्यों के बारे में सभी पूर्वकेन्द्रित विचारों को त्याग दिया जाना चाहिए |
  • मैक्स वेबर ने निष्पक्षता पर यह कहते हुए जोर दिया कि समाजशास्त्र को महत्त्व मुक्त होना चाहिए |
  • रेडक्लिफ ब्राउन ने यह व्यक्त किया है कि सामाजिक वैज्ञानिक को शोध करते समय अपने नृवंशकेन्द्रिक और अहंकारी पूर्वाग्रहों को अवश्य छोड़ देना चाहिए |
  • मलिनोव्सकी ने ‘सांस्कृतिक सापेक्षता’ की वकालत निष्पक्षता को सुनिश्चित करने के क्रम में नृविज्ञान क्षेत्रीय कार्य करते समय की |

निष्पक्षता की समस्या :

  • गुन्नार मार्डल यह मानते हैं कि पूर्ण निष्पक्षता एक मिथक है | समाजशास्त्रीय शोध के समय विभिन्न अवस्थाओं में व्यक्तिपरकता सामने आती है |

Various stages in which objectivity is compromised:

  • While selecting a topic of research, the personal preferences of the sociologist plays an important role.
  • The ideological biases, acquired during the course of education or training also affect objectivity. Robert Redfield studied Tepoztlan village (in Mexico) with a functionalist approach and concluded that there exists complete harmony between various groups. Oscar Lewis studied the same village from a Marxist perspective and concluded that the society was conflict ridden.
  • Objectivity can be affected while formulating a hypothesis. Usually hypotheses are formed from existing theories which are produced by and restricted to particular groups whose views and interests they represent.
  • Subjectivity can also enter at the time of collection of empirical data. Ex., In participant observation, the observer acquires a bias in favour of the group he is studying. In non-participant observation, sociologists may impose his values and prejudices.
  • Subjectivity can also creep in because of field restrictions. In case of Andre Beteille’s study of Sripuram village in Tanjore, the Brahmins did not let him visit the untouchable locality and therefore he could not study their point of view.

विभिन्न अवस्थाएं जिसमें निष्पक्षता से छेड़छाड़ की जाती है :

  • शोध के एक विषय के चयन के समय, समाजशास्त्रियों के व्यक्तिगत प्राथमिकताएं एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं |
  • शिक्षा या प्रशिक्षण के दौरान हासिल की गई वैचारिक पूर्वाग्रह भी निष्पक्षता को प्रभावित करती है | रोबर्ट रेडफील्ड ने एक कार्यवादी दृष्टिकोण के साथ (मेक्सिको में) टेपोजल्टान गाँव का अध्ययन किया और यह निष्कर्ष निकाला कि विभिन्न समूहों के बीच पूर्ण सद्भाव मौजूद है | ऑस्कर लेविस ने उसी गाँव का अध्ययन एक मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य से किया और यह निष्कर्ष निकाला कि समाज संघर्ष से ग्रसित था |
  • निष्पक्षता को एक परिकल्पना निर्मित करते समय प्रभावित किया जा सकता है | सामान्यतः परिकल्पनाएं मौजूदा सिद्धांतों से तैयार की जाती है जो विशेष समूहों द्वारा निर्मत व प्रतिबंधित होते हैं जिनके विचार व हितों को वे प्रतिनिधित्व करते हैं |
  • व्यक्तिपरकता अनुभवजन्य जानकारी के संग्रह के समय भी आ सकती है | उदाहरण के लिए, भागीदारों के अवलोकन में, पर्यवेक्षक उस समूह के पक्ष में पक्षपात करता है जिसका वह अध्ययन करता है | गैर-भागीदारी पर्यवेक्षण में, समाजशास्त्री शायद अपनी महत्वों और पूर्वाग्रहों को लागू कर सकते हैं |
  • व्यक्तिपरकता क्षेत्रीय प्रतिबंधों के कारण भी पैदा हो सकती है | आंद्रे बेतेली के तंजौर में श्रीपुरम गाँव के अध्ययन में, ब्राह्मणों ने उन्हें अछूतों के स्थानों में नहीं जाने दिया और इसलिए वह उनके दृष्टिकोण को नहीं जान पाए

 

Join Frontier IAS Online Coaching Center to prepare for UPSC/HCS/RAS Civil Service comfortably at your home at your own pace/time.

HCS(Prelims+Mains+Interview)   HCS Prelims(Paper 1+Paper 2)

IAS+HCS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    

  RAS+IAS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    RAS(Prelims+Mains+Interview)     RAS Prelims     UPSC IAS Prelims      UPSC  IAS (Prelims+Mains+Interview)

Click Here to subscribe Our YouTube Channel

Posted on Leave a comment

Sociology Study Content | HCS Online Preparation 2018 | HCS Exam 2018

Sociology Study Content | HCS Online Preparation 2018 | HCS Exam 2018

Sociology Study Content | HCS Online Preparation 2018 | HCS Exam 2018

Karl Marx – Social & Intellectual Background –

Social and intellectual background of Karl Marx (1818 – 1883):

  • Karl Marx’s life coincided with the beginning of a change in the European countries from agrarian to industrial societies. Marx obtained most of his basic empirical data for his theory of development of capitalism from England.
  • The intellectual background for Marx’s theories involved progress of Germany to match more developed countries and this debate was carried out by G.W.F. Hegel.
  • Hegel tried to show that human history had a goal – creation of a reasonable state and the realization of the concept of freedom. Marx was influenced by Hegel’s historical method in which development and change through dialectic contradictions are the primary components. He rejected Hegel’s emphasis on spiritual forces in history and criticized belief of young Hegelian movement (of which he was a part for sometime) that philosophical analysis would lead to change in and liberation of Germany. He stressed human social conditions, specifically their material production important to historical development.
  • Marx was inspired from French Socialist tradition that arose during French Revolution of 1789 and continued till the revolutions of 1830 and 1848. This tradition aimed at arising a new and more radical revolution of 1789 in which the new class, the industrial workers or proletariat would take power and abolish all classes. Some reform oriented socialists (“utopian socialists”) like Saint Simon, Charles Fourier wanted to build a socialist society through state reforms or by creating small local societies in which division of labour was abolished and people lived in harmony. Marx incorporated some of their criticism of the modern capitalist industrial society into his own theories.
  • Marx was also influenced by British Economists Adam Smith, David Ricardo who had analysed the new capitalist market economy. Marx took up their labour theory of value – value of commodity is determined by the quantity of work put into it. Marx objected to the Ricardian socialists (demonstrated injustice of a system in which workers created all value but received only part of it for themselves) and in his ‘theory of surplus’ tried to explain why the workers only received a part of the value they created.

कार्ल मार्क्स – सामाजिक व बौद्धिक पृष्ठभूमि-

कार्ल मार्क्स की सामाजिक व बौद्धिक पृष्ठभूमि (1818 – 1883) :

  • कार्ल मार्क्स के जीवन में बदलाव की शुरुआत यूरोपीय देशों में कृषि से औद्योगिक समाजों में बदलाव की शुरुआत के साथ हुई | मार्क्स को अपने पूंजीवादी के सिद्धांत के लिए मूल अनुभवजन्य जानकारी इंग्लैंड से प्राप्त हुई |
  • मार्क्स के सिद्धांतों के बौद्धिक पृष्ठभूमि ने जर्मनी के प्रगति को शामिल किया ताकि अधिक विकसित देशों से बराबरी हो और इसे वाद का रूप जी. डबल्यू. एफ. हेगल ने दिया |
  • हेगल ने यह दिखाने की कोशिश की कि मानव इतिहास के पास एक लक्ष्य था – एक उचित राष्ट्र का निर्माण और आजादी के धारणा का एहसास | मार्क्स हेगल की एतिहासिक प्रणाली से प्रभावित थे जिसमें द्वंदात्मक विरोधाभासों द्वारा परिवर्तन व विकास प्राथमिक घटक हैं | उन्होंने इतिहास में आध्यात्मिक तत्वों पर जोर देने के हेगल के सिद्धांत को नकारा और युवा हेगलवादी आन्दोलन (जिसके वे स्वयं ही कभी हिस्सा थे) के विश्वास की आलोचना की कि दार्शनिक विश्लेषण से जर्मनी में परिवर्तन आएगा और जर्मनी को मुक्ति मिलेगी | उन्होंने मानव सामाजिक परिस्थितियों पर अधिक जोर दिया खासकर ऐतिहासिक विकास में उनके महत्वपूर्ण भौतिक उत्पादन पर |
  • मार्क्स फ़्रांसिसी समाजवादी परंपरा से प्रेरित थे जो 1789 के फ़्रांसिसी क्रांति से शुरू हुआ और 1830 व 1848 के क्रांतियों तक जारी रहा | इस परंपरा का लक्ष्य एक नया और अधिक कट्टरवादी 1789 के क्रांति को जन्म देना था जिसमें एक नया वर्ग, औद्योगिक श्रमिक या श्रमजीवी  वर्ग समस्त शक्ति को रखेंगे और सभी वर्गों को समाप्त करेंगे | कुछ सुधार उन्मुख समाजवादी (“अव्यवहार्य मायविचारक समाजवादी”) जैसे संत साइमन, चार्ल्स फौरिएर राष्ट्र सुधारों द्वारा या छोटे स्थानीय समाजों के निर्माण द्वारा एक समाजवादी समाज बनाना चाहते थे जिसमें श्रम विभाजन समाप्त कर दिया गया और लोग सौहाद्रपूर्ण तरीके से रहते थे | मार्क्स ने अपने स्वयं के सिद्धांतों में आधुनिक पूंजीवादी औद्योगिक समाज के उनकी कुछ समीक्षाओं का निगमन किया |
  • मार्क्स एडम स्मिथ, डेविड रिकार्डो जैसे ब्रिटिश अर्थशास्त्रियों से प्रभावित थे, जिन्होंने नए पूंजीवादी बाजार अर्थव्यवस्था को विश्लेषित किया | मार्क्स ने उनके महत्त्व के श्रम सिद्धांत को अपनाया – जिसमें यह कहा गया कि किसी वस्तु का महत्त्व उसमें लगाए गए कार्य के परिमाण से निर्धारित होती है | मार्क्स ने रिकार्डोवादी समाजवादियों पर आपत्ति जताई ( एक प्रणाली में अन्याय को प्रदर्शित किया जिसमें यह बताया कि समस्त महत्त्व का निर्माण तो श्रमिक करते हैं लेकिन उन्हें अपने लिए इसका एक हिस्सा मात्र प्राप्त होता है ) और अपने ‘अधिशेष के सिद्धांत’ में उन्होंने यह बताने की कोशिश की कि क्यों श्रमिकों को उस महत्त्व का एक हिस्सा मिला जिसका निर्माण उन्होंने किया |

Hegel – Idealism-

  • According to Hegel, the ultimate purpose of human existence was to express the highest form of human Geist or ‘Spirit’. This Spirit was not a physical or material entity but an abstract expression of the moral and ethical qualities and capacities, the highest cultural ideals were the ultimate expression of what it is to be a human being. For Hegel, material life was the practical means through which this quest for the ultimate realisation of human consciousness, the search for a really truthful awareness of reality, could be expressed.
  • For rationalists, human knowledge and understanding are more about what goes on inside our minds than outside of them. For Hegel, reason and thought are not simply part of reality, they are reality. Therefore, the laws and principles that govern human thought must also be the laws and principles that govern the whole of reality.
  • Hegel suggested that the minds of all human beings are essentially the same, we are all part of the same overarching consciousness.
  • According to Hegel, the process by which the quest for the ultimate truth is carried on involves a dialectical process in which one state of awareness about the nature of reality (thesis) is shown to be false by a further and higher state of awareness (antithesis) and is finally resolved in a final and true state of awareness (synthesis). Hegel uses this approach to suggest that the contradictions or imperfections of the family and of civil society (corresponding with thesis and antithesis) are finally resolved by the institutions of the state, which correspond with the new ethical synthesis.

Hegel’s Idea of Sublation:

  • This term was used by Hegel to describe the need social actors have to feel at ease with their understanding of reality and how they fit into it. Lack of sublation shows itself as a feeling of estrangement, of not fitting in, of being at odds with the world and being confused about the nature of reality.
  • Hegel felt that estrangement arose because uncertainty about the nature of reality ‘out there’ caused us to be uncertain about reality ‘in here’. The extent to which we do not understand the objective world around us is also the extent to which we are ignorant about our subjective inner nature.

Young Hegelians:

  • They proposed a counter-thesis of their own. They applied the thesis, antithesis and synthesis to Hegel’s own philosophical system.
  • Ludwig Feuerbach, argued that by subordinating the material world to the realm of consciousness and ideas, Hegel’s obsession with the coming of the great universal Spirit, was not in the least bit rational or objective in the scientific sense and was nothing more than a form of religious mysticism.
  • Rather than describing how social actors might overcome their sense of estrangement from material reality, Hegel said that it was not objective reality that was the problem but simply the inadequacy of social actors’ understanding of it.

Marx:

  • While giving Hegel, ‘that mighty thinker’, credit for developing a number of very important insights, Marx argued that he had not applied them correctly and therefore reached incomplete conclusions about true nature of real reality.
  • Marx’s social theory can be thought of as the new synthesis emerging out of collision of Hegel’s thesis and the Young Hegelians’ antithesis.

हेगल – विचारवाद –

  • हेगल के अनुसार, मानव अस्तित्व का आखिर प्रयोजन मानव आत्मा के उच्चतम रूप को व्यक्त करना था | आत्मा एक भौतिक या जिस्मानी इकाई नहीं थी बल्कि नैतिक व नीतिपरक गुणों व क्षमताओं का सार अभिव्यक्ति थी, एक मनुष्य होना का अर्थ क्या है यह सबसे बड़े सांस्कृतिक विचार ही परम अभिव्यक्ति थी | हेगल के लिए, जिस्मानी जीवन व्यावहारिक साधन था जिसके जरिये मानव चेतना के परम एहसास का यह रहस्य, सच्चाई के वास्तविक सच्ची जागरूकता की खोज को व्यक्त किया जा सकता था |
  • बुद्धिजीवियों के लिए, मानव ज्ञान और समझ वैसे ही है जैसे कि हमारे मन के बाहर होने से ज्यादा हमारे मन में जो भी होती हैं | हेगल के लिए, कारण और विचार वास्विकता के हिस्सा मात्र नहीं हैं, बल्कि वास्तविकता ही है | इसलिए, नियम व सिद्धांत जो मानव विचार को नियंत्रित करते हैं उन्हें वे नियम व सिद्धांत बनने चाहिए जो पूर्ण वास्तविकता को नियंत्रित करें |
  • हेगल ने यह सुझाया कि सभी मनुष्यों के मस्तिष्क अनिवार्यतः समान होते हैं, हम सब उसी व्यापक चेतना के सभी भाग है |
  • हेगल के अनुसार, वह प्रक्रिया, जिसके द्वारा परम सत्य की खोज की जाती है, में एक द्वंदात्मक प्रक्रिया शामिल होती है, जिसमें वास्तविकता की प्रकृति (थीसिस) के बारे में जागरूकता की एक अवस्था को जागरूकता की एक अधिक बड़ी अवस्था (प्रतिपक्ष) द्वारा गलत दिखाया जाता है और आखिरकार जागरूकता की एक अंतिम व सच्ची अवस्था (संकलन) में सुलझती है | हेगल इस दृष्टिकोण का प्रयोग यह सुझाव देने के लिए करते हैं कि नागरिक समाज व परिवार के विरोधाभास या अपूर्णता (थीसिस व प्रतिपक्ष से सम्बंधित) को राष्ट्र के संस्थानों द्वारा अंतिम में मिटाया जाता है, जो नए नैतिक संकलन के अनुरूप होते हैं |

Sociology Study Content
हेगल की सब्लेषण का विचार :

  • हेगल द्वारा इस धब्द का प्रयोग यह दिखाने के लिए किया गया था कि सामाजिक कर्ताओं को वास्तविकता की उनकी समझ में आसानी से एहसास के जरूरत है और वे इसमें किस तरह शामिल है | सब्लेषण की कमी खुद को एक मनमुटाव के एहसास के रूप में दिखाती है, नहीं शामिल हो पाने के रूप में, दुनिया के साथ बाधाओं के रूप में और वास्तविकता के प्रकृति के बारे में संशय के रूप में दिखाती है |
  • हेगल ने महसूस किया कि मनमुटाव का जन्म इसलिए हुआ क्योंकि ‘बाहर के’ वास्तविकता के प्रकृति के बारे में अनिश्चितता ने ‘अन्दर के’ वास्तविकता के बारे में हम में अनिश्चितता फैला दी | बाहरी दुनिया के जिस सीमा तक हम नहीं जान पाते हैं अपने अन्दर के उसी हद तक व्यक्तिपरक प्रवृत्ति के बारे में हम अज्ञानी रहते हैं |

युवा हेगालियन :

  • उन्होंने स्वयं की एक काउंटर-थीसिस को प्रस्तावित किया | उन्होंने थीसिस, प्रतिपक्ष और संकलन को हेगल की खुद के दार्शनिक प्रणाली पर लागू किया |
  • लुडविग फ्युरबैच ने तर्क दिया कि विचारों और चेतना के दायरे तक भौतिक दुनिया को सीमित कर , विशाल सार्वभौमिक आत्मा का आगमन के साथ हेगल का जुनून, वैज्ञानिक तरीके से जरा सा भी तर्कसंगत या निष्पक्ष नहीं था और यह धार्मिक रहस्यवाद से ज्यादा कुछ नहीं था |
  • बजाय इसका वर्णन करने की कि कैसे सामाजिक कर्ता भौतिक वास्तविकता से मनमुटाव के उनके भावना से उबरे, हेगल ने कहा कि समस्या यह नहीं थी कि यह निष्पक्ष वास्तविकता नहीं थी लेकिन यह थी कि इसके समझ के लिए सामाजिक कर्ताओं की अपर्याप्तता |
  • मार्क्स ने कहा कि ‘फ्युरबैच की महान उपलब्धि यह है कि इन्होने दिखाया कि दर्शनशास्त्र कुछ नहीं बल्कि धर्म है जो विचार में लाया गया और विचार में ही हुआ जिसका विकास हुआ है , और मानव के प्रकृति के मनमुटाव के अन्य रूपों की तरह ही इसकी निंदा समान रूप से की जानी है |

मार्क्स :

  • हेगल, ‘एक महान विचारक’, को बहुत सी महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि के विकास के लिए श्रेय देते समय, मार्क्स ने तर्क दिया कि उसने उनको सही रूप से नहीं लागू किया और इसलिए असली वास्तविकता के सत्य प्रवृत्ति के बारे में अपूर्ण निष्कर्षों पर पहुंचे |
  • मार्क्स की सामाजिक सिद्धांत को हेगल की थीसिस और युवा हेगालियनों के प्रतिपक्ष के टकराव से उत्पान हुए नए संकलन के रूप में देखा जा सकता है |

 

Join Frontier IAS Online Coaching Center to prepare for UPSC/HCS/RAS Civil Service comfortably at your home at your own pace/time.

HCS(Prelims+Mains+Interview)   HCS Prelims(Paper 1+Paper 2)

IAS+HCS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    

  RAS+IAS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    RAS(Prelims+Mains+Interview)     RAS Prelims     UPSC IAS Prelims      UPSC  IAS (Prelims+Mains+Interview)

Click Here to subscribe Our YouTube Channel

Posted on Leave a comment

HCS Sociology Online Preparation :: Study Content for 2018 HCS Exam

HCS Sociology Online Preparation :: Study Content for 2018 HCS Exam

HCS Sociology Online Preparation :: Study Content for 2018 HCS Exam

Techniques of Data Collection –

Survey –

  • It is the most common type of quantitative research method in sociology.
  • Questionnaires and structured interviews are usually employed to collect data for a research known as the ‘social survey’.
  • Social surveys are divided into descriptive and analytical.
  • A descriptive survey aims to provide an accurate measurement of the distribution of certain characteristics in a given population.
  • Analytic surveys are designed to test hypotheses about the relationships between a number of factors or variables. They are concerned with discovering and explaining the relationships. It was used by Durkheim in his study of suicide which showed that Protestant societies had a higher rate of suicide than Catholic societies. Official statistics showed variations in suicide rate between European societies. He tried to eliminate other variations while studying the variations in suicide rates like differences in national culture, possibility of regional differences for variation in suicide rates.

सर्वेक्षण –

  • यह समाजशास्त्र में मात्रात्मक शोध पद्धति में सबसे सामान्य प्रकार है |
  • प्रश्नावली तथा संरचित साक्षात्कार आमतौर पर “सामाजिक सर्वेक्षण” के रूप में प्रसिद्ध अनुसंधान हेतु आंकड़े संगृहित करने के लिए नियोजित किये जाते हैं |
  • सामाजिक सर्वेक्षणों को विवरणात्मक तथा विश्लेषणात्मक में विभाजित किया जाता है |
  • एक विवरणात्मक सर्वेक्षण का उद्देश्य किसी जनसंख्या में विशिष्ट विशेषताओं के वितरण का एक सटीक माप प्रदान करना होता है।
  • विश्लेषणात्मक सर्वेक्षणों को कई कारकों या चरों के बीच संबंधों के बारे में अनुमानों का परीक्षण करने के लिए परिकल्पित किया गया है। वे संबंधों की खोज करने तथा उनकी व्याख्या करने से सम्बंधित हैं | यह आत्महत्या के अध्ययन में दुर्खीम द्वारा उपयोग किया गया था, जिसने यह दर्शाया कि प्रोटोस्टेंट समाज में कैथोलिक समाज की तुलना में आत्महत्या की दर उच्च थी |  आधिकारिक आंकड़ों ने यूरोपीय समाजों के बीच आत्महत्या की दर में अंतर दिखाया। उन्होंने आत्महत्या दर की भिन्नताओं के अध्ययन के दौरान अन्य भिन्नताओं को दूर करने की कोशिश की, जैसे राष्ट्रीय संस्कृति में अंतर, आत्महत्या दरों में भिन्नता के लिए क्षेत्रीय मतभेदों की संभावना |

Steps involved in survey research:

  • First step – The issues to be explored must be clearly defined and the target population to be interviewed is selected on the basis of the characteristics that the researcher is interested in examining.
  • Second step – Picking an appropriate sample of the population to interview.
  • Third step – To interview or administer the questionnaire to the selected people and to collect the data.
  • Final step – Tabulation, analysis and interpretation of the data.

Possible sources of error:

  • Sampling error is the degree to which the selected sample misrepresents the population as a whole.
  • Problems in observation and  measurement, processing the data and analyzing the findings.
  • Attitudes expressed in interviews are not always perfect expressions of underlying values.

Case Study-

  • Case study method is used for holistic, in-depth investigation of a case which may be an individual, an institution, a system, a community or an organisation.
  • Herbert Spencer was one of the first sociologists to use case materials in his ethnographic studies.
  • Robert K. Yin defined case study as “an empirical inquiry that investigates a contemporary  phenomenon within its real-life context, when the boundaries between phenomenon and context are not clearly evident, and in which multiple sources of evidence are used”
  • A case study can either be quantitative or qualitative or even both, but most case studies lie within the qualitative methodology.
  • Case study aims at determining the factors that account for the complex behaviour patterns of the unit and the relationships of the unit to its surroundings. Thus, researcher try to see the variety of factors within a social unit as an integrated whole.
  • When attention is focussed on the development of the case, it is called ‘case history’. Ex., how a particular boy became a juvenile delinquent.
  • Data for case studies can be collected by primary and secondary sources. Primary sources include interviews and observation. Secondary sources include reports, records, newspapers, magazines, books, files etc.

HCS Sociology Online Preparation
Characteristics of case study method as identified by Sjoberg:

  • The case study ‘strives towards a holistic understanding of cultural systems of action’. Cultural systems of action refer to sets of interrelated activities engaged in by the actors in a social situation.
  • Case study research is not sampling research. But, selection of the sources or items must be done so as to maximize what can be learned in the limited time available for study.
  • Because they are intensive in nature, case studies tend to be selective, focusing on one or two issues that are fundamental to understanding the system being examined.
  • ‘Case studies are multi-perspective analyses’. The researcher considers not just the voice and perspective of the actors but also of the relevant group of actors and the interaction between them.

Advantages of case study according to Black and Champion:

  • Case study makes holistic and in-depth study of the phenomenon possible.
  • It offers flexibility with respect to using methods like questionnaire, interview.
  • It could be used for studying any specific dimension of the topic in detail.
  • It can be conducted practically in any kind of social setting.
  • They are relatively inexpensive.

Limitations of case study:

  • Time consuming
  • Possibility of emotional involvement thus making objective study difficult.
  • The results may not be representative of all groups or situations in the category.

Survey vs. Case Study-

  • Surveys are extensive and they are usually conducted on a large scale. Case studies are intensive but done on a small scale.
  • Case study is done in terms of limited space and broader time. Survey is done in terms of limited time with broader space.

सर्वेक्षण अनुसंधान में शामिल कार्य :

  • प्रथम कार्य – पता लगाए जाने वाले मुद्दे स्पष्ट रूप से परिभाषित होने चाहिए तथा साक्षात्कार हेतु लक्षित जनसंख्या का चुनाव उन विशेषताओं के आधार पर किया जाता है जिनके जांच में शोधकर्ता की दिलचस्पी है |
  • दूसरा कार्य – साक्षात्कार के लिए आबादी के उपयुक्त नमूने का चयन |
  • तीसरा कार्य – चयनित लोगों का साक्षात्कार करना अथवा उनके लिए प्रश्नावली का प्रबंध करना तथा आंकड़े संगृहित करना |
  • अंतिम कार्य – आंकड़ों का संयोजन, विश्लेषण तथा व्याख्या |

त्रटियों के संभावित स्रोत –

  • नमूनाकरण त्रुटि वह बिंदु है जहाँ चयनित नमूना समष्टि के रूप में आबादी का गलत प्रतिनिधित्व करता है |
  • अवलोकन तथा मापन, आंकड़ों को संसाधित करने तथा निष्कर्षों के विश्लेषण में समस्याएं |
  • साक्षात्कार में व्यक्त दृष्टिकोण हमेशा अंतर्निहित मूल्यों की सही अभिव्यक्ति नहीं होते हैं  |

वृत्त अध्ययन-

वृत्त अध्ययन  पद्धति  का प्रयोग पूरी तरह से, एक वृत्त की गहन जांच के लिए किया जाता है, जो एक व्यक्ति, एक संस्था, एक प्रणाली, एक समुदाय या एक संगठन हो सकता है।

  • हर्बर्ट स्पेन्सर अपने मानव जाति विज्ञान सम्बन्धी अध्ययनों में मामले की सामग्री का उपयोग करने वाले पहले समाजशास्त्रियों में से एक थे।
  • रोबर्ट के यिन ने वृत्त अध्ययन  को “एक अनुभवजन्य जांच के रूप में परिभाषित किया है जो एक समकालीन घटना की  जांच वास्तविक सन्दर्भ में करता है , जब घटना और संदर्भ के बीच की सीमा स्पष्ट रूप से प्रत्यक्ष नहीं होती है, और जिसमें प्रमाण के कई स्रोतों का उपयोग किया जाता है |”
  • एक वृत्त अध्ययन  या तो गुणात्मक या मात्रात्मक अथवा दोनों हो सकता है, किन्तु अधिकांश वृत्त अध्ययन गुणात्मक पद्धति के अंतर्गत आते हैं |
  • वृत्त अध्ययन  का उद्देश्य इकाई के जटिल व्यवहार प्रारूपों के लिए जिम्मेदार कारकों तथा इकाई का इसके परिवेश के साथ सम्बन्ध निर्धारित करना है |  इस प्रकार अनुसंधानकर्ता एकीकृत समष्टि के अंतर्गत कारकों की विभिन्नता को देखने की कोशिश करता है |
  • जब ध्यान वृत्त के विकास पर केन्द्रित होता है, तो इसे वृत्त इतिहास कहा जाता है | उदाहरण- किस तरह एक विशेष बालक बाल अपराधी बन जाता है |
  • वृत्त अध्ययन हेतु आंकड़े प्राथमिक तथा गौण स्रोतों से संगृहित किये जा सकते हैं | प्राथमिक स्रोतों  में साक्षात्कार तथा अवलोकन शामिल हैं | गौण स्रोतों में रिपोर्ट्स, अभिलेख, समाचार पत्र, मैगज़ीन, किताबें, फाइल्स आदि शामिल हैं|

वृत्त अध्ययन की स्जोबेर्ग के द्वारा चिन्हित की गयी विशेषताएं :

  • वृत्त अध्ययन “क्रिया की सांस्कृतिक व्यवस्था की समग्र समझ के प्रति प्रयास करता है | क्रिया की सांस्कृतिक व्यवस्था एक सामाजिक स्थिति में कर्ताओं द्वारा निगमित अंतर सम्बन्धी गतिविधियों के समुच्चय को दर्शाती है |
  • वृत्त अध्ययन अनुसंधान नमूना चयन सिद्धांत नहीं है | किंतु, स्रोतों अथवा मदों का चयन  अवश्य किया जाना चाहिए ताकि अध्ययन के लिए उपलब्ध सीमित समय में जो सीखा जा सकता है, उसे अधिकतम किया जा सके |
  • चूँकि वे प्रकृति में गहन होते हैं, इसलिए वृत्त अध्ययन चयनात्मक होते हैं. जो उन एक या दो मुद्दों पर केन्द्रित होते हैं जो जांच की जा रही प्रणाली को समझने के लिए मूलभूत हैं |   
  • वृत्त अध्ययन बहु-परिप्रेक्ष्य विश्लेषण होते हैं| अनुसंधानकर्ता ना केवल अभिनेताओं की आवाज तथा दृष्टिकोण पर विचार करता है बल्कि अभिनेताओं के प्रासंगिक समूह एवं उनके बीच होने वाली परस्पर क्रिया पर भी विचार करता है|

ब्लैक तथा चैंपियन के अनुसार वृत्त अध्ययन के लाभ –

  • वृत्त अध्ययन संभावित घटना का समग्र तथा गहराई से अध्ययन करता है |
  • यह प्रश्नावली, साक्षात्कार जैसे तरीकों का उपयोग करने के संबंध में लचीलापन प्रदान करता है।
  • इसका इस्तेमाल विषय के किसी भी आयाम के विस्तृत अध्ययन के लिए किया जा सकता है |
  • यह किसी भी तरह की सामाजिक व्यवस्था में व्यवहारिक रूप से किया जा सकता है |
  • वे अपेक्षाकृत कम महंगे हैं |

वृत्त अध्ययन की सीमायें :

  • समय लेने वाला अध्ययन |
  • भावनात्मक भागीदारी की संभावना, जो विषयनिष्ठ अध्ययन को मुश्किल बनता है |
  • परिणाम श्रेणी के सभी समूहों अथवा परिस्थितियों के प्रतिनिधि नहीं हो सकते हैं |
  • सर्वेक्षण विस्तृत होते हैं तथा सामान्यतः उन्हें बड़े पैमाने पर किया जाता है | वृत्त अध्ययन गहन तो होते हैं किन्तु उन्हें लघु पैमाने पर किया जाता है|
  • वृत्त अध्ययन सीमित स्थान तथा व्यापक समय के मामले में किया जाता है | सर्वेक्षण व्यापक स्थान के साथ सीमित समय के मामले में किया जाता है |

सर्वेक्षण बनाम वृत्त अध्ययन-

  • सर्वेक्षण विस्तृत होते हैं तथा सामान्यतः उन्हें बड़े पैमाने पर किया जाता है | वृत्त अध्ययन गहन तो होते हैं किन्तु उन्हें लघु पैमाने पर किया जाता है|
  • वृत्त अध्ययन सीमित स्थान तथा व्यापक समय के मामले में किया जाता है | सर्वेक्षण व्यापक स्थान के साथ सीमित समय के मामले में किया जाता है |

 

 

Join Frontier IAS Online Coaching Center to prepare for UPSC/HCS/RAS Civil Service comfortably at your home at your own pace/time.

HCS(Prelims+Mains+Interview)   HCS Prelims(Paper 1+Paper 2)

IAS+HCS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    

  RAS+IAS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    RAS(Prelims+Mains+Interview)     RAS Prelims     UPSC IAS Prelims      UPSC  IAS (Prelims+Mains+Interview)

Click Here to subscribe Our YouTube Channel

Posted on Leave a comment

HCS Sociology 2018 :: Study Material | Exam Preparation Online

HCS Sociology 2018 :: Study Material | Exam Preparation Online

HCS Sociology 2018 :: Study Material | Exam Preparation Online

Robert K Merton :-

  • Robert King Merton (5 Jul 1910 – 23 Feb 2003) was an American sociologist. He spent most of his career teaching at Columbia University, where he attained the rank of University Professor.
  • Merton is viewed as one of the founding fathers of modern-day sociology.
  • Merton was heavily influenced by Emile Durkheim. Talcott Parsons also greatly contributed to Merton’s understanding of sociology and ideas.

Social Theory and Social Structure, Theory of Deviance, Manifest and Latent Functions, Dysfunctions and  Reference Groups.

In 1994, Merton was awarded the US National Medal of Science. He was the first sociologist to receive the prize

Criticism of the Functionalist Analysis:

  • Merton argued that today’s world is complex. It is upto the investigator/ sociologist to study whatever exist is functional/non functional/ dysfunctional.
  • Idea was novel as earlier structural functionist never looked beyond pure integrative functionalist perspective.
  • For example, religion should integrate the society however it is divisive during riots.
  • Acc to Merton, the context in which social item is studied must also be taken into consideration. eg. cricket and its consequences.
  • A functional analyst, Merton says, nothing, in fact, is indispensable.
  • There are functional alternatives, equivalents or substitutes. In other words, the same function served by a given item, under changed circumstances, may be fulfilled by another item.
  • For example, in modern societies where women too work outside the home, some functions of the family such as, childcare can be performed by other institutions like creches.
  • मेर्टन ने तर्क दिया कि आज की दुनिया जटिल है। यह जांचकर्ता/समाजशास्त्री के ऊपर है कि वह जांज करे की क्या  प्रकार्य है, दुष्प्रकार्या गैर या कार्यात्मक है।
  • सुझाव अच्छा था  क्योंकि पहले संरचनात्मक कार्यकर्ता शुद्ध एकीकृत कार्यात्मकवादी परिप्रेक्ष्य से परे कभी नहीं देखा था।
  • उदाहरण के लिए, धर्म का काम समाज को एकीकृत करना होता है हालांकि यह दंगों के दौरान विभाजित करता है।
  • मेर्टन के मुताबिक, जिस संदर्भ में सामाजिक वस्तु का अध्ययन किया जाता है, उसे भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। जैसे की क्रिकेट के खेल और इसके परिणाम
  • एक कार्यात्मक विश्लेषक, मेर्टन कहते हैं, वास्तव में, कुछ भी अनिवार्य नहीं है।
  • प्रकार्यात्मक विश्लेषण के  समकक्ष या विकल्प हो सकते हैं। दूसरे शब्दों में, बदले गए परिस्थितियों में, किसी दिए गए चीज़ द्वारा दी गई एक ही कार्य, किसी अन्य वस्तु द्वारा पूरी की जा सकती है।
  • उदाहरण के लिए, आधुनिक समाजों में जहां महिलाएं घर के बाहर भी काम करती हैं, परिवार के कुछ कार्यों जैसे कि बाल देखभाल अन्य संस्थानों द्वारा किया जा सकता है जैसे कि क्रीच।

Latent and Manifest Function :-

  • Functions– According to Merton, are defined as “those observed consequences which make for the adaptation or adjustment of a given system”.
  • Latent functions The Unintended and unrecognized consequences of social actions by the members of a social system.
  • Manifest functions The functions of a type of social activity that are known to and intended by the individuals involved in the activity.
  • To simplify, the Newspaper’s use as a manifest function is daily information however if it is used to light a fire or kill a mosquito, it is a latent use.
  • Manifest functions are conscious, deliberate and beneficial, the latent ones the unconscious, unintended and unbeneficial.
  • One social fact can have negative consequences for another social fact. To rectify this serious omission in early structural functionalism, Merton developed the idea of a dysfunction.
  • Merton, unanticipated consequences are actions both intended and unintended. Sociological analysis is required to uncover unintended consequences. In his 1936 essay, “The Unanticipated Consequences of Social Action”, Merton uncovered the wide field of human activity where things do not go as planned, and paradoxes and strange outcomes are seen.
  • Slavery may be functional in one situation or for one group but dsyfunctional in the other.
  • In his Social Theory and Social Structure(1967), Merton mentions Hopi Tribes (Native American , Arizona) RAIN DANCE appeases rain Gods yet the latent function is to reinforce the solidarity of the tribes.
  • मेर्टन के अनुसार, प्रकार्य “उन माने गए परिणामों के रूप में परिभाषित किया गया है जो किसी दिए गए सिस्टम के अनुकूलन या समायोजन के लिए बनाये गए हैं”।
  • अवयक्त प्रकार्य – एक सामाजिक प्रणाली के सदस्यों द्वारा सामाजिक कार्यों के अनजान और अपरिचित परिणाम ।
  • व्यक्त प्रकार्य –  गतिविधि में शामिल व्यक्तियों द्वारा ज्ञात और लक्षित एक प्रकार की सामाजिक गतिविधि के कार्य
  • सरल बनाने के लिए, अख़बार का उपयोग एक मैनिफेस्ट/ व्यक्त फ़ंक्शन के रूप में उपयोग दैनिक जानकारी है, हालांकि यदि इसका उपयोग आग लगाना या मच्छर को मारना है तो यह एक अवयक्त उपयोग है
  • व्यक्त कार्य  सचेत, जानबूझकर और फायदेमंद होते हैं हालांकि अवयक्त कार्य बेसुध, अनियंत्रित और अनिश्चित हैं।
  • एक सामाजिक तथ्य का किसी अन्य सामाजिक तथ्य के नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं। शुरुआती संरचनात्मक कार्यात्मकता में इस गंभीर चूक को सुधारने के लिए, मेर्टन ने दुष्प्रकार्य का विचार विकसित किया।
  • मेर्टन, अप्रत्याशित परिणाम दोनों इरादे और अनपेक्षित कार्य हैं। अनपेक्षित परिणामों को उजागर करने के लिए सामाजिक विश्लेषण की आवश्यकता है। अपने 1 9 36 के निबंध में, “अनियंत्रित नतीजे सामाजिक कार्य” में, मेर्टन ने मानव गतिविधि के विस्तृत क्षेत्र को उजागर किया जहां चीजें योजनाबद्ध नहीं होतीं, और विरोधाभास और अजीब परिणाम देखे जाते हैं।
  • दासता एक परिस्थिति में या एक समूह के लिए कार्यात्मक हो सकती है लेकिन दूसरे समूह के लिए दुष्प्रकार्य
  • अपने सोशल थ्योरी एंड सोशल स्ट्रक्चर (1 9 67) में, मेर्टन ने होपी जनजातियों (मूल अमेरिकी, एरिजोना) का उल्लेख किया है जो बारिश में नाचकर देवताओं को प्रसन्न करता है फिर भी अवयक्त कार्य जनजातियों की एकजुटता को मजबूत करना है।
  • मेर्टन दुनिया के सामान्य ज्ञान धारणा से परे जाने का तर्क देते हैं। अवयक्त कार्य, आपकी आंखें खोलता है, यह आपको अपने कई सामाजिक प्रथाओं और सांस्कृतिक मान्यताओं के गहरे, छिपे अर्थ को देखने में सक्षम बनाता है।

Dysfunctions-

  • Dysfunctions– Dysfunctions are those observed consequences which lessen the adaptation or adjustment of the system.
  • Modern India intends to be mobile, democratic,participatory and egalitarian. In such a society the institution of caste, far from having a function, has dysfunctions. Instead of intensifying the democratic ideal, caste tends to lessen the degree of mobility, democratisation and participation. That is why, castes may be classified as dysfunctional.
  • Merton argues that the assumptions that every aspect of the social system performs a positive function is not only premature, it may be incorrect also.
  • Merton says the concept of function involves the standpoint of the observer, not necessarily that of the participant.
  • Social function refers to observable objective consequences, not subjective dispositions.
  • A school child may think that he goes to school because he finds his friends there; but the function of school is something else; it is to add to and aid in the growth of knowledge that the society needs in order.
  • दुष्प्रकार्य– दुष्प्रकार्य वो देखे गए परिणाम हैं जो सिस्टम के अनुकूलन या समायोजन को कम करते हैं।
  • आधुनिक भारत लोकतांत्रिक, सहभागिता और समतावादी होने का इरादा रखता है। इस तरह के समाज में जाति संस्थान, एक समारोह होने से दूर, अक्षमता/ दुष्प्रकार्य है। लोकतांत्रिक आदर्श को तेज करने के बजाय जाति,  गतिशीलता, लोकतांत्रिककरण और भागीदारी की डिग्री को कम करने के लिए प्रेरित करती है। यही कारण है कि, जातियों को निष्क्रिय के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।
  • मेर्टन का तर्क है कि सामाजिक प्रणाली के हर पहलू सकारात्मक कार्य करते हों, ये न केवल समयपूर्व है, अपितु यह  गलत भी हो सकता है।
  • मेर्टन का कहना है कि कार्य की अवधारणा में पर्यवेक्षक का दृष्टिकोण शामिल है, जरूरी नहीं कि प्रतिभागी की।
  • सामाजिक कार्य, देखने योग्य उद्देश्य परिणामों को संदर्भित करता है ना की व्यक्तिपरक स्वभाव
  • एक बच्चा सोचता है कि वह स्कूल जाता है क्योंकि वह वहां अपने दोस्तों को पाता है; लेकिन स्कूल का कार्य कुछ और है; यह ज्ञान के विकास में सहायता करता  है जिसे समाज को क्रम में चाहिए।

Benifits of Latent and Manifest Functions-

  1. What seems irrational seems meaningful/जो तर्कहीन लगता है वह सार्थक लगता है
  2. New horizons of enquiry begin to emerge/पूछताछ के नए क्षितिज उभरने लगते हैं
  3. The realm of sociological knowledge expands/सामाजिक ज्ञान का दायरा फैलता है
  4. Established morals get challenged/स्थापित नैतिकता चुनौती दी जाती है

Conclusion and Criticism-

  • Merton contended that not all structures are indispensable to the workings of the social system. Some parts of our social system can be eliminated.
  • This helps functional theory overcome another of its conservative biases. By recognizing that some structures are expendable, functionalism opens the way for meaningful social change.
  • Our society, for example, could continue to exist (and even be improved) by the elimination of discrimination against various minority groups.
  • Merton claims that his analysis show how the culture and structure of society generates DEVIANCE.

Conclusion

  • Extremely limited content.
  • Failed to define positive deviance.
  • As per Cohen, it does not involve non ulitarian crime vandalism, street brawls.
  • Walter Miller argues, Criminal nature is not only for lower class however sub cultures also a reason to develop the  deviant behaviour. eg. Meenas, sansi etc.

मेर्टन ने तर्क दिया कि सभी संरचनाएं सामाजिक प्रणाली के कामकाज के लिए अनिवार्य नहीं हैं। हमारे सामाजिक तंत्र के कुछ हिस्सों को समाप्त किया जा सकता है।

यह कार्यात्मक सिद्धांत को इसके रूढ़िवादी पूर्वाग्रहों में से एक को दूर करने में मदद करता है। यह स्वीकार करके कि कुछ संरचनाएं व्यर्थ हैं, कार्यात्मकता सार्थक सामाजिक परिवर्तन के लिए रास्ता खोलती है।

उदाहरण के लिए, हमारा समाज विभिन्न अल्पसंख्यक समूहों के खिलाफ भेदभाव को समाप्त करके अस्तित्व में रह सकता है (और यहां तक कि सुधार भी किया जा सकता है)।

मेर्टन का दावा है कि उनके विश्लेषण से पता चलता है कि समाज की संस्कृति और संरचना कैसे डिवीजन उत्पन्न करती है

निष्कर्ष –

  • बेहद सीमित सामग्री
  • सकारात्मक विचलन को परिभाषित करने में विफल
  • कोहेन के अनुसार, इसमें गैर उपयोगितावादी अपराध बर्बरता, सड़क विवाद शामिल नहीं हैं
  • वाल्टर मिलर का तर्क है, आपराधिक प्रकृति न केवल निम्न वर्ग के लिए है, हालांकि उप संस्कृतियों में भी विचलित व्यवहार विकसित करने का एक कारण है। जैसे। मीनास, संसी आदि

 

 

Join Frontier IAS Online Coaching Center to prepare for UPSC/HCS/RAS Civil Service comfortably at your home at your own pace/time.

HCS(Prelims+Mains+Interview)   HCS Prelims(Paper 1+Paper 2)

IAS+HCS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    

  RAS+IAS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    RAS(Prelims+Mains+Interview)     RAS Prelims     UPSC IAS Prelims      UPSC  IAS (Prelims+Mains+Interview)

Click Here to subscribe Our YouTube Channel

Posted on Leave a comment

HCS 2018 Sociology Notes | Online Exam Preparation | PCS RAS Examination

HCS 2018 Sociology Notes | Online Exam Preparation | PCS RAS Examination

HCS 2018 Sociology Notes | Online Exam Preparation | PCS RAS Examination

Classification of Power:-

  • According to Weber, Power is defined as, “the chance of a man or a number of men to realize their own will in a communal action even against the resistance of others who are participating in the action”.
  • Power is an aspect of social relationships.
  • An individual or group do not hold power in isolation, they hold it in relation  to others.
  • Power is therefore, power over others.

Depending on the circumstances surrounding its use, sociologists classify power in two categories:

  • Legitimate Power: When power is used in a way that is generally recognised as socially right and necessary, it is called legitimate power.
  • Illegitimate Power: Power used to control others without the support of social approval is referred to as illegitimate power.
  • Authority is that form of power which is accepted as legitimate, as right and just, and therefore obeyed on that basis.
  • When power is legitimized it becomes authority and only then it is accepted by people voluntarily.
  • Coercion is that form of power which is not regarded as legitimate by those subject to it.
  • E.g. Govt. agents demanding and receiving sales tax from a shopkeeper are using legitimate power; gangsters demanding and receiving protection money from the same shopkeeper by threat of violence uses illegitimate power.
  • When power gets institutionalized and comes to be accepted as legitimate by those  on whom it is being exercised, it is termed authority.
  • Max Weber argued that the nature of authority is shaped by the manner in which legitimacy is acquired.
  • Weber identified three ideal types of authority systems:
    1. Traditional Authority
    2. Charismatic Authority
    3. Legal-Rational Authority

Traditional Authority

  • The traditional authority is the characteristic of those societies where the ‘traditional action’ is predominant.
  • Traditional action is based on established custom.
  • An individual acts in a certain way because of an ingrained habit, because things have always been done that way.
  • In such societies where traditional action is a predominant mode of behaviour, exercise of power is seen as legitimate when it is consonance with the tradition and conforms to the customary rules.
  • Such type of authority was termed by Weber as Traditional Authority.

Weber identified two forms of traditional authority:

  1. Patriarchalism
  2. Patrimonialism

Patriarchalism

  • In Patriarchalism, authority is distributed on the basis of gerontocratic principles.
  • Thus the right to exercise authority is vested in the eldest male member.
  • This type of authority is found in case of very small scale societies like the Bushmen of Kalahari desert or in case of extended kin groups in agrarian societies like lineage or joint families in India.

Patrimonialism

  • According to Weber, patriarchal domination has developed by having subordinate sons of the patriarch or other dependents take over land and authority from the ruler, and a patrimonial state can develop from it.
  • In the patrimonial states, such as Egypt under the Pharaohs, ancient China, the Inca state, the Jesuit state in Paraguay, or Russia under the czars, the ruler controls his country like a giant princely estate.
  • The master exercises unlimited power over his subjects, the military force and the legal system.
  • Patrimonial dominance is a typical example of the traditional exercise of power in which the legitimacy of the ruler and the relationships between him and his subjects are derived from tradition.
  • Patrimonialism is characterized by the existence of hereditary office of a king or a chief and an administrative staff consisting of courtiers and favourites who together from a nascent bureaucracy.
  • The king or the chief exercises absolute and arbitrary power according to customary rules.

शक्ति का वर्गीकरण –

  • वेबर ने, शक्ति को, “किसी एक व्यक्ति व व्यक्तियों के एक समूह का एक सांप्रदायिक क्रिया में उनके स्वयं के इच्छा को उसी क्रिया में भाग ले रहे अन्य के विरोध के विरुद्ध पहचानने के अवसर” के रूप में परिभाषित किया है |
  • शक्ति सामाजिक संबंधों का एक पहलू है |
  • एक व्यक्ति या समूह शक्ति अधिग्रहण व्यक्तिगत सम्बन्ध में नहीं, बल्कि अन्य के संबंधों में करते हैं |
  • इसलिए शक्ति, अन्यों के ऊपर शासन है |

इसके प्रयोग के आसपास की परिस्थितियों के आधार पर समाजशास्त्रियों ने शक्ति का वर्गीकरण दो श्रेणियों में किया है :

  • वैध शक्ति : जब शक्तियों का प्रयोग उस विधि में किया जाता है जो कि सामान्यतः सामाजिक रूप से उचित व अनिवार्य हो, तो इसे वैध शक्ति कहा जाता है |
  • अवैध शक्ति : जब शक्तियों का प्रयोग सामाजिक सहमति के बिना दूसरों पर नियन्त्रण करने के लिए किया जाता है तो इसे अवैध शक्ति कहा जाता है |
  • जब शक्ति वैध होती है तो यह प्राधिकार बन जाता है और सिर्फ तभी लोगों द्वारा इसे एच्छिक रूप से स्वीकार किया जाता है |
  • उदाहरण के लिए सरकारी सेवकों का दुकानदारों से विक्रय कर की मांग करना व उसे प्राप्त करना, वैध शक्तियों का प्रयोग करना है | वही दूसरी तरफ गैंगस्टर्स का हिंसा के प्रयोग द्वारा धमकी देकर समान दुकानदारों से मांग करना व उसे प्राप्त करना अवैध शक्तियों का प्रयोग करना है |
  • जन शक्तियां संस्थात्मक हो जाती है और उनके द्वारा, जिनपर इनका प्रयोग किया जाता है, इसे वैध रूप में स्वीकार किया जाता है तो इसे प्राधिकार शब्द से जाना जाता है |
  • मैक्स वेबर ने तर्क दिया कि प्राधिकार का स्वरूप उन तरीकों द्वारा निर्मित होता है जिसमें इसे वैधता की आवश्यकता होती है |
  • वेबर ने प्राधिकार प्रणालियों को तीन आदर्श प्रकार की व्याख्या की हैं :
    1. पारंपरिक प्राधिकार
    2. करिश्माई प्राधिकार
    3. क़ानूनी-तर्कसंगत प्राधिकार

प्राधिकार प्रणालियाँ

  • पारंपरिक प्राधिकार उन समाजों की विशेषता है जहाँ ‘पारंपरिक क्रिया’ प्रभावी है |
  • पारंपरिक क्रिया स्थापित रीतियों पर आधारित होती है |
  • एक व्यक्ति एक पक्की आदत के कारण एक निश्चित तरीके से कार्य करता है, क्योंकि चीजें हमेशा उन्ही तरीकों से की जाती रही हैं |
  • ऐसे समाजों में जहाँ पारंपरिक क्रिया व्यवहार का एक प्रभावी तरीका है, तो शक्ति का प्रयोग वैध रूप में देखा जाता है जब यह परंपरा के अनुरूप होती है व परंपरागत नियमों के अनुरूप होता है |
  • इस प्रकार के प्राधिकार को वेबर ने पारंपरिक प्राधिकार के रूप में परिभाषित किया है |
  • वेबर ने पारंपरिक प्राधिकार के दो प्रारूपों की व्याख्या की है :
  1. पित्तंत्रात्वाद
  2. वंशवाद

पित्तंत्रात्वाद

  • पित्तंत्रात्वाद में, अधिकार का वितरण वृद्ध-तंत्री सिद्धांतों के आधार पर किया जाता है |
  • इस प्रकार शक्तियों के प्रयोग का अधिकार सबसे बुजुर्ग सदस्य में निहित होता है |
  • इस प्रकार के प्राधिकार लघु स्तरीय समाजों जैसे कालाहारी मरुभूमि के बुशमेन या भारत में संयुक्त परिवारों या वंशावली जैसे कृषि समाजों में विस्तारित परिजन समूह के मामले में देखा जा सकता है |

वंशवाद

  • वेबर के अनुसार, कुलपति या अन्य आश्रितों के अधीनस्थ के बेटे द्वारा पितृसत्तात्मक वर्चस्व का विकास हुआ है जो कि शासक से भूमि व अधिकार को ले लेते हैं व इससे एक वंशवाद राष्ट्र की स्थापना की जा सकती है |
  • सत्तारूढ़ राष्ट्रों में जैसे मिस्त्र के फिरौन, प्राचीन चीन, इन्का राज्य, पैराग्वे में ईसाई राज्य या रूस के ज़ार में शासक अपने देश का नियंत्रण एक विशाल राजसी संपत्ति की तरह करता है |
  • शासक अपने प्रजा, सैन्य शक्ति व क़ानूनी प्रणाली के ऊपर असीमित शक्तियों का प्रयोग करता है |
  • वंशावली का प्रभुत्व शक्ति के पारंपरिक प्रयोग का एक प्रमुख उदाहरण है जिसमें शासक की वैधता और उसके व उसके प्रजा के बीच के सम्बन्ध परंपरा से उत्पन्न होते हैं |
  • वंशवाद को एक राजा या एक प्रमुख के वंशानुगत पद के अस्तित्व और दरबारियों व प्रियों से सजे हुए प्रशासनिक स्टाफ, जो  एक नए नौकरशाही से बनता है, के द्वारा बताया जाता है |
  • राजा या प्रमुख परम्परावादी नियमों के अनुसार पूर्ण व विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग करता है |

Charismatic Authority

  • Charisma refers to a certain quality of an individual’s personality by virtue of which he is set apart from ordinary men and treated as endowed with supernatural, superhuman or exceptional power or qualities.
  • These qualities are regarded as of divine origin and on the basis of them the individual concerned is treated as a leader and is revered.
  • Charismatic authority gains prominence in the times of crisis when other forms of authority prove inadequate to deal with the situation.
  • At such times, heroes who help to win the wars or people with the reputation for therapeutic wisdom come to regarded as saviours in times of epidemics or prophets in times of general moral crisis come to acquire charismatic authority.
  • The charismatic staff is chosen in terms of the charismatic qualities of its members not on the basis of social privilege or from the point of view of social loyalty.
  • There is nothing as appointment, career or promotion. There is only a call of the leader on the basis of his charismatic qualities.
  • There is no hierarchy, the leader merely intervenes in general or in individual cases when he considers the members of his staff inadequate to a task which they have been entrusted with.
  • Often there is no definite sphere of authority and of competence though there may be territorial mission.
  • There is no such thing as salary or benefit. Followers lived primarily in communal relationship with their leaders.
  • There is no system of formal rules or legal principles or judicial process oriented to them.
  • The charismatic movement, with its charismatic authority differs on several important points from both traditional organizations and bureaucracy.
  • Charisma is a force that is fundamentally outside everyday life and whether it be political or religious charisma, it is a revolutionary force in history that is capable of breaking down both traditional and rational patterns of living.
  • The forces of a charismatic leader lies outside the routine of everyday life and the problem arises when it is incorporated in a routine everyday life.
  • Weber termed it as “Routinization of Charisma” happens when the leader and the followers want to make ‘it possible to participate in normal family relations or at least to enjoy a secure social position.
  • When this happens charismatic message is changed into dogma, doctrine, regulations, law or rigid tradition and the charismatic movement develops into either a traditional or a bureaucratic organization or a combination of both.

करिश्माई प्राधिकार

  • करिश्मा का अर्थ एक व्यक्ति के व्यक्तित्व के एक निश्चित विशेषता जिसके कारण उसे साधारण व्यक्तियों से अलग कर लिया जाता है और अलौकिक, अमानवीय या असाधारण शक्तियों या विशेषताओं से संपन्न की तरह माना जाता है |
  • इन विशेषताओं को दिव्य मूल की तरह माना जाता है और इसके आधार पर सम्बंधित व्यक्ति को नेता माना जाता है और सम्मानित किया जाता है |
  • संकट के समय करिश्माई प्राधिकरण का महत्त्व कई गुना बढ़ जाता है जब परिस्थिति से निपटने के लिए प्राधिकरण के अन्य रूप अपर्याप्त साबित हो जाते हैं |
  • ऐसे परिस्थितियों में, वे नायक जो युद्ध जीतने में सहायक होते हैं या चिकित्सीय ज्ञान के लिए प्रसिद्ध व्यक्ति महामारी के समय रक्षक के रूप में माने जाते हैं या सामान्य नैतिक संकट, जो कि करिश्माई प्राधिकार के लिए उत्पन्न होते हैं, के समय भविष्यवक्ता के रूप में माने जाते हैं |
  • करिश्माई स्टाफ इसके सदस्यों के करिश्माई गुणों के सन्दर्भों में चयन किये जाते हैं न कि सामाजिक विशेषाधिकार के आधार पर या सामाजिक वफादारी के दृष्टिकोण से |
  • इसमें नियुक्ति, करियर या पदोन्नति जैसी कोई परिस्थिति नहीं होती है | इसमें सिर्फ और सिर्फ एक सदस्य की करिश्माई गुणों के आधार पर नेता के रूप में उसका चयन किया जाता है |
  • इसमें कोई पदक्रम नहीं होता है, नेता सिर्फ सामान्य या व्यक्तिगत मामलों में ही हस्तक्षेप करता है जब वह अपने स्टाफ के सदस्यों को उस कार्य के लिए अपर्याप्त मानता है जो उन्हें सौंपी जाती है |
  • प्रायः प्राधिकार या क्षमता का कोई निश्चित क्षेत्र नहीं होता है, हालाँकि कोई क्षेत्रीय मिशन हो सकता है |
  • इसमें वेतन या लाभ जैसी कोई वस्तु नहीं होती है | अनुयायी अपने नेताओं के साथ सांप्रदायिक रिश्ते में मुख्यतः रहते हैं |
  • इसमें लोगों से जुड़े हुए औपचारिक नियमों या क़ानूनी सिद्धांतों या न्यायिक प्रक्रिया की कोई व्यवस्था नहीं होती है |
  • करिश्माई आन्दोलन, अपने करिश्माई प्राधिकार के साथ कई महत्वपूर्ण दृष्टिकोणों जैसे कि पारंपरिक संगठनों व नौकरशाही दोनों में ही परिवर्तित होते हैं |
  • चाहे यह करिश्मा राजनीतिक हो या धार्मिक, यह एक ताकत है जो कि मूल रूप से दैनिक जीवन से अलग होता है और यह इतिहास में एक क्रांतिकारी ताकत है जो लोगों के पारंपरिक व विवेकी दोनों तरह के शैलियों को तोड़ने में सक्षम है |
  • एक करिश्माई नेता की शक्तियां दैनिक जीवन के दिनचर्या से अलग होती हैं और समस्या तब उत्पन्न होती हैं जब इसे दैनिक जीवन के दिनचर्या के साथ शामिल किया जाता है |
  • वेबर ने कहा है कि “करिश्मा का दिनचर्याकरण” तब होता है जब नेता व उसके अनुयायी चाहते हैं कि यह संभव हो कि सामान्य पारिवारिक सम्बन्ध भी इसमें भागीदार बनें व या कम से कम एक सुरक्षित सामाजिक स्थिति के वे हिस्सेदार बनकर उसका आनंद लें |
  • जब यह स्थिति उत्पन्न होती है तो करिश्माई सन्देश, सिद्धांतवाद या डॉक्ट्रिन, विनियमन, कानून या अनम्य परंपरा में परिवर्तित हो जाता है और करिश्माई आन्दोलन या तो एक पारंपरिक या एक नौकरशाही संगठन या दोनों का एक समुच्चय में विकसित हो जाता है |

Reasons behind instability of charismatic authority

  • Charismatic authority is the product of a crisis situation and lasts so long as the crisis lasts. Once the crisis is over, it has to adapted to everyday matters.
  • Striving for security – This means legitimizing on one hand of the position of authority and on the other hand of the economic advantages enjoyed by the followers of the leader.
  • Objective necessity of adaptation of the patterns of order, of the organization and of the administrative staff to the normal, everyday needs and conditions of carrying on the administration.
  • There is a problem of succession which renders charismatic authority unstable since basis of authority is the personal charisma of the leader.
  • Discontinuity is inevitable since it is not easy to find a successor who also possesses those charismatic qualities.
  • One of the solutions to the problem of discontinuity is to transform the charisma of the individual into the charisma of the office which can be translated to every incumbent of the office by ritual means. E.g. the transmission of the charisma of a royal authority by anointing or by coronation.

करिश्माई प्राधिकरण के अस्थायित्व के कारण

  • करिश्माई प्राधिकरण एक आपातकालीन परिस्थिति की देन है और जब तक यह संकट नहीं ख़त्म हो जाता है तब तक यह प्राधिकरण भी चलता रहता है | एक बार संकट के ख़त्म होने के बाद, इसे दैनिक मामलों को अपनाना ही पड़ता है |
  • सुरक्षा हेतु प्रयासरत – इसका अर्थ है कि प्राधिकार के एक तरफ वैध होना और दूसरी तरफ नेता के अनुयायी द्वारा आर्थिक लाभों का आनंद लेना |
  • आदेश, संगठन व प्रशासनिक स्टाफ के शैलियों को सामान्य, दैनिक जरूरतों व प्रशासन के संचालित परिस्थितियों में अपनाये जाने का अनिवार्य लक्ष्य |
  • इसमें उत्तराधिकार की समस्या होती है जो कि करिश्माई प्राधिकरण को अस्थायी बना देता है क्योंकि प्राधिकरण का आधार नेता का निजी करिश्मा होता है |
  • इसकी निरंतरता का समापन होना अपरिहार्य है क्योंकि इसमें यह संभव नहीं होता है कि समान करिश्माई गुणों वाले किसी एक उत्तराधिकारी का चयन किया जा सके |
  • निरंतरता के समापन का एक समाधान यह है कि निजी करिश्मा को पद की करिश्मा में परिवर्तित कर दिया जाए, जिसका हस्तांतरण अनुष्ठानी माध्यमों द्वारा पद के प्रत्येक पदधारी में किया जा सकता है | उदाहरण के लिए एक शाही प्राधिकरण के करिश्मा का अभिषेक या राज्याभिषेक द्वारा संचरण |

 

Join Frontier IAS Online Coaching Center to prepare for UPSC/HCS/RAS Civil Service comfortably at your home at your own pace/time.

HCS(Prelims+Mains+Interview)   HCS Prelims(Paper 1+Paper 2)

IAS+HCS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    

  RAS+IAS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    RAS(Prelims+Mains+Interview)     RAS Prelims     UPSC IAS Prelims      UPSC  IAS (Prelims+Mains+Interview)

Click Here to subscribe Our YouTube Channel

Posted on Leave a comment

HCS Sociology 2018 Exam | Study Content for Online Exam Preparation

HCS Sociology 2018 Exam | Study Content for Online Exam Preparation

HCS Sociology 2018 Exam | Study Content for Online Exam Preparation

Max Weber-

Reasons for dissatisfaction of Weber with Marx’s Historical- Materialist analysis:

  • Weber thought that it was highly unlikely that history develops according to any kind of grand plan. For Weber, human action is much more contingent than this in the sense that nobody can predict what all circumstances and contexts of action will be. Regarding Marx’s idea, for ex., that capitalism must follow feudalism, Weber pointed out that capitalism is not unique to modern society. Modern industrial capitalism, is just one type, one variety of the different kinds of capitalism that, under different historical circumstances, could have developed.
  • Weber said that historical-materialist approach gave too much attention to the economic realm and thus underestimated what goes on in other aspects of social life. To understand the origins of modern capitalism, it is necessary to look at developments in the political, legal and religious spheres as well as in the economic sphere.
  • Materialist theories inevitably give priority to material phenomena, ideational phenomena, including ideas, values and beliefs, but also the way social actors construct intellectual representations of reality in their mind, also need to be taken into account.

Weber provided an alternative to historical-materialist approach which can be studied as-

  • his comments about the development of a new kind of rationality, which became integral to the Western world view from the 16th century onwards;
  • his detailed description in The Protestant Ethic and the Spirit of Capitalism of how new variant of the business or commercial spirit of capitalism coincided with the emergence of a particular kind of Protestant religious ethic in Northern Europe at around the same time;
  • his comments about the inevitable spread of bureaucracy.

मैक्स वेबर –

मार्क्स के ऐतिहासिक-भौतिकवादी विश्लेषण से वेबर की असंतुष्टि के कारण :

  • वेबर ने सोचा कि यह बहुत असंभव है कि इतिहास का विकास किसी विराट योजना के साथ होता है | वेबर के लिए, मानव क्रिया इतनी आकस्मिक है कि कोई यह अनुमान नहीं लगा सकता कि कार्यों की परिस्थितयाँ तथा सन्दर्भ क्या होंगे | मैक्स के विचार के अनुसार,उदाहरण के लिए- पूँजीवाद को सामंतवाद का अवश्य अनुसरण करना चाहिए, वेबर ने बताया कि   आधुनिक समाज के लिए पूँजीवाद अनन्य नहीं है| आधुनिक औद्योगिक पूँजीवाद, विभिन्न प्रकार के पूँजीवादों का केवल एक प्रकार, केवल एक किस्म है, जो विभिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों के अंतर्गत विकसित हो सकता था |
  • वेबर ने कहा कि ऐतिहासिक-भौतिकवाद दृष्टिकोण ने आर्थिक क्षेत्र पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया तथा इस प्रकार जीवन के अन्य पहलुओं में क्या चल रहा है, उसे कम करके आंका गया | आधुनिक पूंजीवाद के मूल को समझने के लिए, राजनीतिक, कानूनी, धार्मिक क्षेत्र के साथ-साथ आर्थिक क्षेत्र में भी विकास को देखना आवश्यक है |
  • भौतिकवादी सिद्धांत भौतिक घटनाओं, विचारधारात्मक घटनाओं जिनमें विचार, मूल्य तथा विश्वास शामिल हैं, उनको अधिक प्राथमिकताएं देते हैं , किन्तु जिस तरह सामाजिक कर्ताओं ने उनके दिमाग में बौद्धिक प्रतिनिधित्व का निर्माण किया है, उसे भी ध्यान में रखना चाहिए |

वेबर ने ऐतिहासिक-भौतिकवादी दृष्टिकोण का एक विकल्प प्रदान किया, जिसका इस तरह अध्ययन किया जा सकता है –

  • नयी तरह की तर्कसंगतता के विकास के बारे में उनकी टिप्पणियां, जो 16वीं शताब्दी के बाद से  पश्चिमी दुनिया के विचारों का अभिन्न अंग बन गयी |
  • प्रोटेस्टेंट नैतिक सिद्धांतों तथा पूँजीवाद की भावना के बारे में उनका विस्तृत विवरण, कि किस प्रकार नए तरह के व्यापार अथवा पूंजीवाद की वाणिज्यिक भावना का उद्भव उत्तरी यूरोप में एक ही समय में विशेष प्रकार के प्रोटेस्टेंट नैतिक सिद्धांतों के उदय के साथ हुआ|
  • नौकरशाही के अनिवार्य प्रसार के बारे में उनकी टिप्पणियां |

Rationality:

  • Weber agreed with Marx that modern capitalism had become the dominant characteristic of modern industrial society. But for Weber, the originating cause, the fundamental root of this development, was not ‘men making history’ or ‘the class struggle’ but the emergence of a new approach to life based around a new kind of rational outlook.
  • The main intention of the new rationality was to replace vagueness and speculation with precision and calculation.
  • The new rationality was all about controlling the outcomes of action, of eliminating fate and chance, through the application of reason.
  • Weber called the new outlook instrumental rationality because it took the degree to which it enabled social actors to achieve the ends they had identified as its main criteria for judging whether an action was or was not rational.
  • Instrumental rationality was also a ‘universal rationality’ as it affected the way in which decisions to act were made, not just in economic affairs, but across the full spectrum of activity.

तर्कसंगतता :

  • वेबर मार्क्स से सहमत थे कि पूँजीवाद आधुनिक औद्योगिक समाज की प्रमुख विशेषता बन चुका था | किन्तु वेबर के लिए, उत्पत्ति का कारण, इस विकास की बुनियादी जड़, मानव निर्माण का इतिहास अथवा वर्ग संघर्ष नहीं था बल्कि एक नए प्रकार के तर्कसंगत दृष्टिकोण के आधार पर उभरा वाला जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण था |
  • नयी तर्कसंगतता का मुख्य उद्देश्य अस्पष्टताओं तथा अटकलों को गणना तथा यथार्थता के द्वारा विस्थापित करना था |
  • नयी तर्कसंगतता कारण के अनुप्रयोग के माध्यम से कार्य के परिणामों को नियंत्रित करने, भाग्य तथा इत्तेफाक को समाप्त करने के बारे में थी |
  • वेबर ने नए दृष्टिकोण को सहायक तर्कसंगतता कहा क्योंकि इसने वह सीमा लिया जिसके लिए इसने सामाजिक कर्ताओं को उन छोरों को प्राप्त करने में सक्षम बना दिया जिनको उन्होंने “कोई कार्य तर्कसंगत है या नहीं” इसकी जांच करने हेतु मुख्य मापदंड के रूप में चिन्हित किया था |
  • सहायक तर्कसंगतता एक सार्वभौमिक तर्कसंगतता भी थी क्योंकि इसने उस प्रक्रिया को प्रभावित किया जिसमें कार्य करने के निर्णय लिए जाते थे, ना केवल आर्थिक मामलों में बल्कि क्रिया के समूचे वर्णक्रम में |

Rationalisation:

  • The term ‘rationalisation’ was used by Weber to describe what happens when the different institutions and practices that surround social action take on the techniques of instrumental rationality.
  • Weber agreed with Marx about the great significance for historical development of developments in the economic sphere, he argued that the massive expansion of the economic sphere as it entered its industrial stage was itself a consequence and not a cause of the spread of the new instrumental rationality.
  • Weber noted that the uptake of instrumental rationality through rationalisation can be seen to be a driving force behind all forms of modernisation in modern society.
  • While factors identified by Marx, such as property relations, class conflict and development in the means of production, play an important role in how, at a lower and more descriptive level of analysis, the specific consequences are worked out, each of these is, according to Weber, an outlet for the underlying urge to become increasingly rational.
  • Recalling Durkheim’s analysis of social solidarity and the new individualism, one might say that the instrumental rationality identified by Weber provides an important source of collective consciousness in modern society. Rationalisation and its consequences regulate the behaviour of social actor and thus contribute to social order.

युक्तिकरण :

  • शब्द “युक्तिकरण ” का इस्तेमाल वेबर के द्वारा इस चीज को परिभाषित करने के लिए किया गया था कि “क्या होता है जब विभिन्न संस्थाएं तथा प्रथाएं जिनसे सामाजिक क्रिया घिरी होती है, सहायक तर्कसंगतता की तकनीक को ग्रहण करती हैं |
  • वेबर ने आर्थिक क्षेत्र के विकास में ऐतिहासिक विकास के प्रमुख महत्व के संबंध  मार्क्स के साथ सहमति व्यक्त की, उन्होंने तर्क दिया कि आर्थिक क्षेत्र का व्यापक विस्तार, इसके औद्योगिक चरण में पंहुचने का स्वयं एक परिणाम था ना  कि नयी औद्योगिक तर्कसंगतता के प्रसार का कारण था |
  • वेबर ने कहा कि युक्तिकरण के माध्यम से सहायक तर्कसंगतता का उदय आधुनिक समाज में आधुनिकीकरण के सभी रूपों के पीछे की एक प्रेरक शक्ति के रूप में देखी जा सकती है |
  • मार्क्स के द्वारा चिन्हित कारक, जैसे कि संपत्ति सम्बन्ध, वर्ग संघर्ष, तथा उत्पादन के साधनों में विकास, विश्लेषण के निम्नतर तथा विवरणात्मक स्तर पर,  किस प्रकार विशिष्ट परिणामों का अर्थ निकाला जाता है, इसमें एक महवपूर्ण भूमिका निभाते हैं | वेबर के अनुसार, इनमें से प्रत्येक तेजी से तर्कसंगत बनने की अन्तर्निहित आवश्यकता के लिए एक बहिर्द्वार हैं |
  • दुर्खीम के सामाजिक एकता और व्यक्तिवाद के विश्लेषण को याद करते हुए, कोई व्यक्ति कह सकता  है कि वेबर के द्वारा चिन्हित तर्कसंगतता आधुनिक समाज में सामूहिक चेतना का एक महत्वपूर्ण स्रोत प्रदान करती है | तर्कसंगतता तथा इसके परिणाम सामाजिक कर्ता के व्यवहार को विनियमित करते हैं तथा इस प्रकार सामाजिक व्यवस्था में योगदान देते हैं |

HCS Sociology 2018 Exam
Formal and substantive rationality:

  • Weber makes a distinction between the rationality of something in terms of how useful it is in a purely practical sense (its formal reality) and how rational it is in terms of the ends it serves (its substantive reality).
  • Ex., It is evident that the industrial division of labour is a more rational way of producing things than feudal agriculture. What is less clear is that whether the decision to apply this type of organisation is entirely rational one given that there is no guarantee that the general quality of life is also bound to improve.
  • For Weber, one of the most difficult challenges of social theory is to account for the judgements social actors make, not so much over the best means for achieving something, but over which ends they feel are worth pursuing.
  • The potential conflict between formal and substantive rationality is itself a consequence of the modernist perspective that emerged from the European Enlightenment. In pre-modernity crucial decisions about ultimate ends simply did not arise because the originating force in the universe as considered was nature or God. Having displaced nature with society and having marginalised the notion of the divine presence with the introduction of a strong concept of human self-determination, social actors in modern society have to make choices that have been created by powerful new technical means at their disposal.
  • Reflecting the instrumentality of the new outlook, Weber felt that as social actors become more and more obsessed with expressing formal rationality by improving the techniques they have for doing things, they become less and less interested in why they are doing them. The connection between means and ends becomes increasingly weakened even to the extent that ends come to be defined in terms of the unquestioned desirability of developing yet more means.
  • Marx had defined social conflict in terms of the struggle for economic resources, Weber added that important struggles also took place between one value system and another. Capitalism dominated modern society not because it is good at developing new techniques for producing things (it expresses very high levels of formal rationality, or, in Marx terms, is very dynamic in developing the means of production) but because it engages sufficiently at the level of ideas for social actors to believe that this is a rational way to proceed.

The rational iron cage:

  • Weber regrets the loss of high ideals and of meaning in existence that results from rationalization.
  • Modern man is trapped in a rational “iron cage of commodities and regulations” and he has lost his humanity. At the same time, he believed that he has achieved the highest stage of development.

औपचारिक तथा मूल तर्कसंगतता :

  • वेबर किसी चीज की तर्कसंगतता के बीच इस संदर्भ में भेद करते हैं कि यह शुद्धतया व्यावहारिक रूप से कितनी उपयोगी है (इसकी औपचारिक वास्तविकता ) तथा जिसे यह सेवा प्रदान करती है, उस छोर के लिए यह कितनी तर्कसंगत (इसकी मूल वास्तविकता )  है |  
  • उदाहरण – यह स्पष्ट है कि श्रम का औद्योगिक विभाजन सामंती कृषि की तुलना में वस्तुओं के उत्पादन का अधिक तर्कसंगत तरीका है | वह चीज जो कम स्पष्ट है वह यह है कि क्या इस तरह की व्यवस्था को लागू करने का निर्णय पूरी तरह से तर्कसंगत निर्णय है अथवा नहीं,  जबकि जीवन की सामान्य गुणवत्ता भी बेहतर होने के लिए बाध्य है |
  • वेबर के लिए, सामाजिक सिद्धांत की सबसे मुश्किल चुनौतियों में से एक सामाजिक कर्ताओं द्वारा लिए गए निर्णयों के प्रति उत्तरदायी होना है, किसी चीज को प्राप्त करने के सर्वोत्तम साधनों के लिए नहीं , बल्कि उन छोरों के प्रति जिनका पीछा करना वे उचित समझते हैं |
  • औपचारिक तथा मूल तर्कसंगतता के बीच का संघर्ष स्वयं आधुनिकतावादी विचारधारा का एक परिणाम है जो यूरोपीय ज्ञान से उभरा है | आधुनिकता के पूर्व अंतिम छोरों के बारे में महत्वपूर्ण विचारों का उदय नहीं हुआ क्योंकि ब्रह्माण्ड में उत्पत्ति की शक्ति के रूप में  प्रकृति या ईश्वर को माना जाता था | समाज द्वारा प्रकृति के विस्थापन तथा मानव आत्म-निर्णय की मजबूत अवधारणा के आगमन के साथ दैवीय उपस्थिति की धारणा को हाशिये पर रखते हुए, आधुनिक समाज में सामाजिक कर्ता को चुनाव करना पड़ता है, जिनका निर्माण उनकी सेवा में नए शक्तिशाली तकनीकी साधनों के द्वारा किया गया है |
  • नए दृष्टिकोण की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाते हुए, वेबर ने महसूस किया कि चूँकि सामाजिक कर्ता चीजों को करने की तकनीकों में सुधार से औपचारिक तर्कसंगतता को व्यक्त करने की आसक्ति से बहुत ज्यादा युक्त हो जाते हैं, इसलिए वे  उन चीजों को करने के तरीकों में कम से कम रूचि लेते हैं | साधनों तथा छोरों के बीच जुड़ाव तेजी से उस सीमा तक कम हो जाता है की छोरों को विकासशील किन्तु अधिक साधनों की निर्विवाद वांछनीयता के सन्दर्भ में परिभाषित किया जाने लगता है |
  • मार्क्स ने वर्ग संघर्ष को आर्थिक संसाधनों के लिए संघर्ष के रूप में परिभाषित किया था | वेबर ने उसमें जोड़ा कि एक मूल्य प्रणाली तथा दूसरे मूल्य प्रणाली के बीच संघर्ष भी हुए | पूँजीवाद आधुनिक समाज पर इसलिए हावी नहीं हुआ कि यह वस्तुओं के उत्पादन  हेतु नयी तकनीकों को विकसित करने में अच्छा है (यह बेहद उच्च  औपचारिक तर्कसंगतता को अभिव्यक्त करता है, अथवा, मार्क्स के अनुसार यह उत्पादन के साधनों के विकास में बेहद गतिशील है ) बल्कि इसलिए क्योंकि यह सामाजिक कर्ताओं हेतु विचारों के स्तर पर पर्याप्त रूप से संलग्न होता है ताकि वे यह मान लें कि आगे बढ़ने के लिए यह एक तर्कसंगत तरीका है |

तर्कसंगतता का लौह पिंजरा : .

  • वेबर उच्च आदर्शों तथा अस्तित्व में अर्थ की हानि के लिए खेद व्यक्त करते हैं, जो युक्तिकरण के परिणामस्वरूप होता है |
  • आधुनिक व्यक्ति वस्तुओं तथा नियमों के एक तर्कसंगत लौह पिंजरे में फंसा हुआ है तथा उसने अपनी मानवता खो दी है | इसी समय, वह मानता था कि उसने विकास की सबसे ऊँची अवस्था को प्राप्त कर लिया है |

 

 

Join Frontier IAS Online Coaching Center to prepare for UPSC/HCS/RAS Civil Service comfortably at your home at your own pace/time.

HCS(Prelims+Mains+Interview)   HCS Prelims(Paper 1+Paper 2)

IAS+HCS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    

  RAS+IAS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    RAS(Prelims+Mains+Interview)     RAS Prelims     UPSC IAS Prelims      UPSC  IAS (Prelims+Mains+Interview)

Click Here to subscribe Our YouTube Channel

Posted on Leave a comment

HCS 2018 Online Exam | Sociology Max Weber – Social action, Ideal types Study Notes

HCS 2018 Online Exam | Sociology Max Weber – Social action, Ideal types Study Notes

HCS 2018 Online Exam | Sociology Max Weber – Social action, Ideal types Study Notes

Max Weber:-

Max Weber (1864 – 1920):

  • Weber is accused of producing bourgeois social theory as opposed to the proletarian social theory of Marx. He came from a wealthy established family, and thus had the benefits of a privileged education and good social and career prospects.
  • Weber worked in a society in which the dominant political issue was the decline of the liberal, Protestant and highly individualistic attitude of the established middle class, and the emergence of an authoritarian, militarised, bureaucratic regime that accompanied the rise of the ‘new Germany’.
  • For Weber and many of his contemporaries, the demise of traditional liberal values of personal responsibility and autonomy, and their replacement with a much more paternalistic notion of national service, was a matter of great concern.
  • Weber become involved in the heated discussions about the role of social-scientific study, and the difference between this and the natural sciences, taking place in Germany around 1900. These philosophical debates began with the revival of one of the old chestnuts of philosophy and social theory, which is the distinction between empirical knowledge and rational knowledge.

मैक्स वेबर:-

मैक्स वेबर (1864-1920) :

  • वेबर को मार्क्स के श्रमिक सामाजिक सिद्धांत के खिलाफ पूंजीवादी सामाजिक सिद्धांत को प्रतिपादित करने का आरोपी माना जाता है  | वह एक स्थापित धनी परिवार से थे और इस प्रकार उनके पास एक अच्छी शिक्षा का लाभ था और अच्छे सामाजिक व करियर संभावनाओं का भी |
  • वेबर एक ऐसे समाज में कार्य करते थे जिसमें स्थापित मध्यवर्ती वर्ग के उदारवादी, प्रतिवादी व अत्यधिक व्यक्तिगत रवैया और एक सत्तावादी, सैन्य, नौकरशाह शासन का उदय, जिससे ‘नए जर्मनी’ का उदय हुआ, महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा था |
  • वेबर और उनके समकालीनों के लिए व्यक्तिगत दायित्व व स्वायत्तता के पारंपरिक उदारवादी मूल्यों की समाप्ति और राष्ट्रीय सेवा के एक अधिक पैतृक धारणा के साथ उन्हें बदलना एक अधिक चिंता का विषय था |
  • वेबर सामाजिक-वैज्ञानिक अध्ययन के भूमिका के महत्वपूर्ण चर्चा में शामिल हुए, और इस व प्राकृतिक विज्ञानों के बीच अंतर 1900 के आसपास जर्मनी में आने लगा था | इन दार्शनिक वादों की शुरुआत दर्शन और सामाजिक सिद्धांत के एक पुराने सुर्खी के पुनर्जीवन के साथ हुई, जो कि अनुभवजन्य ज्ञान विवेकी ज्ञान के बीच अंतर है |

Immanuel Kant (1724 – 1804):

  • A German philosopher, Immanuel Kant argued that while knowledge of the real world was something that comes through our physical senses, it can only be made sense of once this information has been structured and organised by the mind. Kant’s position is dualistic because he accepts the necessary combination of sense perception and cognitive reason. Hegel is monistic as he emphasises the absolute primacy of intellectual reason alone.
  • Kant tried to reconcile his rationalist view with the strict objectivism and empiricism of John Locke (1632 – 1704) and David Hume (1711 – 1796) who argued that all our ideas and concepts, including both physical sensations and intellectual reflections, are derived from practical experience of the world around us and not from pre-existing capacities of the human mind. From an empiricist viewpoint, there cannot be any knowledge or consciousness until after we have had physical contact with the material world around us. This dispute over 2 kinds of knowledge is useful to study the nature of social-scientific knowledge.
  • Kant argued that the free individual was intuitively capable of moral self-direction. As natural objects, the behaviours of individuals could be investigated according to the same scientific methodologies that would be appropriate for any natural object. As moral subjects, individuals are not part of the natural world, for God has given the individual free choice to act in either a moral or an immoral fashion. A civilized society is one that encourages individuals to act morally. But society cannot deterministically generate morality because moral action is always an outcome of free will.
  • The Kantian emphasis on the dualism of the individual – the view of man as both natural object and moral subject – strongly influenced Simmel and Weber. For Simmel and Weber, sociology, unlike biology or chemistry, had to come to terms with the fact that, to some extent, the individual was not, and could not be, constrained by determinate laws.
  • The younger followers of Kant or ‘neo- Kantians’, and other interested including Weber, turned their attention to –

(a) They wanted to challenge the idea that the kind of knowledge generated by the natural sciences was the only kind of knowledge available.

(b) They wanted to show that the 2 kinds of science had to be different because they were looking at two fundamentally different kinds of phenomena.

(c) If these points are valid, then it was obvious that 2 distinct methodologies were required to investigate them.

Methodenstreit:

  • The philosophical debates between the positivists and anti-positivists, which began in Germany in the latter part of the 19th century, are known as Methodenstreit.

इम्मानुअल कान्त (1724-1804) :

  • एक जर्मन दार्शनिक, इम्मानुअल कान्त का तर्क था कि जहाँ वास्तविक दुनिया का ज्ञान वह था जो हमारे भौतिक बोध द्वारा आता था, इसे सिर्फ एक बार का बोध तभी बनाया जा सकता था यदि इस सूचना की सरंचना और संगठन मन द्वारा किया जाता हो | कान्त का पद द्वैतवादी है क्योंकि वह संवेदन बोध व ज्ञान-सम्बन्धी तर्क के अनिवार्य मेल को स्वीकारते हैं | हेगल मोनिस्टिक है क्योंकि वह सिर्फ बौद्धिक तर्क के निरपेक्ष उत्कृष्टता पर जोर डालते हैं |
  • कान्त ने अपने तर्कवादी दृष्टिकोण को जॉन लॉक (1632 – 1704) और डेविड ह्यूम (1711 – 1796) के निष्पक्षतावाद और अनुभवजन्यवाद से मिलाने की कोशिश की जिनका तर्क यह था कि हमारे सभी विचार और धारणाएं, भौतिक संवेदनाएं और बौद्धिक मीमांसाएँ दोनों सहित, हमारे आसपास के विश्व के व्यावहारिक अनुभव से प्राप्त होते हैं न कि मानव मन के पूर्व-मौजूदा क्षमताओं से | एक अनुभववादी दृष्टिकोण से कोई ज्ञान या चेतना नहीं हो सकती जब तक कि हमारे आसपास के भौतिक विश्व के साथ हमारी भौतिक संपर्क न हो | ज्ञान के 2 प्रकार के बीच यह विवाद सामाजिक -वैज्ञानिक ज्ञान के प्रकृति के अध्ययन के लिए उपयोगी है |
  • कान्त का तर्क था कि स्वतन्त्र व्यक्ति नैतिक स्व-निर्देश के लिए सहज रूप से समर्थ था | प्राकृतिक वस्तुओं की तरह व्यक्तयों के व्यवहार का भी समान वैज्ञानिक प्रणाली के अनुसार परीक्षण किया जा सकता है जो कि किसी अन्य प्राकृतिक वस्तु के लिए उचित होती | नैतिक विषयों के रूप में, व्यक्ति प्राकृतिक विश्व का हिस्सा नहीं है, क्योंकि ईश्वर ने व्यक्ति को किसी नैतिक या अनैतिक रूप से कार्य करने के लिए स्वतन्त्र विकल्प दिया है | एक सभ्यात्मक समाज वह है जो व्यक्तियों को नैतिक रूप से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करे | लेकिन समाज निर्धारणात्मक नैतिकता का निर्माण नहीं कर सकता क्योंकि नैतिक कार्य स्वतन्त्र इच्छा का परिणाम है |
  • व्यक्ति के द्वैतामक  – इंसान का प्राकृतिक व नैतिक वस्तु के रूप में दृष्टिकोण – पर कान्तीय जोर ने बहुत अधिक सिम्मेल और वेबर को प्रभावित किया | सिम्मेल व वेबर के लिए समाजशास्त्र को, जीवविज्ञान व रसायनविज्ञान के बिलकुल उलट, तथ्यों के साथ सन्दर्भों पर आना पड़ता कि कुछ हदों तक व्यक्ति न तो निर्धारित नियमों द्वारा विवश किया जाता था और न ही किया जा सकता है |
  • कान्त के युवा अनुयायी या ‘नव कान्तवादी’ और वेबर सहित अन्य रूचि रखने रखने वालों ने अपना ध्यान मोड़ा –

(अ) वे इस विचार को चुनौती देना चाहते थे कि प्राकृतिक विज्ञानों द्वारा सृजित ज्ञान का प्रकार उपलब्ध एकमात्र ज्ञान का प्रकार था |

(ब) वे दिखाना चाहते थे कि विज्ञान के 2 प्रकारों को अलग होना चाहिए क्योंकि वे घटना के 2 मुलभूत अलग प्रकारों की खोज कर रहे थे |

(स) यदि ये बिंदु वैध हैं, तो यह स्पष्ट था कि उनके निरीक्षण के लिए 2 अलग प्रणालियों की आवश्यकता थी |

मेथोदेन्स्त्रेइत :

  • प्रत्यक्षवादी और गैर-प्रत्यक्ष्वादियों के बीच दार्शनिक विवादों, जो 19वीं शताब्दी के बाद के भाग में जर्मनी में शुरू हुआ, को मेथोदेन्स्त्रेइत से जाना जाता है |

Difference between the natural world and the social or cultural world as given by Wilhelm Dilthey:

  • The natural world can only be observed and explained from the outside, while the world of human activity can be observed and comprehended from the inside, and is only intelligible because we ourselves belong to this world and have to do with the products of minds similar to our own.
  • The relations between phenomena of the natural world are mechanical relations of causality, whereas the relations between phenomena of the human world are relations of value and purpose.

HCS 2018 Online Exam | Sociology
Various Scholars:

William Dilthey (1833 – 1911):

  • Dilthey believed that since social or cultural science studied acting individuals with ideas and intentions, a special method of understanding (Verstehen) was required, while natural science studied soulless things and, consequently, it did not need to understand its objects.

Wilhelm Windelband (1848 – 1915):

  • He proposed a logical distinction between natural and social sciences on the basis of their methods.
  • Natural sciences use a ‘nomothetic’ or generalizing method, whereas social sciences employ an ‘ideographic’ or individualizing procedure, since they are interested in the non-recurring events in reality and the particular or unique aspects of any phenomenon.
  • He argued that the kinds of knowledge generated by the natural and the social sciences were different as they were looking at 2 different levels of reality. The natural scientists were concerned with material objects and with describing the general laws that governed their origins and interactions, social and cultural scientists were concerned with the ethical realm of human action and culture.
  • Although knowledge of natural phenomena could be achieved directly through observation and experimentation, knowledge of human motivation, of norms and patterns of conduct, and of social and cultural values, had to be based on a more abstract process of theoretical reasoning.

Heinrich Rickert (1863 – 1936):

  • He argued that the natural sciences are ‘sciences of fact’ and so questions of value were necessarily excluded from the analysis.
  • The social sciences are ‘sciences of value’ because they are specifically concerned with understanding why social actors choose to act in the ways that they do.

Influence of these perspectives on Weber:

  • Weber accepted the positivists’ argument for the scientific study of social phenomena and appreciated the need for arriving at generalizations if sociology had to be a social science.
  • He criticized the positivists for not taking into account the unique meanings and motives of the social actors into consideration.
  • He argued that sociology, given the variable nature of the social phenomena, could only aspire for limited generalizations (‘thesis’, as he called), not universal generalizations as advocated by the positivists.
  • Weber appreciated the neo-Kantians for taking into cognizance the subjective meanings and motives of the social actors to understand the social reality but also stressed the need for building generalizations in social sciences. Natural reality is distinguished from the social reality by the presence of ‘Geist’. By virtue of it, humans respond to external stimuli in a meaningful way.
  • Weber partly accepted Marx’s view on class conflict (economic factors) in society but argued that there could be other dimensions of the conflict as well such as status, power etc. Weber was also skeptical about the inevitability of revolution as forecasted by Marx.  He accepted Marxian logic of explaining conflict and change in terms of interplay of economic forces but criticized Marxist theory as mono-causal economic determinism. Weber argued that the social science methodology should be based on the principle of causal pluralism.

विल्हेल्म दिल्थे द्वारा दिए गए प्राकृतिक विश्व और सामाजिक या सांस्कृतिक विश्व के बीच अंतर :

  • प्राकृतिक विश्व को सिर्फ बाहर से ही अवलोकन और व्याख्या किया जा सकता है, जबकि मानव क्रियाकलापों के दुनिया का अवलोकन और उसका सम्मलेन अन्दर से किया जा सकता है, और सिर्फ सुगम है क्योंकि हम स्वयं ही इस दुनिया का हिस्सा है और हमारे स्वयं के समान ही मन के उत्पादों से लेना देना है |
  • प्राकृतिक दुनिया के घटना के बीच संबध कारणत्व के यांत्रात्मक सम्बन्ध हैं, जबकि मानवीय दुनिया के घटना के सम्बन्ध मूल्य व प्रयोजन के सम्बन्ध हैं |

विभिन्न विद्वान् :

विलियम दिल्थे (1833 – 1911) :

  • दिल्थे का मानना था कि क्योंकि सामाजिक या सांस्कृतिक विज्ञान ने विचारों व इरादों के साथ कार्य करने वाले व्यक्तियों का अध्ययन किया, समझ की एक विशेष प्रणाली-विज्ञान की आवश्यकता थी (वेर्स्तेहें), जबकि प्राकृतिक विज्ञान ने निष्प्राण वस्तुओं का अध्ययन किया और इसके परिणामस्वरूप इसे इसके वस्तुओं को समझने की आवश्यकता नहीं थी |

विल्हेल्म विन्देल्बंद (1848 – 1915) :

  • उन्होंने अपने प्रणालियों पर आधारित प्राकृतिक व सामाजिक विज्ञानों के बीच एक तार्किक अंतर का प्रस्ताव दिया |
  • प्राकृतिक विज्ञान एक ‘संवर्धित’’ या सामान्यीकृत प्रणाली का प्रयोग करता है, जबकि सामाजिक विज्ञानें एक ‘विचारधारा’ या व्यक्तिगत प्रक्रिया का उपयोग करते हैं, क्योंकि वास्तविक में ये गैर-आवर्ती घटनाओं में रुचिकर होते हैं और किसी घटना के विशेष या अनोखे पहलुओं में |
  • उनका तर्क था कि सामाजिक और प्राकृतिक विज्ञानों द्वारा सृजित ज्ञान के प्रकार अलग थे क्योंकि वे वास्तविकता के 2 अलग स्तरों पर आधारित थे | प्राकृतिक वैज्ञानिक भौतिक वस्तुओं व सामान्य नियमों, जो उनके मूलों व परस्पर क्रिया को संचालित करते थे, के व्याख्या के बारे में चर्चा करते थे, जबकि सामाजिक व सांस्कृतिक वैज्ञानिक मानव क्रिया व संस्कृति के नैतिक क्षेत्र के बारे में चर्चा करते थे |
  • हालाँकि प्राकृतिक घटना का ज्ञान अवलोकन व प्रयोगकार्य द्वारा प्रत्यक्ष प्राप्त किया जा सकता है, मानव प्रेरणा, आचरण के मानदंड व प्रारूप, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के ज्ञान को सैद्धांतिक तर्क के एक अधिक अमूर्त प्रक्रिया पर आधारित होना था |

हैनरिक रिकर्ट (1863 – 1936) :

  • इनका तर्क था कि प्राकृतिक विज्ञान ‘तथ्य के विज्ञान’ हैं और इसलिए विश्लेषण से अनिवार्य रूप से  मूल्यों के प्रश्नों को बाहर कर दिया गया |
  • सामाजिक विज्ञान ‘मूल्य के विज्ञान’ हैं क्योंकि ये इस बात से विशेषकर सम्बंधित होते हैं कि क्यों सामाजिक कर्ताएं तरीकों में कार्य करना चयन करते हैं जो वे करते हैं |

वेबर पर इन परिप्रेक्ष्यों का प्रभाव :

  • वेबर ने सामाजिक घटना के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए प्रत्यक्षवादियों के तर्कों को माना  और सामान्यीकरण पर आने की जरुरत को स्वीकार यदि समाजशास्त्र को एक सामाजिक विज्ञान होना था |
  • उन्होंने अनोखे अर्थों को समावेश नहीं करने व सामाजिक कर्ताओं के उद्देश्यों को विचार में नहीं लेने के लिए प्रत्यक्षवादियों की आलोचना की |
  • उनका तर्क था कि समाजशास्त्र, सामाजिक घटना के अचर प्रकृति को देखते हुए, सिर्फ सीमित सामान्यीकरण के लिए महत्वाकांक्षी (‘थीसिस’ जैसा वह कहते थे) था, न कि प्रत्यक्षवादियों जिसका पक्ष लेते थे उस सार्वभौमिक सामान्यीकरण के लिए |
  • वेबर ने सामाजिक वास्तविकता की समझ के लिए सामाजिक कर्ताओं के व्यक्तिपरक अर्थों और उद्देश्यों को संज्ञान में लेने के लिए नव कान्तीवादियों की सराहना की लेकिन सामाजिक विज्ञानों में सामान्यीकरणों के निर्माण पर भी जोर दिया | प्राकृतिक वास्तविकता ‘वास्तविकता’ की उपस्थिति द्वारा सामाजिक वास्तविकता से अलग है | इसके आधार पर मानव बाह्य उत्प्रेरकों में एक सार्थक तरीके से प्रतिक्रिया करते हैं |
  • वेबर ने आंशिक रूप से समाज में वर्ग टकराव (आर्थिक कारकों) पर मार्क्स के दृष्टिकोण को स्वीकार किया लेकिन तर्क दिया कि दर्जे, शक्ति इत्यादि जैसे मतभेद के अन्य आयाम भी हो सकते हैं | मार्क्स के पूर्वानुमान के अनुसार क्रांति के अनिवार्यता के बारे में वेबर भी उलझन में थे | उन्होंने आर्थिक शक्तियों के परस्पर क्रिया के सन्दर्भ में परिवर्तन व मतभेद को व्याख्या करने के मार्क्सवादी तर्क को स्वीकार किया लेकिन मार्क्सवादी सिद्धांत की एकल-करणीय आर्थिक नियतिवाद के रूप में आलोचना की | वेबर ने तर्क दिया कि सामाजिक विज्ञान प्रणाली को करणीय बहुलवाद के सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए |

 

Join Frontier IAS Online Coaching Center to prepare for UPSC/HCS/RAS Civil Service comfortably at your home at your own pace/time.

HCS(Prelims+Mains+Interview)   HCS Prelims(Paper 1+Paper 2)

IAS+HCS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    

  RAS+IAS Integrated(Prelims+Mains+Interview)    RAS(Prelims+Mains+Interview)     RAS Prelims     UPSC IAS Prelims      UPSC  IAS (Prelims+Mains+Interview)

Click Here to subscribe Our YouTube Channel