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RAS GK Exam Preparation : Ancient Civilization of Rajasthan Notes | Part 3

RAS GK Exam Preparation : Ancient Civilization of Rajasthan Notes | Part 3

RAS GK Exam Preparation : Ancient Civilization of Rajasthan Notes | Part 3

Rajasthan Art and Culture –

Ganeshwar

  • In the north-eastern region of Rajasthan, at a distance from Neem ka Thana town of Sikar district, at a place called Ganeshwar, copper age equipments  have been found in a large quantity, from the excavation of the Kantali river.
  • This is the first time that so many copper equipments have been found at any place in India.
  • The fishing thorns, etc., are the main ones. By getting copper from copper mines in Khetri nearby, copper tools were made.
  • From here, they were exported to places like Pakistan, Haryana and Punjab, as there  also similar equipments have been found.
  • Archaeologists have called this civilization a pre-Harappan-style copper civilization, which was developed from 3000-2800 BC.
  • This is the oldest civilization in the copper age civilization.
  • In Ganeshwar, excavation was done in the year 1977-78 under the guidance of Shri Ratnachandra Agarwal and Vijay Kumar.
  • Ganeshwar civilization is also called copper-cumulative culture.
  • copper-pin is  an important item found from the excavation of Ganeshwar.
  • A similar type of 3000 BC  Pin is found in Western and Central Asia also.
  • Probably these pins were exported from Ganeshwar.
  • Remains of two types of culture have been found in the excavation of Ganeshwar.
    • Pottery of former Harappan culture
    • Culture and sculpture utensils of ancient Rajasthan
  • All these utensils are mainly of 6 types – martbaan, kalash, tasle, pyale, lid and handi.
  • Many utensils were square, cyclical and ring shaped.
  • The clay pot is found only in Ganeshwar.
  • Other such evidence have not been found in any other copper-stone age civilization.
  • People of Ganeshwar civilization used to raise cattle, cattle, sheep, goats, pigs, dogs, donkeys, poultry etc.
  • They were also non-vegetarians. 

राजस्थान कला और संस्कृति –

गणेश्वर

  • राजस्थान के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में सीकर जिले के नीम का थाना कस्बे से कुछ दूरी पर गणेश्वर नामक स्थान पर काँतली नदी के एक टीले  के उत्खनन से ताम्रयुगीन उपकरण -कुहाड़े आदि बड़ी मात्रा में मिले हैं।
  • भारत में किसी स्थान पर एक साथ इतने ताम्र  उपकरण प्रथम बार मिले हैं।
  • इनमे मछली पकड़ने के काँटे, आदि प्रमुख हैं। पास  में खेतड़ी में तांबे की खानों से ताम्बा प्राप्त कर इसके  उपकरण बनाये जाते थे।
  • यहाँ से इनका निर्यात पकिस्तान, हरियाणा, पंजाब आदि स्थानों को किया  जाता होगा क्यूंकि वहाँ भी इस प्रकार के उपकरण मिले
  • पुरातत्विदों ने इस सभ्यता को पूर्व हड़प्पा कालीन ताम्रयुगीन सभ्यता कहा है, जो 3000-2800 ई. पूर्व विकसित  हुई थी।
  • यह ताम्रयुगीन संस्कृतियों में सबसे प्राचीन सभ्यता है।
  • गणेश्वर  में श्री रत्नचन्द्र  अग्रवाल व विजय कुमार के निर्देशन में वर्ष 1977-78 में खुदाई की गयी।
  • गणेश्वर सभ्यता को ताम्र-संचयी संस्कृति भी कहते हैं।
  • गणेश्वर के उत्खनन से प्राप्त दोहरी पेचदार शिरेवाली ताम्रपिन इसकी विशिष्टता है।
  • इसी प्रकार की 3000 ई.  पूर्व की पिन पश्चिमी तथा मध्य एशिया में भी मिली है।
  • संभवतः गणेश्वर से इन पिनों का निर्यात वहां किया जाता होगा।
  • गणेश्वर के उत्खनन से दो प्रकार की संस्कृति के अवशेष मिले हैं।
    • पूर्व हड़प्पाकालीन संस्कृति के बर्तन
    • प्राचीन राजस्थान की संस्कृति व शिल्पकला के बर्तन
  • ये सभी बर्तन मुख्यतः 6 प्रकार के हैं – मर्तबान, कलश, तसले, प्याले, ढक्कन एवं हांडी थे।
  • कई बर्तन चौरस, चक्रिक एवं छल्लेदार आकार के पाए गए हैं।
  • मिट्टी के छल्लेदार बर्तन केवल गणेश्वर में ही प्राप्त हुए हैं।
  • अन्य किसी भी ताम्र पाषाणकालीन सभ्यता में इनके प्रमाण नहीं मिले हैं।
  • गणेश्वर सभ्यता के लोग गाय, बैल, भेड़, बकरी, सूअर, कुत्ता, गधे, मुर्गे आदि पशुओं को पालते थे।
  • ये मांसाहारी भी थे।  

Rangmahal

  • It is located in Hanumangarh district near the ancient Saraswati (present Ghaghar) river, where under the direction of Dr. Hannarid, excavation was done by a Swedish Expedition Team in 1952-54.
  • Here the remains of Kushan period and Pre-Gupta culture have been found, which flourished from the 1st century BC to 300 AD.
  • Various sculptures found here are known to be of  Gandhar style.
  • Among the Idols thers is a idol of disciple and teacher.
  • The pottery were particularly red or pink.
  • Here metal tools and ornaments have also been found, in which there are items of   bronze like bajuband, tabeej, hatthe etc.
  • In iron equipments, there are hatthe, kabje,  rings, dantaliya, spears, bells, hooks, lamps.
  • Here a total of 105 copper coins have been found which are of Kushan period or from the previous period, which have some punch marks.
  • Some are of the period of Kanishka -first and Kanishka-III.
  • Two bronze seals have also been found, which have been written in Brahmi script, which is estimated of around 300 AD.
  • The inhabitants here used to specially cultivate rice. This was their main meal.
  • They probably ate buffalo, pigs, birds and fish meat.
  • There were also temples in RangMahal.
  • Devotees of Matradevi, Shiva and Krishna were found principally here.
  • Playing dancing and gambling has been a part of their life.
  • In the places of Hanumangarh district,  in places like Badapol, ‘Dabri’ , etc., similar materials of archeological importance have been found in excavation. 

रंगमहल

  • यह हनुमानगढ़ जिले में प्राचीन सरस्वती (वर्तमान घघर) नदी के पास स्थित है, जहाँ डॉ.हन्नारीड के निर्देशन में एक स्वीडिश एक्सपिडिशन दल द्वारा 1952-54 ई. में खुदाई की गयी।
  • यहाँ कुषाणकालीन एवं पूर्वगुप्तकालीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी से ३०० ई. तक पनपी थी।
  • यहाँ मिली हुई  विभिन्न मूर्तियां गांधार शैली की मालूम होती हैं।
  • मूर्तियों में एक मूर्ती शिष्य और शिक्षक की है।
  • यहाँ के मृदभांड विशेषतःलाल या गुलाबी रंग के थे।
  • यहाँ धातु के उपकरण व आभूषण भी प्राप्त हुए हैं जिसमे कांसे की वस्तुओं के बाजूबंद, ताबीज, हत्थे आदि हैं।
  • लौहे के  उपकरणों में हत्थे, कब्जे, अंगूठियाँ,  दाँतलियाँ, भाले, घण्टियाँ, हुक, दीपक मिले हैं।
  • यहाँ कुषाण कालीन   उससे पिछले काल की कुल 105 ताम्बे की मुद्राएँ  हैं, जिनमे कुछ पंच-मार्क हैं।
  • कुछ कनिष्क प्रथम और कनिष्क तृतीय के काल की हैं।
  • दो कांसे की सीलें भी मिली हैं, जिन पर ब्राह्मी लिपि में नाम अंकित हुए हैं, जो 300  ई. के लगभग की आँकी गयी है।
  • यहाँ के निवासी विशेष रूप से चावल की खेती करते थे। यही उनका मुख्य भोजन था।
  • वे संभवतः भैंसे, सूअर, पक्षी तथा मछली का माँस खाते थे।
  • रंगमहल में मंदिर भी थे।
  • मातृदेवी, शिव तथा कृष्ण की भक्ति यहाँ प्रधान रूप से पाई जाती थी ।
  • नाचना और जुआ खेलना उनके जीवन का एक अंग रहा है।
  • हनुमानगढ़  जिले की ही बड़ापोल, ‘डाबरी’  अादि स्थानों पर भी उत्खनन में इसी प्रकार के पुरातात्विक महत्त्व की सामग्रियां उपलब्ध हुई हैं।
  • वे संभवतः भैंसे, सूअर, पक्षी तथा मछली का माँस खाते थे।
  • रंगमहल में मंदिर भी थे।
  • मातृदेवी, शिव तथा कृष्ण की भक्ति यहाँ प्रधान रूप से पाई जाती थी ।
  • नाचना और जुआ खेलना उनके जीवन का एक अंग रहा है।
  • हनुमानगढ़  जिले की ही बड़ापोल, ‘डाबरी’  अादि स्थानों पर भी उत्खनन में इसी प्रकार के पुरातात्विक महत्त्व की सामग्रियां उपलब्ध हुई हैं।  

Noah

  • The remains of five civilizations have been found in excavation at Noh on the Agra Road, 6 km from Bharatpur.
  • Here the remains of black and red utensils have been found.
  • In later levels, copper coins and Kushanas and Mauryan  era remains were found.
  • It is known from the objects obtained from here that iron was used in the 12th century BC.
  • Here  the remains of three types of structures made of clay bricks have been found.
  • There is evidence of the use of pucca  bricks in all levels.
  • Here, excavation was conducted in 1963-67 by the Directorate of Archaeological Survey of Rajasthan Government, joint director of the University of California, Dr. Davidson and Mr. Ratnachandra Agrawal.

नोह

  • भरतपुर से 6 किमी दूर आगरा रोड पर स्थित नोह स्थान पर की गयी खुदाई में पाँच सांस्कृतिक युगों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • यहाँ काले व लाल रंग के पात्रों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • बाद के स्तरों में ताम्बे के सिक्के तथा कुषाणकालीन एवं मौर्यकालीन अवशेष मिले हैं।
  • यहाँ से प्राप्त वस्तुओं से ज्ञात हुआ है की ईसा  पूर्व 12 वीं शताब्दी में यहाँ लोहे का प्रयोग होता था।
  • यहाँ मिट्टी की ईंटों से बने तीन प्रकार के ढांचों के अवशेष मिले हैं।  
  • सभी स्तरों में पकी  हुई ईंटों का प्रयोग होने के प्रमाण है।

यहाँ 1963-67 में राजस्थान सरकार के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के डॉ. डेविडसन और श्री श्री रत्नचन्द्र अग्रवाल के संयुक्त निर्देशन में उत्खनन करवाया गया था।

Bairath

  • The excavation work on the hill of the beejak, Bhimji’s Dungari and Mahadev ji’s  Dungri, etc., was done for the first time by Dayaram Sahni in 1936-37 and again in 1962-63 by the archaeologist Nilratna banerjee and kailashnath dikshit in the capital city of Viratnagar (present-day Bairath, District- Jaipur) .
  • Remains of the Mauryan and its pre-civilizations were found in excavation.
  • Here coins and punchmark currency have been found tied in cotton cloth.
  • A large amount of archaeological material has been received from this area.
  • Iron tools have also been found here.
  • In 1999, the remains of the Ashoka era Buddhist temple and Buddhist stupas and remains of Buddhist monastery were found in the hill of the beejak, which is related to the Hinayana sect.
  • In the second level excavation, there is info. of cultures using gray paintings on pottery.
  • In the third level found in excavation, there are found remains of the earliest centuries AD.
  • Here are many iron tools, including nails, and many other iron tools etc.
  • The time of these items has been detrmined as  250 BC to 50 BC.
  • Apart from this, there are also remains of medieval culture.
  • In the year 1937, two pillar articles/edicts of Emperor Ashoka engraved in the Brahmi script  have been found from the Bhabru hill, which were of Ashoka’s Buddha, Dama and unfounded loyalty in the Sangh.
  • China’s famous traveler Hiuen Tsang  also possibly came here around 634 AD, during his visit.
  • He wrote that there are 8 Buddhist monasteries.
  • This town has been mentioned several times in the Mahabharata by the name of Viratnagar.
  • The Pandavas had spent the last days of their agyatwas at the King Viraat palace of the Matasya janpad.
  • In the same way, the Bairath is also witness to the remnants of Mauryan and post moryan periods.
  • It is said that Mughal Emperor Akbar used to rest at night here during his journey of Ajmer.
  • Bricks of different sizes have been obtained from the excavation of Bairath.
  • They were used in the construction of chabutaras, maths, stoopas and temples .
  • The dimensions of most of the bricks are 78*40*8.
  • Pucca tiles were laid on the floor.
  • It is important that despite excessive stones near Bairath,  bricks have been used more.
  • These bricks are similar to those of  Mohenjodaro.
  • 36 silver coins are found in excavated rooms.
  • 8 are punch marked. The remaining 28 coins are of Greek and Indo-Greek rulers.
  • The cloth on which the coin was tied, the cloth was of hand-woven cotton.
  • So, It is known that the inhabitants of this town knew the art of weaving.
  • The second place here was ‘Balathal’.
  • In the middle of the city of Virat, Akbar opened a mint.
  • Copper coins were minted here, during the reign of Akbar, Jahangir and Shahjahan.
  • Here a Mughal Garden, Idgah and some other buildings were also built.
  • Of these, the door of Mughal Garden is worth a visit.
  • Located in the south-eastern corner of the bairath, the Beejak mountain is made of gray stone rocks.
  • Two of the 8 Buddhist monasteries described by Hiuen Tsang were located on this hill.
  • The two pillars of these monasteries are  on this hill.

बैराठ

  • प्राचीन मतस्य जनपद की राजधानी विराटनगर (वर्तमान – बैराठ, जिला- जयपुर) में बीजक की पहाड़ी,  भीमजी की डूँगरी तथा महादेव जी की डूँगरी आदि स्थानों पर उत्खनन कार्य प्रथम बार दयाराम साहनी द्वारा 1936-37  में तथा पुनः 1962-63 में पुरातत्वविद नीलरत्न बनर्जी तथा कैलाशनाथ दीक्षित द्वारा किया गया।
  • खुदाई करने पर मौर्यकालीन एवं उसके पूर्व की सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं।
  • यहाँ सूती कपड़े में बँधी मुद्राएँ व पंचमार्का सिक्के मिले हैं।
  • इस क्षेत्र से पुरातात्विक सामग्री का विशाल भण्डार प्राप्त हुआ है।
  • यहाँ लौह उपकरण भी प्राप्त हुए हैं।
  • 1999 में बीजक की पहाड़ी से अशोक कालीन गोल बौद्ध मंदिर एवं बौद्ध स्तूप एवं बौद्ध मठ के अवशेष मिले हैं, जो हीनयान सम्प्रदाय से सम्बन्धित है।
  • दुसरे स्तर की खुदाई में यहाँ चित्रित स्लेटी मृदभांड का प्रयोग करने वाली संस्कृतियों  का ज्ञान हुआ है।
  • खुदाई  में मिले तीसरे स्तर में यहाँ इसा  की प्रारंभिक शताब्दियों की संस्कृति के अवशेष मिले हैं।
  • यहाँ मंदिर के किवाड़ों में लगी कीलें, कब्जे आदि सहित कई लौह उपकरण आदि  प्राप्त हुए हैं।
  • इन वस्तुओं का समय 250 ई. पूर्व से 50 ई. पूर्व निर्धारित किया  गया है।
  • इसके  अलावा यहाँ मध्ययुगीन संस्कृति के अवशेष भी मिले हैं।
  • सन 1937  में भाब्रु पहाड़ी से सम्राट अशोक के ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण दो प्रस्तर लेख (स्तम्भ लेख) भी प्राप्त  हुए हैं, जिनसे अशोक की बुद्ध, धम्म और संघ में अगाध निष्ठा लक्षित होती है।
  • चीन का प्रसिद्ध यात्री ह्यूएन त्सांग  भी संभवतः सन 634 ई. के लगभग अपनी यात्रा के दौरान यहाँ आया था।
  • उसने यहाँ बौद्ध मठों की संख्या 8 लिखी थी।
  • इस कसबे का विराटनगर नाम से महाभारत में कई  बार उल्लेख हुआ है।
  • मतस्य  जनपद के राजा विराट के यहाँ पांडवों ने अपने अज्ञातवास के अंतिम दिन व्यतीत किये थे।
  • वैसे बैराठ मौर्यकाल और मौर्योत्तर काल  के अवशेषों का भी साक्षी रहा है।
  • कहा जाता है की मुग़ल सम्राट अकबर अजमेर की यात्रा के दौरान यहाँ रात्रि विश्राम  करता था।
  • बैराठ के उत्खनन से अलग- अलग आकार की ईंटें प्राप्त हुई हैं।
  • इनका उपयोग चबूतरों, मठों, स्तूपों, तथा मंदिरों को बनवाने में किया गया था।
  • अधिकांश ईंटों की लम्बाई, चौड़ाई तथा मोटाई 78*40*8 है।
  • फर्श पर पक्की टाइलें लगी थी।
  • यह महत्त्वपूर्ण है की बैराठ के पास पत्थर अत्यधिक पाए जाने पर भी यहाँ ईंटों  का प्रयोग अधिक किया गया है।
  • ये ईंटें मोहनजोदड़ो से मिलती-जुलती हैं।
  • उत्खनित कमरों से 36 चाँदी की मुद्राएँ मिली हैं।
  • इसमें 8 पंचमार्क हैं। शेष 28 मुद्राएं यूनानी और भारतीय-यूनानी शासकों की हैं।
  • जिस कपडे पर में मुद्रा बंधी हुई मिली है, यह कपड़ा हाथ से बुनी  हुई रुई का था।
  • इससे विदित  होता है कि यहाँ के निवासी वस्त्र-बुनाई कला को जानते थे।
  • इसी प्रकार का दूसरा स्थल ‘बालाथल’ था।
  • विराट नगर के मध्य में अकबर ने एक टकसाला खोली  थी।
  • इस टकसाला में  अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ के काल में ताँबे के सिक्के ढाले जाते थे।
  • यहाँ एक मुग़ल गार्डन, ईदगाह तथा कुछ अन्य इमारतें  भी बनवायी गई थी।
  • इनमे से मुग़ल गार्डन  का दरवाजा आज भी दर्शनीय है।
  • बैराठ के दक्षिण पूर्वी कोने में स्थित बीजक की पहाड़ी विशालाकार स्लेटी प्रस्तर खडों से निर्मित है।
  • ह्यूएन त्सांग द्वारा वर्णित 8 बौद्ध मठों  में से 2 मठ इस पहाड़ी पर स्थित थे।
  • इन मठों के दो चबूतरे इसी पहाड़ी पर बने हुए हैं। 

Other archaeological sites

Bagor –

  • This archaeological site located on the banks of Kothari river in Mandal tehsil of Bhilwara district has been excavated from 1966-68 to 1969-70, under the auspices of the Rajasthan State Archaeological Department and Deccan College, Pune, where the medieval age stone tools and items are obtained.

Nagari (Chittorgarh)

  • The excavation of Nagari (ancient Madhyamika) 13 km from Chittorgarh was first done by Dr Bhandarkar in 1904 and again by Central Archeology Department in 1962-63.
  • Here coins of Shivi janpad are found, which prove that this area was under shivi janpad.
  • There are also remains of Gupta era art.

Jodhpura (Jaipur)

  • Khudai village  on the banks of Sabi river of Jodhpura village of Kotputli tehsil of Jaipur was excavated in 1972-73 by the Rajasthan Archaeology Department.
  • From the excavation here, the remains of Shangu and Kushan era civilization have been found in the final level and furnaces of iron making equipment have also been found.
  • Here in various levels, things have been found from 2500 B.C. to the second century AD. 

Sunaari (Khetri-jhunjhunu):

  • The site was excavated in 1980-81 by Rajasthan State Archeology Department.
  • In the excavation here, the oldest furnaces of making iron have been found.
  • Iron weapons and utensils have also been found here.
  • These people used rice and were dependent on hunting and agriculture.

Tilwara

  • Based on the bank of the Luni river of Barmer district, the remains of civilizations developed  from 500 to 200 AD have been found in the period.It was excavated in the year 1967-68 by Rajasthan State Archeology Department.

 

 

Raidh (Tonk)

  • In this village situated on the banks of the river Dhil  in Niwai Tahsil, the remnants of the former Gupta civilization have been found.
  • A huge reservoir of iron materials was found here.
  • It is called ‘Tatanagar of ancient India’.
  • The largest collection of coins of Asia till date was found here.
  • It was excavated by Dr. Kedarnath Puri between 1938-1940.
  • Here art works have been found from BC era, on which there is a clear impression of Mathura art.
  • This area was known in the first century BC as ‘Malva Jaanapada’.
  • Hundreds of silver coins  have been found from the excavation of the Raidh.

City (district tonk)

  • A large number of Malav coins and currencies have been found from Uniara town in Tonk district, whose ancient name was ‘Malav Nagar’, Here evidences have been found of the civilization from the second century BC to the third and fourth century AD.
  • This place was the capital of the Malav Republic.
  • The ancient name of this place was Karakota town.
  • Some texts have been found in the excavation, which are from the Gupts era.
  • The first excavation of this archaeological site was done in 1942-43 by Shri Krishna Dev.
  • After that, the latest excavation work was done in 2008-09 under the guidance of Mr. T. J. Alon by Manoj Dwivedi, Shivkumar Bhagat and Shri Pravin Singh etc. .

Naliasar

  • Excavation at this place near Sambhar lake in Sambhar (Jaipur district) has given information and knowledge of ancient civilization before the Chauhan era.
  • Some of the seals found here have something  written in Brahmi script.
  • This civilization flourished  from the third century BC to the beginning of the Chauhan era and then vanished.

Aheda (Sarwad – Ajmer), Sukhpura (Tonk):

  • This place has a collection of Gupta era coins, in which 48 gold coins of  the reign of Gupta ruler Samudragupta and Chandragupta II Vikramaditya have been found.
  • Prior to this, the largest collection of Gupta coins in Rajasthan was found in Nagalachail village of Bayana.

Elana –

  • A place in Jalore district where copper-era remains are found.
  • Jawar – excavated by Mohanlal Sukhdia University in 1983-84. 

RAS GK Exam Preparation : Ancient Civilization of Rajasthan Notes | Part 3 PDF –

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अन्य पुरातात्विक स्थल

बागोर –

  • भीलवाड़ा जिले की मांडल तहसील में कोठारी नदी के तटपर स्थित इस पुरातात्विक स्थल का उत्खनन 1966-68 से 1969-70 की अवधि में राजस्थान राज्य पुरातात्विक विभाग एवं दक्कन कॉलेज, पुणे के तत्वाधान में हुआ है,  जहाँ मध्य पाषाणकालीन लघु पाषाण उपकरण व वस्तुएं प्राप्त हुई हैं।

नगरी (चित्तौड़गढ़)

  • चित्तौड़गढ़ से 13 किमी दूर नगरी(प्राचीन मध्यमिका) की खुदाई सर्वप्रथम 1904 ई. में डॉ. भण्डारकर ने करवाई तथा दुबारा 1962-63 में केंद्रीय पुरातत्व विभाग द्वारा करवाई गयी।
  • यहाँ शिवि जनपद के सिक्के मिले हैं, जिनसे इस क्षेत्र पर शिवि जनपद होना साबित होता है।
  • यहाँ गुप्तकालीन कला के अवशेष भी मिले हैं।

जोधपुरा(जयपुर)

  • साबी नदी के किनारे जयपुर की कोटपूतली तहसील के ग्राम जोधपुरा के प्राचीन टीले   खुदाई 1972-73 में राजस्थान पुरातत्व विभाग द्वारा करवाई गई।
  • यहाँ के उत्खनन से अंतिम स्तर में शंगु एवं कुषाण कालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं तथा लौह उपकरण बनाने की भट्टियां भी मिली हैं।
  • यहाँ विभिन्न स्तरों में 2500 ई. पूर्व से लेकर ईसा  की दूसरी सदी तक की वस्तुएं मिली हैं।

सुनारी (खेतड़ी -झुंझुनू) :

  • इस स्थल का उत्खनन 1980-81 में राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा करवाया गया।
  • यहाँ खुदाई में लोहे के अयस्क से लोहा बनाने की प्राचीनतम भट्टियां मिली हैं।
  • लोहे के शस्त्र एवं बर्तन भी यहाँ प्राप्त हुए हैं।
  • ये लोग चावल का प्रयोग करते थे तथा आखेट एवं कृषि पर निर्भर थे।

तिलवाड़ा

  • बाड़मेर जिले के लूणी नदी के किनारे बसे इस स्थल के राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा वर्ष 1967-68 में करवाए गए उत्खनन से ई.पूर्व 500 से ईस्वी 200 तक की अवधि   में विकसित सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं।

रैढ़(टोंक)

  • निवाई तहसील में ढील नदी के किनारे स्थित इस गाँव में पूर्व गुप्तकालीन सभ्यता तक के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • यहाँ लौहा सामग्री का विशाल भण्डार मिला है।
  • इसे ‘प्राचीन भारत का टाटानगर’ कहा जाता है।
  • यहाँ एशिया का अब तक का सबसे बड़ा सिक्कों का भण्डार मिला है।
  • इसकी खुदाई डॉ. केदरनाथ पूरी ने 1938-1940 के मध्य कराई।
  • यहाँ इसा पूर्व की कलाकृतियां मिली हैं, जिस पर मथुरा कला की स्पष्ट छाप है।
  • यह क्षेत्र इसा पूर्व की प्रथम शती में ‘मालव जानपद’ के नाम से जाना जाता था।
  • रैढ़ की खुदाई से चाँदी की सैंकड़ों आहात मुद्राएं मिली हैं।

नगर (जिला टोंक)

  • टोंक जिले के उनियारा कस्बे, जिसका प्राचीन नाम ’मालव नगर’ था,  में बड़ी संख्या में मालव सिक्के एवं मुद्राएं मिली हैं, जो इसा पूर्व की द्वितीय शताब्दी से लेकर इसा की तीसरी-चौथी शताब्दी तक की सभ्यता के प्रमाण मिले हैं।
  • यह स्थान मालव गणराज्य की राजधानी थी।
  • इस स्थल का प्राचीन नाम करकोटा नगर था।
  • उत्खनन में कुछ लेख मिले हैं जो गुप्तकालीन हैं।
  • इस पुरातात्विक स्थल का प्रथम बार उत्खनन सन 1942-43 में श्रीकृष्ण देव द्वारा करवाया गया था।
  • उसके बाद नवीनतम उत्खनन कार्य 2008-09 में श्री टी.जे अलोन के निर्देशन में मनोज द्धिवेदी, शिवकुमार भगत एवं श्री प्रवीण सिंह आदि द्धारा  किया गया। 

 

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Rajasthani Literature RAS GK 2018 | Study Material | Exam Preparation

Rajasthani Literature RAS GK 2018 | Study Material | Exam Preparation

Rajasthani Literature RAS GK 2018 | Study Material | Exam Preparation

Rajasthani literature –

  • Rajasthan has an important place in the country’s history and cultural splendor.
  • The residents of Rajasthan have contributed a lot  to the rise of Indian culture, art and literature for centuries.
  • The artists here have done the work of preserving the cultural heritage of the country through their artistic compositions.
  • The literature in Rajasthani  language holds a special place in the entire Indian literature.
  • The ancient literature of Rajasthan is an indicator of the dignity, maturity and vibrantness of this language and its vastness.
  • Even though many texts were destroyed, a huge repository of handwritten literature and folk literature is still available today. 

Due to the stylistic and thematic differences of the creators of this prolific Rajasthani literature, the following can be divided  into five parts. –

  • Jain literature
  • Chaaran literature
  • Brahmin literature
  • Saint literature
  • folk literature

Jain literature –

  • Jain literature also known as Jain Sahitya composed by  Jain Acharya, Munis, Yates and Shravakas and their Lectures influenced by Jainism.
  • This literature is stored in abundance in lumbs of different  ancient temples. This literature is a religious literature which is available in both prose and verse. 

Charan literature –

  • The literature produced by the singers of various castes of Rajasthan like Charan, Bhat  and others is called Charan Sahitya.
  • Charan literature is mainly composed in verse. There are a lot of heroic rituals in it.

Brahmin literature –

  • Brahmin literature is available in relatively small quantities in Rajasthani literature. Kanharde Prabandh, Hammirayan, Bisaldev Raso, Ranmal Chhand etc. are the texts belonging to  this category.

Saint literature –

  • During the Bhakti movement in the medieval period, in the calm and mild climate of Rajasthan, there have been born many saints and sages on this land.
  • These saints have composed the prolific literature for the welfare of God and for the welfare of people, in the public language .

social literature

  • There is immense fame of the literature of Rajasthani literature in the folk style prevailing in the general public. This literature is present in the form of folk tales, folk tunes, myths, proverbs, riddles and folk songs etc.

Features of Rajasthani literature –

  • Rajasthani literature has been composed in specific linguistic styles of prose-verse such as khyaat, vaat, veli, vachnika, dawavait  etc.
  • In Rajasthan literature, wonderful coordination of heroic literature  is found.
  • Here the poets have been rich with the pen as well as with sword.
  • So they have  done wonderful co-ordination of these two contradictory  literary writings.
  • Nurturing life ideals and life values ​​In Rajasthani literature, adequate importance has been given to life values ​​and ideals such as divine love, self-respect, self-determination, protection of the protection, protection of women, protecting the virtues of women, duties towards the motherland etc. 

Age of Rajasthan literature and major works

  • Veeragatha period or Adikal (8th century to early 15th century)
  • Middle Ages from the late half of the fifteenth century till the first half of the 19th century)
  • Modern period (from the late 19th century to the present)

Ancient period or Veergatha period

  • The early period of Rajasthani literature (Adikal) is called as veergathakaal by Various writers such as  Acharya Ramchandra Shukla.
  • According to him, the literature composed in this period is Veer Ras(bravery) dominant. Some of the compositions of this period are heroic and some contain love poetry too. 
  • In the earliest compositions of early times, there is a ‘Quvalayamala’ composed by a Jain Muni Udhotan Suri, in which the Rajasthani language is  introdued as ‘Marubhasha’.
  • The brief description of important literature and literary works of this period is as follows:
  • Neminath Baramasah: This book is written by Jain poet Palhana. It describes the 22th Tirthankar Neminath of Jainism. ‘Neminath barahamasa’  is the first barahmasa of the Gurjar language.
  • Prithviraj Raso: It describes the life, character and wars of Prithviraj Chauhan-III, the last Chauhan emperor of Ajmer. This poem is epic of Veer Ras  by Chandrabardai written in Pingal. Chandrabardai was a friend and court poet of Prithviraj Chauhan. 
  • Bisaldev Raso – This book, written by Naranp
  • ]ati Nalh, describes the love story of the Chauhan ruler of Ajmer, Bisaldev (Vigrahraj IV) and his queen Rajmati.
  • Ranmal Chand – This is a heroic verse containing 70 verses. This contains the description of the battle of  Subedar Muazzfar Shah of Patan with Rathore Raja Ranmal of Eder.
  • It was composed by Sridhar Vyas. Durga Saptashati is his another composition. He was contemporary of Vyas Raja Rampal.
  • Prithviraj Vijay – The sequence of Jainak in Sanskrit poetic language  describes the lineage of Prithviraj Chauhan and his achievements. It contains authentic information about Ajmer’s development and its surroundings. 

Vijaypal Raso –

  • In this heroic rhetoric of Nall Singh, in Pingal language, the description of victories in war founght by  Yaduvanshi King Vijaypal of Vijaygarh (Karauli) is found.
  • Nallsingh, the Yaduvanshi king of Vijaygarh was a dependent  poet of Vijaypal.

Dhola maru ra dua: –

  • It is Rajasthan’s best-known poetry written by poet Kallol. The text of the Dingle language, of shringaar ras , is a description  of Dhola and Marwani.

Hammir Mahakavya

  • In this volume of Sanskrit language, Jain Muni Nainchandra Sury has described the Chauhan rulers of Ranthambore.

Brahasfut Siddhant –

  •  It was composed by Brahmagupta. He was born in Bhinmal (Jalore) to  Jishnu. He was an intelligent scholar of astronomy and numerology.

Sisupala Vadh –

  • This epic was composed by Mahakavi Maagh. He was born in Bhinmal (Jalore). 

राजस्थानी साहित्य –

  • राजस्थान का देश के इतिहास एवं सांस्कृतिक वैभव में महत्त्वपूर्ण स्थान है।  
  • राजस्थान के संघर्षशील व्यक्तित्व के धनी  निवासियों ने शताब्दियों से भारतीय संस्कृति, कला एवं साहित्य के उत्थान में योगदान दिया है
  • यहाँ के साहित्यकारों ने अपनी कलात्मक रचनाओं  के माध्यम से देश कि सांस्कृतिक विरासत को बचाये रखने का कार्य किया है।
  • राजस्थानी भाषा के साहित्य की सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में अपनी एक अलग पहचान है।  
  • राजस्थान का प्राचीन साहित्य अपनी विशालता म अगाधता  में इस भाषा की गरिमा, प्रौढ़ता एवं जीवंतता का सूचक है।  अनेकानेक ग्रंथों के नष्ट हो जाने के बावजूद आज भी हस्तलिखित साहित्य एवं लोक साहित्य का विशाल भंडार आज भी उपलब्ध है।

इस विपुल राजस्थानी साहित्य के निर्माणकर्ताओं की शैलीगत एवं विषयगत भिन्नताओं के कारण निम्न पांच भागों में विभक्त किया जा सकता है –

  • जैन साहित्य
  • चारण साहित्य
  • ब्राह्मण साहित्य
  • संत साहित्य
  • लोक साहित्य

जैन साहित्य –

  • जैन धर्मावलम्बियों यथा – जैन आचार्यों, मुनियों, यतियों एवं श्रावकों तथा जैन धर्म से प्रभावित साहित्यकारों द्वारा वृहद् मात्रा में रचा गया साहित्य जैन साहित्य कहलाता है।  
  • यह साहित्य भिन्न प्राचीन मंदिरों के ग्रंथगारों में विपुल मात्रा में संग्रहित है।  यह साहित्य धार्मिक साहित्य है जो गद्य एवं पद्य दोनों में उपलब्ध होता है।

चारण साहित्य

  • राजस्थान की चारण, भाट, दाढ़ी आदि गायक जातियों द्वारा रचित कृतियों को सम्मिलित रूप से चारण साहित्य कहते हैं।  
  • चारण साहित्य मुख्यतः पद्य में  रचा गया है। इसमें वीर रसात्मक कृतियों का बाहुल्य है।  

ब्राह्मण साहित्य

  • राजस्थानी साहित्य में ब्राह्मण साहित्य अपेक्षाकृत कम मात्रा में  उपलब्ध होता है। कान्हड़दे प्रबंध, हम्मीरयाण, बीसलदेव रासो, रणमल छंद आदि इस श्रेणी के ग्रन्थ हैं।  

संत साहित्य

  • मध्यकाल में भक्ति आंदोलन  की धारा में राजस्थान की शांत एवं सौम्य जलवायु में इस भूभाग पर अनेक संत-महात्माओं का आविर्भाव  हुआ।
  • इन संतों ने ईश्वर भक्ति में एवं जन-सामान्य के कल्याणार्थ विपुल साहित्य की रचना यहाँ की लोक भाषा में की है।  

लोक साहित्य

  • राजस्थानी साहित्य में सामान्यजन द्वारा प्रचलित लोक शैली में रचे गए साहित्य की भी अपार ख्याति है।  यह साहित्य लोक गाथाओं, लोकनाट्यों, प्रेमाख्यानों, कहावतों, पहेलियों एवं लोक गीतों के रूप में विधमान है। 

राजस्थानी साहित्य की विशेषताएं –

  • राजस्थानी साहित्य गद्य-पद्य की विशिष्ट लोकपरक शैलियों यथा – ख्यात, वात, वेळी, वचनिका, दवावैत आदि रूपों में रचा गया है।
  • राजस्थानी साहित्य में वीर रस एवं श्रृंगार रस का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।  
  • यहाँ के कवि कलम एवं तलवार के धनी रहे।
  • अतः इन्होने इन दोनों विरोधाभासी रसों का अद्भुत समन्वय अपने साहित्य लेखन में किया है।
  • जीवन आदर्शों एवं जीवन मूल्यों का पोषण राजस्थानी साहित्य में मातृभूमि के प्रति दिव्य प्रेम, स्वामिभक्ति , स्वाभिमान, स्वधर्मनिष्ठा, शरणागत की रक्षा, नारी के शील की रक्षा आदि जीवन मूल्यों एवं आदर्शों को पर्याप्त महत्त्व दिया गया है। 

राजस्थानी साहित्य का काल विभाजन एवं प्रमुख कृतियाँ

  • वीरगाथा काल या आदिकाल (8 वीं शती  से 15 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक )
  • मध्यकाल पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध  से 19 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक )
  • आधुनिक काल (19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से वर्त्तमान तक )

प्रारम्भिक काल या वीर गाथा काल

  • राजस्थानी साहित्य के प्रारंभिक काल (आदिकाल ) को आचार्य रामचंद्र शुक्ल आदि विभिन्न साहित्यकारों ने वीरगाथाकाल कहा है।
  • उनके अनुसार इस काल में रचा गया साहित्य वीर रस प्रधान है। इस काल की कुछ रचनाएँ वीर रसात्मक है तो कुछ प्रेम काव्य भी है।
  • आदिकाल  की प्रारम्भिक रचनाओं में एक जैन मुनि उधोतन सूरी द्वारा रचित ‘कुवलयमाला’ है जिसमे राजस्थानी का परिचय ‘मरुभाषा’ के रूप में मिलता है। यद्यपि कुवलय माला राजस्थानी भाषा की रचना नहीं है।
  • इस काल  प्राप्त महत्त्वपूर्ण साहित्य व साहित्यकारों का संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार है –
  • नेमिनाथ बारहमासा : यह ग्रन्थ जैन कवि पाल्हण   रचित है। इसमें जैन धर्म के 22 वे तीर्थंकर नेमिनाथ का वर्णन है। ‘नेमिनाथ बारहमासा’ मारु गुर्जर भाषा का पहला बारहमासा  है।
  • पृथ्वीराज रासौ : इसमें अजमेर के अंतिम चौहान सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीये के जीवन चरित्र एवं युद्धों का वर्णन है। यह कवी चंद्रबरदाई द्वारा पिंगल में रचित वीर रस का महाकाव्य है। चंद्रबरदाई पृथ्वीराज चौहान का दरबारी कवी  व मित्र था।
  • बीसलदेव रासौ – नरपति नाल्ह द्वारा रचित इस ग्रन्थ  में अजमेर के चौहान शासक बीसलदेव (विगृहराज चतुर्थ) एवं उनकी रानी राजमती की प्रेमगाथा का वर्णन है।
  • रणमल छंद – यह 70 छंद का एक वीर काव्य है। इसमें पाटन के सूबेदार मुजफ्फर शाह एवं ईडर के राठोड राजा रणमल के युद्ध का वर्णन है।
  • यह श्रीधर व्यास द्वारा रचा गया। दुर्गा सप्तशती इनकी अन्य रचना है। श्रीधर व्यास राजा रणमल के समकालीन थे।
  • पृथ्वीराज विजय – जयानक के संस्कृत  भाषा के इस काव्य ग्रन्थ पृथ्वीराज चौहान के वंशाक्रम एवं उनकी उपलब्धियों का वर्णन किया गया है।  इसमें अजमेर के विकास एवं परिवेश की प्रामाणिक जानकारी है।

विजयपाल रासो –

  • नल्ल सिंह के पिंगल भाषा के इस वीर-रसात्मक  ग्रन्थ में विजयगढ़ (करौली) के यदुवंशी राजा विजयपाल  की दिग्विजय एवं युद्ध का वर्णन है।
  • नल्लसिंह  विजयगढ़ के यदुवंशी नरेश विजयपाल के आश्रित कवी थे।

ढोला मारु रा दूहा : –  

  • कवि कल्लोल द्वारा रचित यह राजस्थान का श्रेष्ठ प्रणय काव्य है। डिंगल भाषा के श्रृंगार स से परिपूर्ण इस ग्रन्थ में ढोला और मारवणी के प्रेमाख्यान  का वर्णन है।

हम्मीर महाकाव्य

  • संस्कृत भाषा के इस ग्रन्थ में जैन मुनि नयनचन्द्र सूरि  ने रणथम्बोर के चौहान शासकों का वर्णन किया है।

ब्रह्मस्फुट सिद्धांत –

  • इसकी रचना ब्रह्मगुप्त ने की थी। इनका जन्म भीनमाल (जालोर) में पिता ‘जिष्णु’ के यहाँ हुआ।  ये खगोलशास्त्र व अंकशास्त्र के प्रखर विद्वान थे।

शिशुपाल वध –

  • इस महाकाव्य की रचना महाकवि माघ ने की थी। इनका जन्म भीनमाल (जालोर)  में हुआ।

 

Medieval literature and Authors

Padmanabh:

  • This was the dependent poet of Chauhan Akhairaj of  Jalore.
  • He composed ‘Kanharde Prabandh’. This composition written in  literary style is a strong poetic work.
  • It describes the Jalore war between the rulers of Jalore, Kanharde Chauhan and Allauddin Khilji.

Vithu Suza –

  • Vithu Suza was contemporary of Bikaner ruler Rao Bika and Rao Lunkaran. He composed the ‘Rao Jaitasi Ro Chhad’. This text of the Dingal language describes the war between Babar’s son Kamran and Bikaner ruler Rao Jaatasi. 

Vithu Maha –

  • ‘Pabuji ra Chhand’, ‘Gogaji Rasawala’, ‘Karni ji ra Chhad’, ‘Chandji Rei Vel’, etc. are the main works.

Duda Visraal

  • His main composition is ‘Rathod Ratan Singh Rei Valley’, in which the ruler of jaitraan describes Ratan Singh’s war with the Mughals.

Keshavdas Gaadan

  • He was the poets of Jodhpur king Gaj Singh-I and worte in Dingle language. ‘Gajguuna Roopak Bandh’,  ‘Rao Amarsingh Raa Dua’, ‘Vivek Vaarta’, ‘Chand Gorakhnath’ etc. are his main works.

Girdhar Aasiya –

  • ‘Sagatrasau’ containing 943 verses written by hin is an important treatises, in which the heroic works of Maharana Pratap’s  brother Shaktisingh are mentioned.
  • Some books also mention the name of this book as Saatsatsingh Raso.

Abul Fazal –

  • He was one of the navratanas of emperor Akbar and the famous historian of that time. He belonged to Nagaur.
  • Nama Shaikh Mubarak was his father.
  • ‘Aayne Akbari’ is  his famous text.
  • Marwadi is also described in his text as one of the major languages of India .
  • His other book is ‘Akbarnama’. 

Ekling Mahatmay –

  • The text compiled by Kanha Vyas provides information about the genealogy of the Guhil rulers and the political and social organization of Mewar.

Padmavat:

  • This epic composed by Malik Mohammad Jaisi in 1543 AD describes the battle between Allauddin Khilji and Raval Ratan Singh, ruler of Mewar (AD 1301).
  • The reason for this war was the desire of Allauddin Khilji to achieve Ratan Singh’s  queen Padmini.

Hammir Hath, Surjan Charit:

  • Created by Chandra Shekhar, the dependent poet of Bundi ruler Rao Sajan. 

Jodhpur Maharaja Ajitsingh –

  • He was the son of Jodhpur Maharaja Jaswant Singh-I.
  • ‘Gajuddar’ Granth is the most important text  composed by him. This is based on the context of Bhagwat katha.
  • ‘Gunsaar’, ‘Bhavavirahi’ and ‘Durgabhasha Paath’ are his other works.

Poet Jodharaj –

  • He was the dependent poet of Maharaja Chandrabhan, the ruler of Neemrana.
  • He wrote the famous text ‘Hammir Raso’.
  • ‘Hammyar Raso’ is a Veer Ras poetry text which contains a detailed description of the genealogy of Rana Hammir Dev Chauhan and his war with Allauddin Khilji. 

Maharaja Sawai Pratapsingh-

  • Maharaja Sawai Pratap Singh, son of Jaipur Maharaja Sawai Madhav Singh,  was born in 1764 AD.
  • He used to write poetry in the name of ‘Brajnidhi’ His texts are published in the name  ‘Brajnidhi Granthavali’.

Maharaja Raja  BudhSingh:

  • Maharaja Raja Budasingh, son of Bundi King Rao Raja Anirudh Singh, composed the book ‘Nehtarang’. Its language is Braj.

Ajitoday –

  • Created by Jagjivan Bhatt It contains a detailed description of the historical events of Marwar, especially the Mughal relations of Maharaja Jaswant Singh and Ajit Singh. It is in Sanskrit language. 

Muhnot Nainsi: –

  • Born in Jodhpur city, Mohanot Nainsi  was the minister and minister of Maharaja Jaswant Singh-I of Jodhpour.
  • Angered by something, the Maharaja put both  Nainasi and his brother Sundarasi in prison.
  • Due to  tortures in captivity, both brothers committed suicide .
  • Along with being knowledge lover and History lover he was a man  of self-pride and brave nature.
  • Munshi Devi Prasad has called Nainsi as ‘Abul Fazal of Rajputana’. Nainsi wrote a famous book titled ‘Muhnot Nainsi Ri Khyat’. 
  • Apart from Marwar, there is a historical account of the various states of Rajasthan, as well as in the history of Gujarat, Kathiawar, Kutch, Bundelkhand, Baghelkhand and Central India.
  • Muhanot’s second famous granth is ‘Marwar Ra Paragana Ri Vigat’.
  • It is also called ‘Rajputana’s Gazetteer’.
  • Along with being a high ranked historian, Nainsi was also a well-known prose writer of dingle language.

Rajasthani Literature RAS GK 2018 PDF-

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मध्यकाल का साहित्य व साहित्यकार

पद्मनाभ :

  • ये जालौर के चौहान अखैराज के आश्रित कवी थे।
  • इन्होने ‘कान्हड़दे प्रबंध’ की रचना की।  साहित्यिक दृष्टि से प्रसाद शैली में लिखी यह रचना एक सशक्त काव्य  कृति है।
  • इसमें जालौर के शासक कान्हड़दे चौहान व अल्लाउदीन खिलजी के मध्य हुए जालौर युद्ध का वर्णन है।

विठू सूजा –

  • वीठू सूजा बीकानेर शासक राव बीका और राव लूणकरण के समकालीन थे।  इन्होने ‘राव जैतसी रो छंद’ की रचना की। डिंगल भाषा के इस ग्रन्थ में बाबर के पुत्र कामरान एवं बीकानेर शासक राव जैतसी के मध्य हुए युद्ध का वर्णन है।  

वीठू महा –

  • ‘पाबूजी रा छंद’, ‘गोगाजी रा रसावला’, ‘करणी जी रा छंद’, ‘चांदजी री वेल’ , आदि इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं।  

दूदा विसराल –

  • इनकी प्रमुख रचना ‘राठोड रतनसिंह री वेली’ है, जिसमे जैतरण के शासक रतनसिंह का मुगलों के साथ हुए युद्ध का वर्णन है।

केशवदास  गाडण

  • ये जोधपुर महाराजा गजसिंह प्रथम के कृपापात्र व डिंगल  भाषा के कवी थे। ‘गजगुण रूपक बंध’ , ‘राव अमरसिंह रा दुहा’, ‘विवेक वार्ता’ , ‘छंद गोरखनाथ’ आदि इनकी प्रमुख रचनाएँ  हैं।

गिरधर आसिया –

  • इनके द्वारा लिखित ‘सगतरासौ’ 943 छंदों का महत्त्वपूर्ण प्रबंध-काव्य है, जिसमे महाराणा प्रताप के छोटे भाई शक्तिसिंह के वीरतापूर्ण कार्यों का उल्लेख है।
  • कुछ पुस्तकों में इस ग्रन्थ का नाम सगतसिंह रासौ भी मिलता है।

अबुल फजल –

  • ये बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक व उस समय के प्रसिद्ध इतिहासकार थे जो नागौर के थे।
  • इनके पिता का नम्म शेख मुबारक था।
  • ‘आईने अकबरी’ इनका प्रसिद्ध ग्रन्थ है।
  • इस ग्रन्थ में भारत की प्रमुख भाषाओँ में मारवाड़ी का नाम भी है।  

इनका अन्य ग्रन्थ ‘अकबरनामा’ है। 

एकलिंग महात्मय –

  • कान्हा  व्यास द्वारा रचित यह गुहिल शासकों की वंशावली एवं मेवाड़ के राजनैतिक व सामाजिक संगठन की जानकारी प्रदान करता है।

पद्मावत :

  • मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा 1543 ई.  के लगभग रचित इस महाकाव्य में अल्लाउदीन खिलजी एवं मेवाड़ के शासक रावल रतनसिंह के मध्य हुए युद्ध (1301 ई.)  का वर्णन है।
  • इस युद्ध का कारण अल्लाउद्दीन खिलजी द्वारा रतनसिंह की रानी पद्मिनी को प्राप्त करने की इच्छा थी।

हम्मीर हठ, सुर्जन चरित :

  • बूंदी शासक राव सुर्जन के आश्रित कवि चंद्रशेखर द्वारा रचित। 

जोधपुर महाराजा अजीतसिंह –

  • जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह प्रथम के पुत्र थे।
  • ‘गाजुद्दार’ ग्रन्थ इनके द्वारा रचित ग्रंथों में सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। यह भागवत कथा के प्रसंग  पर आधारित है।
  • ‘गुणसार’, ‘भावविरही’ व ‘दुर्गाभाषा पाठ’  इनकी अन्य कृतियाँ हैं।

कवि  जोधराज –

  • ये नीमराणा के अधिपति महाराजा चन्द्रभान के आश्रित कवि थे।
  • इन्होने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘हम्मीर रासौ’ लिखा था।
  • ‘हम्मीर रासौ’ एक वीर रस प्रधान काव्य ग्रन्थ है जिसमे रणथम्बोर शासक राणा हम्मीर देव चौहान की वंशावली व उनका अल्लाउद्दीन खिलजी से युद्ध का विस्तृत वर्णन है। 

महाराजा सवाई प्रतापसिंह-

  • जयपुर महाराजा सवाई माधवसिंह के पुत्र महाराजा सवाई प्रतापसिंह का जन्म सन 1764 ई.  में हुआ था।
  • ये ‘ब्रजनिधि’ के नाम से कविता लिखते थे। इनके ग्रंथ ‘ब्रजनिधि ग्रंथावली’ के नाम से प्रकाशित है।

महाराव राजा बुधसिंह :

  • बूँदी नरेश राव राजा अनिरुद्ध सिंह के पुत्र महाराव राजा बुधसिंह ने ‘नेहतरंग’ नामक रीतिग्रंथ की रचना की। इसकी भाषा ब्रजभाषा है।

अजीतोदय –

  • जगजीवन भट्ट द्वारा रचित। इसमें मारवाड़ की ऐतिहासिक घटनाओं, विशेषतः महाराजा जसवंतसिंह एवं अजीत सिंह के मुग़ल संबंधों का विस्तृत वर्णन है। यह संस्कृत भाषा में है। 

मुहणोत नैणसी : –

  • जोधपुर नगर में पिता जयमल के यहाँ जन्मे मुहणोत नैणसी जोधपुर महाराजा जसवंतसिंह प्रथम के कृपापात्र एवं मंत्री थे।
  • किसी बात से रुष्ट होकर महाराजा ने मुहणोत नैणसी और उनके भाई सुन्दरसी दोनों को ही कैद में डाल दिया।
  • बंदी जीवन में दी जाने वाली यातनाओं से उत्पन्न आत्मग्लानि  के कारण दोनों भाइयों ने कटार भौंककर आत्महत्या कर ली।
  • नैणसी आत्माभिमानी और वीर प्रकृति का होने के साथ विद्यानुरागी  और इतिहास प्रेमी भी थे
  • मुंशी देवीप्रसाद ने नैणसी को ‘राजपूताने का अबुल फजल’ कहकर पुकारा है। नैणसी  ने ‘मुंहता नैणसी री ख्यात’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ लिखा। 
  • इसमें मारवाड़ के अतिरिक्त राजस्थान के विभिन्न राज्यों का ऐतिहासिक वृत्तांत तो मिलता ही है, साथ ही इसमें गुजरात, काठियावाड़, कच्छ, बुंदेलखंड, बघेलखण्ड और मध्यभारत के इतिहास पर भी प्रकाश डाला गया है।
  • मुहणोत नैणसी का दूसरा प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘मारवाड़  रा परगनां री विगत’ है।
  • इसे ‘राजपूताने का गजेटियर’ भी कहा जाता है।
  • उच्च कोटि के इतिहासज्ञ होने  के साथ साथ नैणसी डिंगल भाषा के सिद्धहस्त गद्य लेखक भी थे। 

 

 

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RAS 2018 GK Notes Major Festival of Rajasthan | Part 2

RAS 2018 GK Notes Major Festival of Rajasthan | Part 2

RAS 2018 GK Notes Major Festival of Rajasthan | Part 2

31. Amla Navami / Akshay Navami (Kartik Shukla-9): –

  • On this day,  the amla tree is worshiped and amla is taken in food. By doing this fast, the fruit of fasting, poojan, tarpana etc. becomes renewable. Therefore it is also called Akshay Navami.

Devothni Gyaras (Kartik Shukla-11): –

  • It is called Prabodhini Ekadashi. On this day Lord Vishnu awakens after being four months in sleep. Auspicious works starts from this day.
  • By bathing in the morning and  in the courtyard of the house, feet of Lord Vishnu are formed  in artistic form. Lord Vishnu is worshiped by the Kadamb flowers and the flowers of Tulsi. 

33. Kartik Poornima: –

  • On this day, Mahadevji had killed a ruler named Tripurasur. That is why it is also called ‘Tripura Purnima’.
  • On this day bath is done in Ganga or Pushkar. The fast of the Kartik month and the bath which starts with Sharad Purnima and the Kartik full moon is complete. The fair fills  at Pushkar on this day.

34. Makar Sankranti: –

  • It is always celebrated on 14th January. It has special significance due to sunlight on Capricorn in this solstice. Sesame laddus, papdi, barfi etc. are made a day before Sankranti.
  • On this day, donations are made with open heart . In Jaipur, on  this day everyone flies kites. There is also a practice to make happy their mother in laws on this day. Suhagin women give up to thirteen things of suhag  to thirteen suhaginas. 

35. Til Chauth (Magh Krishna-4): –

  • On this day, tilkutta food is offered to  Shri Ganesh ji and Chaukat Mata.It is also known as Sankat Chauth.

36. Shattila Ekadashi (Magh Krishna-11): –

  • their supreme god is Lord Vishnu. The donation of black cow and black til on this day has special significance. Due to the use of 6 types of sesame, it is called Shatatila Ekadashi.

37. Mauni Amavas (Magh Amavasya): –

  • People remain Silent on this day. This day is also Manu’s ‘Birthday’. It is believed that due to remaining in silence,  self-power increases and the person who completes the fast by holding silence gets the post of a muni. 

38. Basant Panchami (Magh Shukla-5): –

  • This day is considered the first day of the advent of the Rituraj Basant. Lord Sri Krishna is worshipped in this festival, therefore, in Braj Pradesh today, the leela of  Radha and Krishna is created. From this day, the faags start to fly, which runs through Phalguna’s full moon.
  • The golden  wheat and barley are offered to God.  On this day, Kamdev and Ratti are worshipped chiefly. On this day people wear yellow cloth and they eat yellow sweet rice in houses. 

39. Magh Poornima: –

  • The full moon of Magh Month is of great significance. This is the last symbol of bathing festivals. On this day,after bathing  Vishnu Puja is sone , Shraddra Karma is done and beggars are given domations. Ganga bathing on this day also has special significance.

40. Shivratri (Falgun Krishna -13): –

  • This is the birth anniversary of Shiva. On this day, devotted hold a fast and recite Shiva Purana. On the second day, hawan  of barley, sesame seeds, kheer and Bilv patras is done by feeding the Brahmins and fast is completed. 

41. Dhundh (Falgun Sadi-11): –

  • On haing a child, worshiping of Gyaras before Holi is done. When a boy is born there Dhundh is worshipped the same year

42. Holi (Phalguna Poornima): –

  • On this day on Hiranakshyap’s command, his sister Holika takes Prahad in the lap and enters  fire, but Prahad is saved and Holika gets burnt.
  • Therefore, this festival is celebrated in memory of Bhakta Prahlad. On this day all women worship Holi by a raw cotton , water lota, coconut etc.
  • In the water, green gram with raw gram flour and raw wheat is roasted and brought home. 
  • When Holi is burnt, men take out the pole because this is considered a symbol of devotee Prahad.

43. Dhulandi (Chaitra Krishna-1): –

  • Dhulandi is celebrated on the second day of Chaitra month Krishna Pratipada on the second day of Holi. On this day the residual ash of Holi is worshipped  and all play holi with colorful Gulal.

44. Ghudla Festival  (Chaitra Krishna-8): –

  • This festival is celebrated in the Marwar area of ​​Rajasthan from Chaitra Krishna Ashtami to Chaitra Shukla Tritiya. On this day the women gather and go to the potter’s house and keep the lamp in a  holed pot and return home singing songs. 
  • This pitcher is later shed in the tank. On this festival, a fair is filled on Chaitra Sudi  Teej.

45. Sheetla Ashtami (Chaitra Krishna-8): –

  • On this day, Shitala Mata is worshiped and cold food is eaten. All food is cooked on the evening of Saptami. Shitla Mata is worshiped  when the child has small pimples / chickenpox .

46. New Year (Chaitra Shukla 1): –

  • New Year of Hindus begins on this day. The festival of Gudi Padwa is also celebrated on this day.

47. Arundhati vrat (Chaitra Shukla-1): –

  • This fast starts with Chaitra Shukla and ends with Chaitra Shukla Tritiya. 
  • This fast is done for the women. Women should take this fast to avoid the cycle  of birth and death.

48. Sinjara: –

  • This festival symbolizes love for daughter and daughter-in-law. A day before Gangaur and Teej  Sinjara is sent, in which saris, make-up material, bangles, mahindi, roli, dessert etc. are snet to  daughter and daughter-in-law.

49. Gangaur (Chaitra Shukla-3): –

  • This is an important festival of married ladies. This is a symbol of Shiva and Parvati’s fondest love. In Ganagaur, ‘Gan’is symbol of  Mahadev’s and ‘Gauri’ is a symbol of Parvati.
  • On this day, the unmarried girls  wish for good grooms and married women wish for their untiring good luck for their husbands.
  • Ganagaur worship begins with Chaitra Krishna Ekam and this sequence continues till Chaitra Shukla Tritiya. On this day, there is  Gangaur sawari. Gangaur of Jaipur and Udaipur is famous.

50. Ashokashtami (Chaitra Shukla-8): –

  • This day Ashoka tree is  worshipped.

51. Ramnavami (Chaitra Shukla-9): –

  • This festival is celebrated as the birth anniversary of Lord Rama. The Ramayana is recited on this day.
  • Devotees bathe in the river Saryu and earn virtue benefits. This is the celebrated on the last Nawratra.

52 .Akha Teija  or Akshaya Tritiya (Vaishak Shukla 3): –

  • Farmers celebrate this festival with the wishes of rain by worshiping seven grains and ploughs in the state. According to the shastras, this day is considered the beginning of Satyuga and Tretayug. The   knowledge gained and charity performed on this day are very fruitful.
  • This is the only time in the whole year. when thousands of marriages, especially child marriages, are held in the state on this day.

53. Vat Savitri fast or Badmavas (Jayesth Amavasya): –

  • This fast is done by woman to achieve  good fortune. In this fast women pray for the health of the son and husband by worshiping banyan trees. The story of Wat Savitri is heard by women.

54. Nirjala Ekadashi (Jyestha Shukla Ekadashi): –

  • In this fast, water is not drunk from sunrise of Ekadashi till sunrise of Dvadasi. This fast gets the best results.

55. Peepal Poornima: –

  • This  is celebrated on Vaishakh Purnima .Buddha Purnima is also celebrated on this day. 

56. Yogini Ekadashi (Ashadh Krishna-11): –

  • By fasting on Ekadashi, all sins are destroyed.

57. Devashayani Ekadashi: –

  • On the day of Ashad Shukla , Lord Vishnu falls asleep for four months. No auspicious work is done for four months from this day.

58. Guru Purnima (Aashadh Purnima): –

  • On this day, Guru-worship is done and gifts are  given to gurus. It is also called Vyaas Poornima.

59. Saavan Somwar: –

  • This fasting  is done on all the Mondays of  Shraavan month.
  • Shivji is worshipped on this day. These are also called Van Somvar because food is prepared from home and is eaten on some picturesque site in the forest.

60. Mangala Gori Pooja: –

  • On every Tuesday of the month of Shravan, Goddess gauri is  worshipped.

61. Nag Panchami (Shravan Krishna 5): –

  • This is the festival of snakes. This day  serpent is worshiped. Somewhere this festival is celebrated as Shravan Shukla Panchami.

62. Nidri Navami (Shravan Krishna-9): –

  • In order to avoid snake attacks, the mongoose  is worshiped on Shravan Navratri, which is called the Nidari Navami.

63. Kamika Ekadashi (Shravan Krishna-11): –

  • Lord Vishnu is worshiped in this fast.

64. Hariyali Amavas (Shravan Amavasya): –

  • On this day, Kheer and Malpu are made. They feed  Brahmins. People celebrate with their families visiting gardens or other delightful places.

65. Jaljhulani / Devjulani Ekadashi: –

  • On the day of Bhadrapad Shukla-11, idols are placed in paalkis and it is  bathed near the reservoir after after being taken to the reservoir in the procession. 

31.  आँवला नवमी/अक्षय नवमी (कार्तिक शुक्ला -9)

  • इस दिन आँवले के वृक्ष की पूजा की जाती है व भोजन में आँवला अवश्य लिया जाता है। इस व्रत को करने से व्रत, पूजन, तर्पण आदि का फल अक्षय हो जाता है। इसलिए इसे अक्षय नवमी भी कहते हैं।

देवउठनी ग्यारस (कार्तिक शुक्ला-11) :-

  • इसे प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु चार माह तक निंद्रावस्था में रहने के बाद जागते हैं। इस दिन से ही मांगलिक कार्य प्रारम्भ हो जाते हैं।
  • प्रातःकाल स्नान करके घर के आँगन में चौक पुर कर भगवान विष्णु के चरणों को कलात्मक रूप में अंकित करते हैं। भगवान विष्णु की कदम्ब पुष्पों तथा तुलसी की मंजरियों द्वारा पूजा की जाती है। 

33. कार्तिक पूर्णिमा :-

  • इस दिन महादेवजी ने त्रिपुरासुर नामक राक्षक का वध किया था। इसलिए इसे ‘त्रिपुर पूर्णिमा’ भी कहते हैं।
  • इस दिन गंगा या पुष्कर में स्नान किया जाता है। कार्तिक माह के व्रत व स्नान जो शरद पूर्णिमा से आरम्भ होते हैं व कार्तिक पूर्णिमा को पूर्ण होते हैं। इस दिन पुष्कर में मेला भरता है। 

34. मकर संक्रांति :-

  • यह सदैव 14 जनवरी को ही मनाई जाती है। इस संक्रांति में मकर राशि पर सूर्यहोने के कारण इसका विशेष महत्व है। संक्रांति के एक दिन पूर्व तिल के लड्डू, पपड़ी, बर्फी आदि बनाये जाते हैं।
  • इस दिन दिल खोलकर दान करते हैं। जयपुर में इस दिन सभी पतंग उड़ाते हैं। इस दिन रूठी सास को मनाए जाने की भी प्रथा है। सुहागिन स्त्रियाँ सुहाग की तेरह वस्तुएँ कलप कर तेरह सुहागिनों को देती हैं। 

35. तिल चौथ (माघ कृष्णा-4) :-

  • इस दिन श्री  गणेश जी व चौथ माता के तिलकुट्टे का भोग लगाया जाता है। इसे संकट चौथ भी कहते हैं।

36. षट्तिला एकादशी (माघ कृष्णा-11) :-

  • इसके अधिष्टता देव भगवान विष्णु है।  इस दिन काली गाय और काले तिलों के दान का विशेष महत्व है। 6 प्रकार के तिलों का प्रयोग होने से  इसे षट्तिला एकादशी कहते हैं।

37. मौनी अमावस (माघ अमावस्या) :-

इस दिन मौन व्रत किया जाता है। यह दिन मनु का ‘जन्म दिवस’ भी है। ऐसा माना जाता है कि मौन रहने से आत्मबल में वृद्धि होती है व मौन धारण करके व्रत का समापन करने वाले व्यक्ति को मुनि का पद प्राप्त होता है।

38. बसंत पंचमी (माघ शुक्ला-5) :-

  • यह दिन ऋतुराज बसंत के आगमन का प्रथम  दिवस माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण इस उत्सव के अधिदेवता हैं इसलिए ब्रज प्रदेश में आज के दिन राधा और कृष्ण की लीलाएँ रचाई जाती हैं। इस दिन से फ़ाग उड़ाना प्रारम्भ करते हैं जिसका क्रम फाल्गुन की पूर्णिमा तक चलता है।
  • गेहूँ  और जौ की स्वर्णिम बालियाँ भगवान को अर्पित की जाती हैं। बसंत ऋतू कामोद्वीपक होती है। इस दिन कामदेव और राति का प्रधान रूप से पूजन करते हैं। इस दिन लोग पिले वस्त्र पहनते हैं व घरों में पीले मीठे चावल बनाकर खाते हैं। 

39. माघ पूर्णिमा :-

  • माघ मास की पूर्णिमा का धार्मिक दृष्टि से बड़ा महत्व है। स्नान पर्वों का यह अंतिम प्रतीक है।  इस दिन स्नानादि से निवृत होकर विष्णु पूजन, पितृ श्राद्र कर्म तथा भिखारियों को दान देने का विशेष महत्व है। इस दिन गंगा स्नान करने का भी विशेष महत्व है।

40. शिवरात्रि (फाल्गुन कृष्णा-13) :-

  • यह शिवजी का जन्मोत्स्व है। इस दिन श्रदालुगण व्रत रखते हैं व शिव पुराण का पाठ करते हैं। दूसरे दिन प्रातः जौ, तिल, खीर, बिल्व पत्रों का हवन करके ब्राह्मणों को भोजन कराकर व्रत का पारण किया जाता है। 

41. ढूँढ़ (फाल्गुन सदी-11) :-

  • बच्चा होने पर ढूँढ होली से पहले वाली ग्यारस को पूजते हैं। जब किसी के यहाँ लड़का पैदा हो तो उसी वर्ष ढूँढ पूजी जाती है।

42.होली (फाल्गुन पूर्णिमा) :-

  • इस दिन हिरणकश्यप की आज्ञा पर उनकी बहन होलिका प्रह्राद को गोद में लेकर अग्नि में प्रविष्ट होती है लेकिन प्रह्राद बच जाता है  व होलिका जल जाती है।
  • अतः भक्त प्रह्राद की स्मृति में इस पर्व को मनाया जाता है। इस दिन सब स्त्रियाँ कच्चे सूत की कुकड़ी, जल का लोटा, नारियल आदि द्वारा होली की पूजा करती हैं।
  • हौली में कच्चे चने युक्त हरी डालियाँ व कच्चे गेहूँ की बालियाँ आदि भूनकर घर लाई जाती हैं। 
  • होली जलने पर पुरुष होली के डंडे को बहार निकलते हैं क्योकि इस डंडे को भक्त प्रह्राद का प्रतीक माना जाता है।

43. धुलंडी (चैत्र कृष्णा-1) :-

  • चैत्र माह की कृष्णा प्रतिपदा को होली के दूसरे दिन धुलंडी मनायी जाती है। इस दिन होली की अवशिष्ट राख की वंदना की जाती है व रंग गुलालादि से सभी होली खेलते है।   

44. घुड़ला का त्यौहार (चैत्र कृष्णा-8) :-

  • यह त्यौहार राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में चैत्र कृष्णा अष्टमी से लेकर चैत्र शुक्ला तृतीया तक ही मनाया जाता है। इस दिन स्त्रियाँ एकत्रित होकर कुम्हार के घर जाकर छिद्र किये हुए एक घड़े में दीपक रखकर अपने घर में गीत गाती हुई लौटती हैं। 
  • यह घड़ा बाद में तलाब में बहा दिया जाता है। इस त्यौहार पर चैत्र सुदी तीज को मेला भरता है।

45. शीतला अष्टमी (चैत्र कृष्णा-8) :-

  • इस दिन शीतला माता की पूजा की जाती है व ठण्डा  भोजन किया जाता है। समस्त भोजन सप्तमी की संध्या को ही बनाकर रखा जाता है। बच्चे के चेचक निकलने पर शीतला माता की ही पूजा की जाती है।

46. नववर्ष (चैत्र शुक्ला 1 ):-

  • हिन्दुओं का नववर्ष इसी दिन प्रारम्भ होता है। इस दिन गुड़ी पड़वा का त्यौहार भी मनाया जाता है।

47. अरुधंति व्रत (चैत्र शुक्ला-1) :-

  • यह व्रत चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा से आरम्भ होता है और चैत्र शुक्ला तृतीया को समाप्त होता है।
  • स्त्रियाँ के चरित्रोत्थान के लिए यह वृत्त किया जाता है। जन्म जन्मातर के वैधव्य दोष से बचने के लिए स्त्रियों को यह व्रत अवश्य करना चाहिए।

48. सिंजारा :-

  • यह त्यौहार पुत्री और पुत्रवधु के प्रति प्रेम का प्रतीक है। गणगौर व तीज के एक दिन पूर्व सिंजारा भेजा जाता है जिसमें साड़ी, शृंगार की सामग्री, चूड़ी, महेंदी, रोली, मिठाई आदि पुत्री तथा पुत्रवधु के लिए भेजी जाती है।

49. गणगौर (चैत्र शुक्ला-3) :-

  • यह सुहागिन स्त्रियों का महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह शिव व पार्वती के अखड़ प्रेम का प्रतीक पर्व है। गणगौर में ‘गण’ महादेव का व ‘गौरी’ पार्वती का प्रतीक है। 
  • इस दिन कुँवारी कन्याएँ मनपसंद वर प्राप्ति का तथा विवाहित स्त्रियाँ अपने अखंड सौभाग्य की कामना  करती है।
  • चैत्र कृष्णा एकम से ही  गणगौर पूजन आरम्भ हो जाता है व चैत्र शुक्ला तृतीया तक यह क्रम चलता रहता है। इस दिन गणगौर की सवारी निकली जाती है। जयपुर और उदयपुर की गणगौर प्रसिद्ध है।

50. अशोकाष्टमी (चैत्र शुक्ला-8) :-

  • इस दिन अशोक वृक्ष के पूजन का विधान है।

51. रामनवमी (चैत्र शुक्ला-9) :-

  • मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जन्म दिवस के रूप में यह त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन रामायण का पाठ किया जाता है। 
  • श्रदालुगण सरयू नदी में स्नान करके पुण्य लाभ कमाते हैं। यह अंतिम नवरात्रा को मनाई जाती है।

52.आखा तीज या अक्षय तृतीया (वैशाख शुक्ला 3) :-

  • राज्य में कृषक सात अन्नों तथा हल का पूजन करके शीघ्र वर्षा की कामना के साथ यह त्यौहार मनाते हैं। शास्त्रानुसार इस दिन से सतयुग और त्रेतायुग का आरम्भ माना जाता है क्योंकि इस दिन किया हुआ तप, ज्ञान तथा दान अक्षय फलदायक होता है।
  • संपूर्ण वर्ष में यह एकमात्र अबूझ सावा है। इस दिन राज्य में हजारों विवाह विशेषतः बाल विवाह सम्पन्न होते है। 

53.  वट सावित्री  व्रत या बड़मावस (ज्येष्ठ अमावस्या ) :-

  • इस व्रत से स्त्री को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस व्रत के अंर्तगत स्त्रियाँ बड़ या बरगद की पूजा कर पुत्र और पति की आरोग्यता के लिए प्रार्थना करती है। वट सावित्री की कथा सुनी जाती है।

54. निर्जला एकादशी (ज्येष्ठ शुक्ला एकादशी ):-

  • इस व्रत में एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण नहीं किया जाता है। इस व्रत से श्रेष्ठ  फल की प्राप्ति होती है।

55. पीपल पूर्णिमा  :-

यह वैशाख पूर्णिमा को मनाई जाती है। इस दिन बुद्ध पूर्णिमा भी मनाई जाती है।

56. योगिनी एकादशी (आषाढ़ कृष्णा-11) :-

  • एक एकादशी का व्रत करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

57. देवशयनी एकादशी  :-

  • आषाढ़ शुक्ला 11 के दिन भगवान विष्णु चार माह के लिए सो जाते हैं। इस दिन से चार माह तक कोई भी मांगलिक कार्य सम्पन्न नहीं किये जाते हैं।

58. गुरु पूर्णिमा (आषाढ़ पूर्णिमा) :-

  • इस दिन गुरु-पूजन होता है व यथा शक्ति गुरूजी को भेंट की जाती है। इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते है।

59. सावन के सोमवार :-

  • यह व्रत श्रावण मास के सभी सोमवारों को करते है। 
  • इस दिन शिवजी की पूजा की जाती है। इन्हे वन सोमवार भी कहते है क्योकि घर से खाना तैयार कर वन में किसी सुरम्य स्थल पर जाकर भोजन किया जाता है।

60. मंगला गोरी पूजा :-

  • श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को गोरी की पूजा व व्रत किया जाता है।

61. नाग पंचमी ( श्रावण कृष्ण 5) :-

  • यह नागों का त्यौहार है। इस दिन सर्प की पूजा की जाती है। कहीं-कहीं यह त्यौहार श्रावण शुक्ला पंचमी को भी मनाया जाता है।

62. निड़री नवमी (श्रावण कृष्णा-9) :-

  • सर्पों के आक्रमण से बचने के लिए श्रावण नवमी को नेवलों की पूजा की जाती है जिसे निड़री नवमी कहते है। 

63. कामिका एकादशी (श्रावण कृष्णा-11) :-

  • इस व्रत में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।

64. हरियाली अमावस (श्रावण अमावस्या) :-

  • इस दिन खीर व मालपूए भोजन में बनाते हैं। ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं। लोग अपने परिवारजनों के साथ उधान अथवा अन्य रमणीय स्थलों पर जाकर आनंद मनाते हैं।

65. जलझुलनी/देवझूलनी एकादशी :-

  • भाद्रपद शुक्ला-11 के दिन देव मूर्तियों को पालकियों और विमानों (बेवाण) में विराजमान कर जुलुस में गाजे बाजे के साथ जलाशय के पास ले जाकर स्नान करवाया जाता है। 

 

 

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Major Festivals of Rajasthan – RAS 2018 | RAS GK | Exam Preparation

Major Festivals of Rajasthan – RAS 2018 | RAS GK | Exam Preparation

Major Festivals of Rajasthan – RAS 2018 | RAS GK | Exam Preparation

Major festivals of Rajasthan –

(A) Major festivals of the Hindus: –

1.Shravani Teej Or Chhoti Teej: –

  • This is mainly a festival of women in which women fast for their husband’s long life. On this day, ‘Teej Mata’ sawari  is organized in Jaipur.
  • Along with Teej, it is considered  the arrival of festivals which end with the Gangaur.

2.Raksha Bandhan (Shravan Purnima): –

  • This festival symbolized by the love of brother and sister, the sisters tie colorful rakhis on the brothers arm and  wishes for her brother’s life. Brother takes the pledge of protecting his sister.
  • On this day, both of the main entrances of the house portrait  of Shravan Kumar is made and he is worshipped. It is also called ‘nariyal Poornima’. On the day of Rakshabandhan, A Shivling of the ice is built at the famous pilgrim site Amarnath.

3.Big Teej / Saturi Teej / Kajali Teej (Bhadr Krishna ): –

    • This festival is celebrated by women for longevity and goodwill, in which women hold fast the whole day and take the food only after having a glimpse of the moon in the night.
    • On this day the women hear the story of Teej mother after worshiping Neem. Sattu is eaten on this day.

4. Old Teej (Bhadr Krishna-3): –

  • On this day, cows are worshipped after fasting the whole day. Seven dough of flour are made for seven cows and after feeding the cows, they eadt food.

5. Hal Shashthi (Bhadrapad Krishna-6): –

  • This festival is celebrated as the birth anniversary of Shri Balram Ji, the elder brother of Krishna Lord.
  • Plough is worshiped on this day and cow’s milk and curd are not consumed. This fast is performed by women having a son .

6. Ub Chhath (Bhadra Krishna-6): –

  • Fasting is done on this day and after bathing in the evening, worshiping the sun god with sandalwood and flowers is given as ardha.
  • Afterwards, they remain standing up to Moonrise. After Moonrise, the devotees open their fast by performing ritual worship. This fast is also called ‘Chandan Shashthi Vrat’.

7. Krishna Janmashtami (Bhadrapad Krishna-8):

  • It is celebrated in the form of Krishna birth anniversary. On this day the Jhaankies are decorated related to  the life of Lord Krishna in the temples. After fasting all day, at night at twelve o’clock, on the birth of Shri Krishna, food is served by the arti and special pooja of Shri Krishna.

8. Goga Navami (Bhadrapad Krishna-9): –

  • On this day folk god Gogaji is worshiped. In the district of Hanumangarh, the fair fills  at ‘Gogamadi’. 

9. Bachbaras (Bhadrapad Krishna 12): –

  • On this day, women having sons fast for their son’s goodwill. The items made from wheat, barley and cow’s milk are not used on this day and food made with sprouted gram, peas, moth and mustard is taken. Cow and calves are served on this day.

10. Satiyaan Amavas: –

  • The new moon of bhaadva is called the satiya amavasya.

11. Haratalika Teej (Bhadrapad Shukla 3): –

  • This festival is celebrated with the worship of Gauri-Shankar. All  women can do this fast. Parvati and Shiva are worshiped after the fasting the whole day and after bathing in the evening. 
  • Thirteen types of sweet dishes are made.

12. Shiva Chaturthi (Bhadrapad Shukla 4): –

  • On this day, women fast and make make foor for their parents in law. food is  cooked with ghee, jaggery, salt etc.

13. Ganesh Chaturthi (Bhadrapad Shukla 4): –

  • It is celebrated with great pomp throughout India. Vigyan Vinayak Shri Ganesh is at the highest place among deities. His vehicle is a rat and Modak is his favorite food.
  • In Maharashtra, this festival is celebrated specially and after  the procession, the statue of Ganapati is immersed in water. People Celebrate this festival in the form of Ganesh’s birthday. 
  • In the temples, Idols of Ganesh ji are decorated and the devotees offer Laddus.

14. Rishi Panchami (Bhadrapad Shukla-5): –

  • On this day, the Ganga bath is a special honor. This fast is done for the cleansing of known-unknown sins. The story is heard after worshiping Ganesh ji’s kalash, Navagraha and Satya Rishi and Arundhati. Rakhi is celebrated on this day in the Maheshwari society.

15. Radhashtami (Bhadrapad Shukla 8): –

  • It is celebrated as the birth of Radha ji. On this day a fair is organized in Nimbarka center of Ajmer in ‘Salamabad’. 

16. Shraadhudkha (Bhadrapad Purnima): –

  • From this day, sarvapitra Shraadh paksh starts and  continues till ashwin amavasya. In this period, Shraddha is done. It is auspicious to devote  to the elderly on the date of death and to feed the Brahmin.

17. Sanjhi: –

  • In this festival, for 15 days ( Bhadra Purnima to Ashwani Amavasya ), Unmarried  girls form different connotations & perform puja.

18. Navratra: –

  • It is celebrated twice a year. The first Navratra  is from Chaitra Shukla Ekam to Navami and the second from Ashwin Shukla Ekam to Navami. 
  • Durga is worshiped for nine days and Ramayana is recited. On the 9th day, 9 Unmarried girls are fed food. Navaratri of Chaitra is also called ‘Vasanthi Navaratri’.

19. Durgashtami (Ashwin Shukla 8): –

  • It is celebrated exclusively throughout India, especially in West Bengal. This day Goddess Durga is worshiped.

20. Dussehra (Ashwin Shukla-10): –

  • This festival is celebrated throughout India. On this day Lord Rama slaughtered Ravana and conquered evil. Therefore it is also called Vijaya Dashmi. The effigies of Ravana, Kumbhakaran and Meghnath are burnt at sunset on this day. 
  • In Rajasthan, there is a huge fair of Dussehra in Kota city and in Mysore city of India. The Shamy tree (Khejahi) is worshiped on Dussehra and the sight of Lilatas bird  is considered auspicious.

 

Major Festivals
21. Shradh Purnima (Ashwin Purnima): –

  • Ashwin Purnima is called Shradh Purnima. It is also called Ras Purnima. People fast on this day.

22. Karwa Chauth (Karthik Krishna-4): –

  • This festival is the most beloved festival of women. On this day married ladies fast, and in the evening, moon is prayed by giving ardhya to the moon. 
  • ladies Wish for the husband’s health, longevity.

23. Ahoi Ashtami (Karthik Krishna-8): –

  • On this day, the daughter-in-law of women have  fast even without drinking water. On the wall, the portrait of syau mata and her children are made, and in the evening the ardhya is given to the moon.

24. Tulsi Ekadashi (Karthik Krishna 13): –

  • Tulsi is worshiped on this day. The glory of a plant named Tulsi is also described in the scriptures along with valid texts. Tulsi is also considered as Vishnu Priya.

25. Dhanteras (Karthik Krishna-13): –

  • Dhanvantri Vadhya Ji is worshiped on this day. Yamraaj is also worshiped on this day. 
  • For the yam, the lamp is made of flour and kept on the main door of the house. Buying new utensils is considered auspicious on this day.

26. Roop Chaturdashi (Karthik Krishna 14): –

  • This festival is related to cleanliness and beauty. Therefore, on this day the house is cleansed  by washing and cleaning it. This day chhoti Deepawali is also celebrated.

27. Deepawali (Karthik Amavasya): –

  • This is the biggest festival of Hindus. On this day, Lord Ram returned after fourteen years of exile. This festival is also a festival of Lakshmi.
  • The beginning of Vikram Samvat is also considered from this day. It is also considered as Nirvana Day of Lord Mahavir, founder of Arya Samaj – Maharshi Dayanand and Lord Mahavira. 
  • On this day, Vaishyas change their accounts and make a statement of profit and loss throughout the year.
  • On this day home , shops and city are well decorated. All wear new clothes, sweets are made, Lakshmi is worshiped in the evening and firecrackers are burst.

28. Govardhan Pooja and Annakoot (Kartik Shukla-1): –

  • Gowardhana is worshiped with cow dung during dawn, and Annakoota made from 56 type of dishes is offered in the temple.

29. Bhaiyadooj (Kartik Shukla-2): –

  • The main goal of this festival is to establish a strong relationship and affection of brother and sister.
  • On this day, sisters by placing tilak on brother, wishes for his healthy and long-life. It is also celebrated as Yama II.

30. Goposhtami (Kartik Shukla-8): –

  • Cow and calf are worshiped on this day. It is believed that all the wishes are fulfilled on this day by giving food to them, and going around them with them for a while.

 

 

Major Festivals of Rajasthan – RAS 2018 | RAS GK | Exam Preparation

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(A) हिन्दुओं के प्रमुख त्यौहार :-

  • श्रावणी तीज या छोटी तीज :-
  • यह मुख्यतः स्त्रियों का त्यौहार है जिसमें स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत करती हैं। जयपुर में इस दिन ‘तीज माता’ की सवारी निकाली जाती है।
  • तीज के साथ ही मुख्यतः त्योहारों का आगमन माना जाता है जो गणगौर के साथ समाप्त होता है।

2.  रक्षा बंधन (श्रावण पूर्णिमा) :-

  • भाई व बहिन के प्रेम के प्रतीक इस त्यौहार के दिन बहनें अपने भाइयों की  कलाइयों पर रंगबिरंगी राखियाँ बाँध कर रक्षा का वचन लेती हैं व उनके जीवन की मंगलकामना करती हैं।
  • इस दिन घर के प्रमुख द्वार के दोनों और श्रवण कुमार के चित्र बनाकर पूजन करते हैं। इसे ‘नारियल पूर्णिमा’ भी कहते हैं। रक्षाबंधन के दिन भारत के प्रसिद्ध तीर्थ अमरनाथ में बर्फ का शिवलिंग बनता है।

3.  बड़ी तीज/ सातुड़ी तीज/ कजली तीज (भाद्र कृष्णा 3) :-

  • यह त्यौहार स्त्रियों द्वारा सुहाग की दीर्घायु व मंगलकामना के लिए मनाया जाता है,जिसमें स्त्रियों दिन भर निराहार रखकर रात्रि को चन्द्रमा के दर्शन कर अर्ध्य देकर भोजन ग्रहण करती हैं।
  • इस दिन संध्या पश्चात स्त्रियाँ नीम की पूजा कर तीज  माता की कहानी सुनती हैं। इस दिन सत्तू खाया जाता है। 

4. बूढ़ी तीज ( भाद्र कृष्णा-3) :-

  • इस दिन व्रत रखकर गायों का पूजन करते है सात गायों के लिए आटे की सात लोई बनाकर उन्हें खिलाकर कर ही भोजन ग्रहण किया जाता है।

5.  हल षष्ठी (भाद्रपद कृष्णा-6) :-

  • यह त्यौहार कृष्ण भगवान के ज्येष्ठ भ्राता श्री बलराम जी के जनमोत्स्व के रूप में मनाया जाता है।
  • इस दिन हल की पूजा की जाती है व गाय के दूध और दही का सेवन नहीं किया जाता। इस व्रत को पुत्रवती स्त्रियाँ करती है।

6. ऊब छठ (भाद्र कृष्णा-6) :-

  • इस दिन उपवास किया जाता है व सायंकाल को स्नान करके सूर्य भगवान की चंदन व पुष्प  से पूजा कर अर्ध्य दिया जाता है।
  • ततपश्चात चन्द्रोदय तक खड़े ही रहते हैं। चन्द्रोदय के पश्चात चन्द्रमा को अर्ध्य देकर पूजा व्रत  पूजा कर व्रत खोलते है। इस व्रत को ‘चंदन षष्ठी व्रत’ भी कहा जाता है।

7.   कृष्ण जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्णा -8) :-

  • इसे कृष्ण जन्मोत्स्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों में श्री कृष्ण के जीवन से संबंधित झाँकियाँ सजाई जाती है। पुरे दिन उपवास के बाद रात बारह बजे श्री कृष्ण जन्म होने पर श्री कृष्ण की आरती व विशेष पूजा-अर्चना करके भोजन किया जाता है।

8.   गोगा नवमी (भाद्रपद कृष्णा-9) :-

  • इस दिन लोकदेवता गोगाजी की पूजा की जाती है। हनुमानगढ़ जिले में ‘गोगामेड़ी’ नामक स्थान पर मेला भरता है। 

9. बछबारस (भाद्रपद कृष्णा 12) :-

  • इस दिन पुत्रवती स्त्रियाँ पुत्र की मंगलकामना के लिए व्रत करती हैं। इस दिन गेहूँ, जौ और गाय के दूध से बनी वस्तुओं का प्रयोग नहीं किया जाता है तथा अंकुरित चने, मटर, मोठ व मुंग युक्त भोजन किया जाता है। इस दिन गाय व बछड़ों की सेवा की जाती है।

10. सतियाँ अमावस :-

  • भादवा बदी अमावस्या को सतियाँ की अमावस कहते हैं।

11.  हरतालिका तीज (भाद्रपद शुक्ला 3) :-

  • इस पर्व को गौरी-शंकर का पूजन करके मनाया जाता है। इस व्रत को सभी प्रकार की स्त्रियाँ  कर सकते हैं। पुरे दिन निराहार रहकर सायंकाल स्नानादि के पश्चात् पार्वती व शिव की पूजा की जाती है।   
  • तेरह प्रकार के मीठे  व्यंजन बनाकर कल्पे जाते हैं।

12. शिवा चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ला 4) :-

  • इस दिन स्त्रियाँ उपवास करती है तथा अपने सास-ससुर को घी, गुड़, लवण आदि से बना भोजन करती हैं।

13. गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ला 4) :-

  • इसे सम्पूर्ण भारत में धूमधाम से मनाया जाता है। विघ्न विनायक श्री गणेश जी को देवताओं में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। इनका वाहन चूहा है व मोदक इनका प्रिय भोग है।
  • महाराष्ट्र में यह त्यौहार विशिष्ट रूप से मनाया जाता है व जुलुस निकालकर गणपति की प्रतिमा को जल में विसर्जित किया जाता है। इस पर्व को गणेश जन्मोत्स्व के रूप में मनाते है। 
  • मंदिरों में गणेश जी की झाकियाँ सजाई जाती है व श्रद्धालुगण लड्डू चढ़ाते हैं।

14. ऋषि पंचमी (भाद्रपद शुक्ला-5) :-

  • इस दिन गंगा स्नान का विशेष महात्म्य है। यह व्रत जाने-अनजाने हुए पापों के प्रक्षालन हेतु किया जाता है। गणेश जी का कलश, नवग्रह तथा सप्त ऋषि व अंधरुति की पूजा करके कथा सुनी जाती है। माहेश्वरी समाज में राखी इस दिन मनाई जाती है।

15. राधाष्टमी (भाद्रपद  शुक्ला 8) :-

  • यह राधा जी के जन्म के रूप में मनाया जाता है। इस दिन अजमेर की निम्बार्क पीठ ‘सलेमाबाद’ में मेला मेला भरता है। 

16.  श्राद्धुपक्ष (भाद्रपद पूर्णिमा) :-

  • इस दिन से सर्वपितृ श्राद्ध पक्ष प्रारम्भ हो जाता है तथा आश्विन अमावस्या तक चलता है। इस अवधि में श्राद्ध किया जाता है। बुजुर्गों की मृत्यु तिथि के दिन श्रद्धापूर्वक तर्पण और ब्राह्मण को भोजन कराना ही श्राद्ध है।

17. साँझी  :-

  • इस त्यौहार में 15 दिन तक (भाद्र पूर्णिमा से अश्विन अमवस्या) कुँवरी कन्याएँ भाँति-भाँति की संझ्याएँ बनाती हैं व पूजा करती है।

18. नवरात्रा :-

  • यह वर्ष में दो बार मनाए जाते है। प्रथम नवरात्रा चैत्र शुक्ला एकम से नवमी तक व द्वितीय  आश्विन शुक्ला एकम से नवमी तक होते हैं। 
  • नौ दिन तक दुर्गा की पूजा की जाती है व रामायण का पाठ किया जाता है। नवें दिन  9 कुँवारी कन्याओं को भोजन कराया जाता है। चैत्र मास की नवरात्रि को ‘वासंतीय नवरात्रि’ भी कहते है।

19. दुर्गाष्टमी (आश्विन शुक्ला 8) :-

  • यह सम्पूर्ण भारत में विशेषतः प.बंगाल में उल्लासपूर्वक मनायी जाती है। इस दिन देवी दुर्गा की पूजा की जाती है।

20.  दशहरा (आश्विन शुक्ला-10) :-

  • यह त्यौहार सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है। इस दिन भगवान राम ने रावण का वध कर बुराई पर विजय पाई थी। इसलिए इसे विजयादशमी भी कहते है। इस दिन सूर्यास्त होते ही रावण, कुम्भकरण व मेघनाथ के पुतले जलाए जाते हैं। 
  • राजस्थान में कोटा शहर में तथा भारत के मैसूर शहर में दशहरे का बहुत बड़ा मेला लगता है। दशहारे पर शमी वृक्ष (खेजड़ी) की पूजा की जाती है और लीलटास पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है।

21. शरद पूर्णिमा (आश्विन पूर्णिमा ):-

  • आश्विन पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। इसे रास पूर्णिमा भी कहते हैं। । इस दिन व्रत किया जाता है।

22. करवा चौथ (कार्तिक कृष्णा – 4) :-

  • यह त्यौहार स्त्रियों का सर्वाधिक प्रिय त्यौहार है। इस दिन सुहागिन स्त्रियाँ व्रत करती हैं व सायंकाल चंद्रोदय पर चन्द्रमा को अध्र्य देकर भोजन किया जाता है। 
  • पति के स्वास्थ्य, दीर्घायु एवं मंगल की कामना करती हैं।

23. अहोई अष्टमी (कार्तिक कृष्णा-8) :-

  • इस दिन पुत्रवती स्त्रियाँ निर्जल व्रत करती है। दीवार पर स्याऊ माता व उसके बच्चे बनाए जाते हैं व शाम को चन्द्रमा को अर्ध्य देकर भोजन किया जाता है।

24. तुलसी एकादशी (कार्तिक कृष्णा 13) :-

  • इस दिन तुलसी की पूजा की जाती है। तुलसी नामक पौधे की महिमा वैधक ग्रंथों के साथ-साथ धर्मशास्त्रों में भी वर्णित की गई हैं। तुलसी को विष्णु प्रिया भी माना गया है।

25. धनतेरस (कार्तिक कृष्णा-13) :-

  • इस दिन धन्वंतरि वैध जी का पूजन किया जाता है। इस दिन यमराज का भी पूजन किया जाता है। 
  • यम के लिए आटे का दीपक बनाकर घर के मुख्य द्वार पर रखा जाता है। इस दिन नए बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है।

26. रूप चतुर्दशी (कार्तिक कृष्णा 14) :-

  • इस पर्व का संबंध स्वच्छता व सौंदर्य से हैं। इसलिए इस दिन घर की सफाई करके चुने से पोतकर उसे स्वच्छ किया जाता है। इस दिन छोटी दीपावली भी मनाई जाती है।

27. दीपावली (कार्तिक अमावस्या) :-

  • यह हिन्दुओं का सबसे बड़ा त्यौहार है। इस दिन भगवान राम चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण करके आयोध्या लोटे थे। यह पर्व लक्ष्मी का उत्सव है।
  • विक्रम संवत का प्रारम्भ भी इसी दिन से माना जाता है। यह आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द व भगवान महावीर का निर्वाण दिवस भी माना जाता है। 
  • इस दिन वैश्य लोग अपने-अपने बही खाते बदलते हैं और वर्ष भर की लाभ-हानि का विवरण बनाते है
  • इस दिन घर, दुकानों व शहर को खूब सजाया सँवारा जाता है। सभी नए कपड़े पहनते हैं, मिठाइयाँ बनाई जाती है, शाम को लक्ष्मी पूजन किया जाता है व पटाखे छोड़े जाते हैं।

28.  गोवर्धन पूजा व अन्नकूट (कार्तिक शुक्ला-1)

  • इस दिन प्रभात के समय गौ के गोबर से गोवर्धन की पूजा की जाती है व छप्पन्न प्रकार के पकवानों से बने अन्नकूट से मंदिर में भोग लगाया जाता है।

29.  भैयादूज (कार्तिक शुक्ला-2) :-

  • इस पर्व का प्रमुख लक्ष्य भाई-बहन के पावन संबंध तथा प्रेमभाव की स्थापना करना है। 
  • इस दिन बहने भाई के तिलक लगाकर उनके स्वस्थ व दीर्घायु होने की मंगलकामना करती हैं। इसे यम द्वितीय के रूप में भी मनाया जाता है।

30. गोपष्टमी (कार्तिक शुक्ला-8) :-

  • इस दिन गाय व बछड़े का पूजन किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन गौओं को ग्रास देकर, उनकी परिक्रमा करके थोड़ी दूर तक उनके साथ जाने से समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। 

 

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RAS 2018 Industrial Development in Rajasthan Part 1 | Rajasthan Economics

RAS 2018 Industrial Development in Rajasthan Part 1 | Rajasthan Economics

RAS 2018 Industrial Development in Rajasthan Part 1 | Rajasthan Economics

Industrial development during five year plans –

Condition before Independence in Rajasthan

  • Prior to the integration of Rajasthan in 1949, Rajasthan had many small states, lacking the means of electricity, water and transportation.
  • For this reason, it was not possible to develop large scale modern industries.
  • Before attaining independence, there were only seven cotton-textiles industries , two cement factories, and two sugar mills in Rajasthan.
  • Due  to lack of good beginning , even today, Rajasthan is considered to be a backward state from the industrial point of view. 

Position of Rajasthan in factory sector

  • Rajasthan has a very low position in India’s industrial economy.
  • Only 4.3% of the factories registered in India are located in Rajasthan .
  • In terms of employment in  factory sector, Rajasthan’s share in  India was 3.5%.
  • Rajasthan’s share was only 2.5% in net value added by manufacturing.
  • Therefore, the position of Rajasthan has been very low  in the factory sector.
  • Various indicators of factory sector, such as the number of factories, fixed capital, employment and manufacturing,  the share of Rajasthan lies between 3-4%, which is considered very low low. 
  • According to DES, Jaipur survey report  2011-12
    • Number of Reporting Factories – 7414,
    • The amount of fixed capital amounted to Rs 51,696 crore,
    • Number of employees – 4.52 lakh
    • The amount of net value added by manufacturing – 38155 crores.
  • Most of the small units are found in Rajasthan are small scale units.
  • More than half the units are engaged in the manufacture of metal materials, leather goods and non-metallic minerals.
  • The Government has given considerable emphasis on power generation for the industrialization of the state during the five year plans. 
  • Thermal and power plants have been established in the state.
  • Nuclear Power has also been developed in the state
  • At the beginning of the first five year plan, the installed capacity of power was only 13 MW, which was approximately 17440 MW at the end of 31, March 2016.
  • Similarly, the water availability  was also expanded in the cities and villages.
  • Roads were built and many concessions were given to entrepreneurs such as land allocation, reducing power cost and financial support etc.
  • As a result of these concessions, the number of factories has increased considerably. 

राजस्थान में आज़ादी से पहले की स्थिति

  • 1949  में राजस्थान के एकीकरण के पूर्व, राजस्थान में कई छोटे बड़े राज्य थे जिनमे, बिजली, पानी व यातायात के साधनों का अभाव था  
  • इस  कारण से बड़े पैमाने पर आधुनिक उद्योगों का विकास करना संभव नहीं था
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व राज्य में केवल सात सूती-वस्त्र मिलें, दो सीमेंट कि फैक्ट्री, व दो चीनी मील थी ।
  • अच्छी शुरुआत न होने के कारण, आज भी राजस्थान औद्योगिक दृष्टि से एक पिछड़ा हुआ राज्य माना जाता है ।

राजस्थान का भारत में फैक्ट्री क्षेत्र में स्थान

  • राजस्थान का भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था में काफी नीचा स्थान है
  • इस वर्ष भारत में पंजीकृत फैक्ट्रियों का 4.3% हिस्सा ही राजस्थान में स्थित है ।
  • फैक्ट्री क्षेत्र में रोजगार की दृष्टि से राजस्थान का समस्त भारत में अंश 3.5% था ।
  • विनिर्माण द्वारा जोड़े गए शुद्ध मूल्य में भी राजस्थान का अंश 2.5% ही था ।
  • अतः राजस्थान का स्थान औद्योगिक दृष्टि से फैक्ट्री क्षेत्र में काफी नीचे रहा है ।
  • फैक्ट्री क्षेत्र के विभिन्न सूचकों, जैसे फैक्ट्रियों की संख्या, स्थिर पूंजी, रोजगार व विनिर्माण द्वारा वर्धित मूल्य में राजस्थान का अंश 3-4% के बीच आता है, जो काफी नीचे माना जाता है । 
  • DES, जयपुर के सर्वे के अनुसार राज्य में 2011-12 में
    • रिपोर्टिंग फैक्ट्रियों  की संख्या – 7414,
    • स्थिर पूंजी की राशि 51696 करोड़ रुपये,
    • कर्मचारियों की संख्या – 4.52 लाख
    • विनिर्माण द्वारा जोड़े गए शुद्ध मूल्य की राशि – 38155 करोड़ रही
  • राजस्थान में लघु इकाइयों में ज्यादातर, अति इकाइयाँ  लघु  पायी जाती हैं
  • आधी से अधिक इकाइयाँ धातु पदार्थों, चमड़े की वस्तुओं व अधात्विक खनिज पदार्थों के निर्माण में लगी हुई हैं ।
  • सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं में राज्य के औद्योगिकीकरण के लिए विद्युत सृजन पर काफी बल दिया है । 
  • राज्य में थर्मल व विद्युत संयंत्रों की स्थापना की गयी है
  • राज्य में अणुशक्ति का भी विकास किया गया है
  • प्रथम योजना के प्रारंभ में शक्ति की प्रस्थापित क्षमता केवल 13 मेगावाट थी जो 31, मार्च 2016  के अंत में लगभग 17440 मेगावाट हो गयी ।
  • इसी प्रकार पानी की व्यवस्था का भी नगरों व गावों में विस्तार किया गया ।
  • सड़कों का निर्माण किया गया तथा उद्यमकर्ताओं को कई प्रकार की रियायतें दी गयी जैसे – भूमि आवंटन, विद्युत  कम करना, वित्तीय सहायता आदि।
  • इन रियायतों के फलस्वरूप फैक्ट्रियों की संख्या काफी बढ़ी है । 

Position of industries in domestic product and   employment in Rajasthan Industries in net  domestic origin of state-

  • Nowadays, in the broad definition of the industrial sector it is considered to be equivalent to the secondary sector.
  • It includes mining, manufacturing and electricity, gas and water supply and construction.
  • State’s Net Value Upgradation (NVA) – On the values ​​of 2011-12 on the value of industries at fixed prices –
    • Mining and Stone removal – 7.3%
    • Manufacturing – 9.7%
    • Electricity, gas and water supply – 1.1%
    • Construction – 9.9%
    • Total – 28% 
  • It is clear from the table that the industrial contribution of ​​Rajasthan was 28% in 2015 in the net value addition.
  • In Rajasthan, the share of the state’s income in the state is still very low. It needs to be enhanced in the future.
  • In 2014-15, the contribution of net value added (NVA) to manufacturing, construction, electricity, gas and water supply at all-India level was 27.3%, while in Rajasthan it was about 29%. Therefore, this ratio is relatively high in Rajasthan compared to India.
  • Pure value addition is considered to be of particular importance in the manufacturing sector.
  • In Rajasthan it was estimated at around 10% in 2015-16.
  • Therefore, the share of manufacturing sector is still low .
  • Factory area or organized sector is primarily in registered area, whereas in the non-registered area there are rural and cottage industries, artisans etc.
  • In this, artisans produce goods by working at their home.
  • Still, the share of manufacturing has been reduced to about 10% in  (NVA), which is quite low. 

राजस्थान में उद्योगों का शुद्ध राज्य- घरेलु- उत्पत्ति तथा रोजगार में स्थान

उद्योगों का शुद्ध राज्य घरेलु उत्पत्ति में स्थान –

  • आजकल औद्योगिक क्षेत्र की व्यापक परिभाषा में इसे द्वितीयक क्षेत्र के बराबर माना जाने लगा है
  • इसमें खनन, विनिर्माण तथा विद्युत, गैस और जल-पूर्ति एवं निर्माण को शामिल करते हैं ।
  • राज्य की शुद्ध मूल्यवर्धन (NVA)  – स्थिर मूल्यों पर उद्योगों का स्थान 2011-12 के मूल्यों पर –
    • खनन व पत्थर निकालना – 7.3%
    • विनिर्माण –                     9.7%
    • विद्युत, गैस तथा जल-पूर्ति – 1.1%
    • निर्माण      –       9.9%
    • कुल      –      28% 
  • तालिका से स्पष्ट होता है कि औद्योगिक क्षेत्र का राजस्थान की शुद्ध मूल्यवर्धन में 2015-16 में 28% रहा था
  • राजस्थान में उद्योगों का राज्य की आय में अंश आज भी काफी कम है । इसे भविष्य में बढ़ाने की आवश्यकता है ।
  • 2014-15 में अखिल भारतीय स्तर पर विनिर्माण, निर्माण, विद्युत, गैस व जल पूर्ती का शुद्ध मूल्यवर्धन(NVA) में योगदान 27.3% रहा जबकि राजस्थान में यह लगभग 29% रहा था।  अतः राजस्थान में यह अनुपात भारत की तुलना में अपेक्षाकृत थोड़ा ऊँचा है ।
  • उद्योगों में विनिर्माण का अंश शुद्ध मूल्यवर्धन विशेष महत्त्वपूर्ण माना जाता है ।
  • राजस्थान में 2015-16 में यह लगभग 10% आँका गया था ।
  • अतः विनिर्माण क्षेत्र का अंश आज भी कम है
  • पंजीकृत क्षेत्र में फैक्ट्री क्षेत्र या संगठित क्षेत्र की प्रधानता होती है , जबकि गैर-पंजीकृत क्षेत्र में ग्रामीण व कुटीर उद्योग, दस्तकारियाँ आदि आते हैं ।
  • इसमें कारीगर अपने घर पर काम करके माल का उत्पादन करते हैं ।
  • अभी भी विनिर्माण का अंश शुद्ध मूल्यवर्धन (NVA) में लगभग 10% ही हो पाया है, जो काफी कम है ।  

 

Position of employment in industries in Rajasthan –

  • According to the 2011 census, the number of total workers (main + marginal) was 2.99 crore, which was 43.6% of the total population.
  • In the state
    • 62.1% of workers in agricultural work
    • 2.4% in domestic industries
    • 35.5% in other work
  • Efforts should be made to increase employment in industries by industrial development in the future.
  • For this, it is necessary to focus on the possibility of developing mining operations and small scale industries and various types of cottage industries in the state.
  • There are also development possibilities in the handloom sector in the state.
  • Many types of handicrafts can also be encouraged in the state.
  • In the field of electricity, gas and water supply, more workers can be given work.
  • This will increase industrial employment, increase the income of the people and improve their quality of life.
  • Foreign currency can also be earned more by exports of carpets, leather goods, handloom items and gems and jewelery etc. 

Industrial structure of Rajasthan

  • Under this, utility based industrial classification is studied.
  • In this, the relative importance of the following four types of industries is studied on the basis of employment or added net value contribution.
    • Industry of basic goods – such as steel, fertilizer, electricity etc.
    • Industries of capital goods like machinery, transport goods etc.
    • Industries of intermediate goods such as cotton yarn, paint, tire -tube  etc.
    • Industries of consumer goods – In these durable and non-sustainable consumer goods, items like sugar, salt, match, medicine are there. 

राजस्थान में उद्योगों का शुद्ध राज्य- घरेलु- उत्पत्ति तथा रोजगार में स्थान

उद्योगों का शुद्ध राज्य घरेलु उत्पत्ति में स्थान –

  • आजकल औद्योगिक क्षेत्र की व्यापक परिभाषा में इसे द्वितीयक क्षेत्र के बराबर माना जाने लगा है
  • इसमें खनन, विनिर्माण तथा विद्युत, गैस और जल-पूर्ति एवं निर्माण को शामिल करते हैं ।
  • राज्य की शुद्ध मूल्यवर्धन (NVA)  – स्थिर मूल्यों पर उद्योगों का स्थान 2011-12 के मूल्यों पर –
    • खनन व पत्थर निकालना – 7.3%
    • विनिर्माण –                     9.7%
    • विद्युत, गैस तथा जल-पूर्ति – 1.1%
    • निर्माण      –       9.9%
    • कुल      –      28% 
  • तालिका से स्पष्ट होता है कि औद्योगिक क्षेत्र का राजस्थान की शुद्ध मूल्यवर्धन में 2015-16 में 28% रहा था
  • राजस्थान में उद्योगों का राज्य की आय में अंश आज भी काफी कम है । इसे भविष्य में बढ़ाने की आवश्यकता है ।
  • 2014-15 में अखिल भारतीय स्तर पर विनिर्माण, निर्माण, विद्युत, गैस व जल पूर्ती का शुद्ध मूल्यवर्धन(NVA) में योगदान 27.3% रहा जबकि राजस्थान में यह लगभग 29% रहा था।  अतः राजस्थान में यह अनुपात भारत की तुलना में अपेक्षाकृत थोड़ा ऊँचा है ।
  • उद्योगों में विनिर्माण का अंश शुद्ध मूल्यवर्धन विशेष महत्त्वपूर्ण माना जाता है ।
  • राजस्थान में 2015-16 में यह लगभग 10% आँका गया था ।
  • अतः विनिर्माण क्षेत्र का अंश आज भी कम है
  • पंजीकृत क्षेत्र में फैक्ट्री क्षेत्र या संगठित क्षेत्र की प्रधानता होती है , जबकि गैर-पंजीकृत क्षेत्र में ग्रामीण व कुटीर उद्योग, दस्तकारियाँ आदि आते हैं ।
  • इसमें कारीगर अपने घर पर काम करके माल का उत्पादन करते हैं ।
  • अभी भी विनिर्माण का अंश शुद्ध मूल्यवर्धन (NVA) में लगभग 10% ही हो पाया है, जो काफी कम है ।  

राजस्थान में उद्योगों का रोजगार में स्थान –

  • 2011  की जनगणना के अनुसार कुल श्रमिकों( मुख्य+सीमान्त)  की संख्या 2.99 करोड़ थी जो कुल जनसंख्या का 43.6% था
  • राज्य में
    • 62.1% श्रमिक कृषिगत कार्यों में
    • 2.4% घरेलु उद्योगों में
    • 35.5% अन्य क्रियाओं में
  • भविष्य में राज्य का औद्योगिक विकास करके उद्योगों को रोजगार में अंश बढ़ाने का प्रयास किया जाना चाहिए ।
  • इसके लिए राज्य में खनन-कार्य व लघु-उद्योगों तथा विभिन्न प्रकार के कुटीर उद्योगों का विकास करने की संभावनाओं पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है । 
  • राज्य में हथकरघा क्षेत्र में भी विकास की संभावनाएं हैं
  • राज्य में कई प्रकार की दस्तकारियों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है ।
  • विद्युत,  गैस व जलापूर्ति के क्षेत्र में भी  अधिक श्रमिकों को काम दिया जा सकता है ।
  • इससे औद्योगिक रोजगार में वृद्धि होगी, लोगों की आमदनी बढ़ेगी तथा उनके जीवन स्तर में सुधार आएगा ।
  • गलीचों, चमड़े की वस्तुओं, हथकरघा की वस्तुओं तथा रत्न-आभूषण आदि के निर्यात से अधिक विदेशी मुद्रा भी अर्जित की जा सकती है 

राजस्थान का औद्योगिक ढांचा

  • इसके अंतर्गत उपयोग आधारित औद्योगिक वर्गीकरण का अध्ययन किया जाता है
  • इसमें निम्न चार प्रकार के उद्योगों का रोजगार अथवा जोड़े गए शुद्ध मूल्य में योगदान के आधार पर सापेक्ष महत्त्व देखा जाता है ।
    • आधारभूत वस्तुओं के उद्योग – जैसे इस्पात, उर्वरक, विद्युत आदि
    • पूँजीगत वस्तुओं के उद्योग जैसे मशीनरी, परिवहन का माल आदि
    • मध्यवर्ती वस्तुओं के उद्योग जैसे – कॉटन यार्न, रंग, टायर-तुबे आदि ।
    • उपभोक्ता वस्तुओं के उद्योग -इसमें टिकाऊ व गैर टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं में चीनी, नमक, माचिस, दवा आदि वस्तुएँ आती हैं । 

Infrastructure industries

  • The main industries in this category are: Cement, Basic Chemicals, Iron and Steel, Fertilizers and Insecticides, Copper, Brass, Aluminum, Zinc and Other Non-Ferrous Metals, Salt and Electricity.

Cement industry

  • There are many big cement factories in the state, such as Sawaimadhopur, Lakheri, Chittorgarh, Udaipur, Nimbahera, Beawar and  private sector factory in kota.
  • Two RICCO-assisted factories are operating in Modak (Kota) and Banas (Sirohi)
  • Mini cement plants have also been set up in the state – cement production has been started in Sirohi, Banswara and Jaipur districts. 
  • In the state, the main factories are Shree Cement, Ambuja Cement, ACC Bangur Cement, Binani Cement and Lakshmi Cement.
  • In the future, there is a plan to put establish big  cement factories in the state.
  • The state’s cement industry is considered to be the ‘hub’ of the industrial sector because limestone is abundant in here.

Chemical industry

  • It mainly comes from Rajasthan State Chemical Works, Deedwana.
  • It produces sodium sulphate and sodium sulfide.
  • Shriram Chemical Industries Ltd. in Kota Also comes under this category.
  • Rajasthan  Explosives Chemicals Limited was established in Dhaulpur in collaboration with  RIICO and IDL Chemical Ltd, hyderabad . Explosives are made here .
  • The Flourspar Beneficiation Plant was installed at a place called Mandō-ki-Paal in Dungarpur  district. It is used to make steel.
  • A Zinc-sludge plant at Udaipur and a copper smelting plant is also operating in Khetri.
  • Udaipur Phosphate and Fertilizers and Modi Alkalies and Chemical Limited Alwar also come under the category of basic industries. 

Capital goods industries

  • In the category of capital industries, are  – industrial machinery, refrigerators, air conditioners, machine tools, electrical machinery, electrical computers and parts, etc. .
  • Hindustan Machine Tools Ltd. in Ajmer And Kota Instrumentation Limited.
  • Ball Bearing are made in National Engineering Industries Limited in Jaipur. Commercial vehicles are made in Ashoka Leyland Ltd.  Alwar. There are also some more engineering industries of this type.
  • Thus there are also good number of factories of capital goods in Rajasthan. 

Industry of intermediate goods –

  •  The industries in this category have the following functions:
    • Cotton ginning, cleaning and billing,
    • Printing, dyeing and bleaching of cotton textiles,
    • Cleaning, dyeing and bleaching
    • Leather dyeing and preparation
    • Tire-tubes, paint and varnish etc.
  • Water meters are made in Jaipur.
  • In Kankroli near Udaipur There is a tyre factory, in which automobiles, tyres and tubes are made.

Consumer goods industry –

  • In Rajasthan there are many industries like  – cotton textiles, synthetic textiles, sugar, jaggery, vegetable ghee and vegetable oils, soaps, crockery, parts of bicycles, leather and rubber shoes, woolen goods (Bikaner), bidi (Mayur beedi industry, tonk) etc. .
  • In Rajasthan, however to some extent  of all types of utility-based industries are found,, the state. still Rajasthan has low status in the industrial economy of the country.
  • Contribution of basic industries in Rajasthan has increased in  value of employment and added, intermediate industries have increased considerably and there is a depletion of consumer industries.  

RAS 2018 Industrial Development in Rajasthan Part 1 PDF

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आधारभूत वस्तुओं के उद्योग

  • इस श्रेणी में मुख्य उद्योग निम्न हैं – सीमेंट, बेसिक रसायन, लोहा व इस्पात, उर्वरक व कीटनाशक, तांबा, पीतल, एल्युमीनियम, जस्ता व अन्य अलौह धातु, नमक एवं विद्युत

सीमेंट उद्योग

  • राज्य में सीमेंट के कई बड़े कारखाने कार्यरत हैं जैसे – सवाईमाधोपुर, लाखेरी, चित्तौडगढ़, उदयपुर, निम्बाहेड़ा, ब्यावर व कोटा में निजी क्षेत्र के हैं ।
  • रीको से सहायता प्राप्त दो कारखाने मोड़क(कोटा) तथा बनास(सिरोही) में चल रहे हैं
  • राज्य में मिनी सीमेंट प्लांट भी लगाए गए हैं – जिनमे सिरोही, बाँसवाड़ा व जयपुर जिलों में सीमेंट का उत्पादन होने लगा है ।
  • राज्य में श्री सीमेंट, अम्बुजा सीमेंट, एसीसी बांगड़ सीमेंट, बिनानी सीमेंट तथा लक्ष्मी सीमेंट के कारखाने प्रमुख हैं
  • भविष्य में भी राज्य में सीमेंट के बड़े कारखाने लगाने की योजना है ।
  • राज्य का सीमेंट उद्योग औद्योगिक क्षेत्र का ‘हब’ माना जाता है, क्योंकि यहाँ लाइमस्टोन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है ।  

रासायनिक उद्योग

  • इसमें मुख्यतया राजस्थान स्टेट केमिकल वर्क्स, डीडवाना आता है ।
  • यह सोडियम सलफेट व सोडियम सल्फाइड का उत्पादन करता है ।
  • कोटा में श्रीराम केमिकल इंडस्ट्रीज लि. भी इसी श्रेणी में आता है ।
  • धौलपुर में संयुक्त क्षेत्र में रीको व IDL केमिकल लि. हैदराबाद के परस्पर सहयोग से दी राजस्थान एक्सप्लोसिव्स   केमिकल्स लिमिटेड की स्थापना की गयी, जहाँ विस्फोटक बनाये जाते थे
  • डूंगरपुर जिले में मांडों-की-पाल नामक स्थान पर  फ्लोर्सपार बेनेफ़िशियेशन प्लांट लगाया गया था । यह  इस्पात बनाने में प्रयुक्त होता है ।
  • उदयपुर में जस्ता   गलाने का संयंत्र तथा खेतड़ी में ताँबा गलाने का संयंत्र कार्यरत है ।
  • उदयपुर फॉस्फेट एंड फर्टीलाइजर्स तथा    मोदी अल्कलीज एंड केमिकल लिमिटेड. अलवर भी आधारभूत  उद्योगों की श्रेणी में आते हैं ।  

पूँजीगत वस्तुओं के उद्योग

  • पूँजीगत उद्योगों की श्रेणी में औद्योगिक मशीनरी , रेफ्रीजिरेटर, एयर कंडीशनर, मशीनी औजार, विद्युत मशीनरी, विद्युत कंप्यूटर व पुर्जे, आदि आते हैं
  • अजमेर में हिंदुस्तान मशीन टूल्स लि. तथा कोटा   इंस्ट्रमेंटेशन लिमिटेड है
  • जयपुर में नेशनल इंजीनियरिंग इंडस्ट्रीज लिमिटेड में बाल बियरिंग एवं अशोका लिलैंड लि. अलवर में व्यापारिक वाहन बनाये जाते हैं । इसी प्रकार के कुछ और इंजीनियरिंग उद्योग भी हैं ।
  • इस प्रकार राजस्थान में पूंजीगत वस्तुओं के भी कारखाने हैं ।

मध्यवर्ती वस्तुओं के उद्योग –

  • इस श्रेणी के उद्योगों में निम्न कार्य हैं –
    • कॉटन जिनिंग, क्लीनिंग व बिलिंग,
    • सूती वस्त्रों की छपाई, रंगाई व ब्लीचिंग,
    • उन की सफाई, रंगाई व ब्लीचिंग
    • चमड़े   रंगाई व तैयारी
    • टायर-ट्यूब , पेंट व वार्निश आदि
  • जयपुर में पानी के मीटर बनाये जाते हैं
  • उदयपुर के पास कांकरोली में जे.के. टायर का कारखाना है, जिसमे ऑटोमोबाइल, टायर व ट्यूब बनाये जाते हैं । 

उपभोक्ता वस्तुओं के उद्योग –

  • राजस्थान में सूती वस्त्र, सिंथेटिक वस्त्र, चीनी, गुड़, वनस्पति घी व वनस्पति तेल , साबुन, क्रोकरी, साइकिल के पुर्जे, चमड़े व रबड़ के जूते, ऊनी माल (बीकानेर) , बीड़ी (मयूर बीड़ी उद्योग, टोंक)  आदि उपभोक्ता वस्तुओं के उद्योग आते हैं
  • राजस्थान में कुछ सीमा तक सभी प्रकार के उपयोग-आधारित उद्योगों की इकाइयाँ पायी जाती हैं,  फिर भी राज्य का देश की औद्योगिक अर्थव्यवस्था में नीचे स्थान है ।
  • राजस्थान में आधारभूत उद्योगों का योगदान रोजगार व जोडे  गए मूल्य में बढ़ा है, मध्यवर्ती उद्योगों का काफी बढ़ा है तथा उपभोक्ता उद्योगों का घटा है । 

 

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RAS 2018 Rajasthan’s Main Dialects and their Area | RAS GK

RAS 2018 Rajasthan’s Main Dialects and their Area | Rajasthan GK

RAS 2018 Rajasthan’s Main Dialects and their Area | RAS GK

Rajasthani Language

Rajasthan’s main dialects and their area/ राजस्थान की मुख्य बोलियां एवं उनके क्षेत्र

Marwari –

  • It has been called as Marubhasha in Qurvalayala.
  • Its ancient name is Marubhasha. This is the principal dialect of Western Rajasthan.
  • The 8th century can be considered as the beginning of Marwari language.
  • Marwari is the richest and most important language of Rajasthan, both in terms of expanse and literature.
  • It extends to Jodhpur, Bikaner, Jaisalmer, Pali, Nagaur, Jalore and Sirohi districts.
  • Pure Marwari is only spoken in Jodhpur and its surrounding districts. 
  • Marwari’s literary form is called ‘dingle’.
  • It originated from Gujari degeneration.
  • Most of Jain literature and Meera’s Pads are written in this language.
  • Popular poetry composed in the Marwari language are , ‘Rajiye Ra Sorath’, ‘Veli Kisan Rukamani Rei’, ‘Dhola Maravan’, ‘Mumal’ etc.
  • Its origin is believed to be from Gurujari degeneration of Shaursaini./इसकी उत्पत्ति शौरसैनी के गुर्जरी अपभ्रंश  से मानी जाती है।
  • Marwari has the following dialects: Mewari, Bagari, Shekhawati, Bikaneri, Thali, Khairadi, Nagauri, Devdawati, Gaudwadi. 

Mewari –

  • The region of Udaipur and its surroundings is called Mewar, hence the dialect of this place is called Mewari. 
  • This is the important language of Rajasthan after Marwari.
  • The evolutionary form of the Mewari language starts from the 12th and the 13th centuries.
  • The pure form of Mewari is seen only in the villages of Mewar.
  • Mewari has a rich collection of folk literature.
  • There are also some plays written by Maharana Kumbha in this language.

 

Dundhaari – 

  • The language spoken in eastern districts of Jaipur, Kishangarh, Tonk, Lava and Ajmer-Meerwara, excluding northern jaipur, is known as  Dundhaari.
  • The effects of Gujarati, Marwari and Brajbhashasha are found equally on this . Abundant literature is produced in it in both prose and verse.
  • Saint Dadu and his disciples made compositions in this language.
  • This dialect is also called Jaipuri or Jhadshahi.
  • The major dialects of the language are – Torawati, Rajawati, Chaurasi (Shahpura), Nagarchol, Kishangari, Ajmeri, Kothari, Haroti etc.

Mewati –

  • The area of ​​Alwar and Bharatpur districts is known as Mewat because of the majority of Mew castes. So the language is called Mewati.
  • It is extended to the north-western part of Kishangarh, Tijara, Ramgarh, Govindgarh, Laxmangarh Tehsils of Alwar, Deeng and Nagar tehsils, and Gurgaon district of Haryana and Mathura district of Uttar Pradesh.
  • From the point of origin and  development, Mewati works as the bridge between Western Hindi and Rajasthani.
  • The effect of Brajbhasha on Mewati dialect is very high./मेवाती बोली पर ब्रजभाषा का प्रभाव बहुत अधिक है।
  • The literature of the Lal Dasi and Charandasi sampradaays has been written  in the Mewati language.
  • The wriings of the disciples of Charandas – Dayabai and Sahawabai are in this language.
  • On the basis of location , many forms of Mewati dialect are seen, like – Khadi Mewati, Rathi Mewati, Kather Mewati, Bhayana Mewati, Beghoti, Meo and Brahmin Mewati .

Malawi – 

  • This is the language spoken in the Malvi regions.
  • In this dialect, some features of both Marwari and Dundhari are found.
  • The effect of Marathi is also reflected .
  • Malviya is a good to listen and soft language.

Nimadi – 

  • It is considered to be Malvi’s sub-dialect. It is also called the southern Rajasthani. This has effects of Gujarati, Bhili and Khandeshi.

Torawati –

  • Southern part of Jhunjhunun district, east and south-eastern part of Sikar district and some northern part of Jaipur district is called Torawati.
  • So the dialect here is called Torawati.
  • Katheri dialect is prevalent in the southern part of Jaipur district, while Chaurasi is prevalent in the southwestern part of Jaipur district and western part of Tonk district.
  • Nagarchol is spoken in the western part of Sawai Madhopur district and in the southern and eastern parts of Tonk district.
  • Rajavati dialect is prevalent in the eastern part of Jaipur district. 

Vagadi –

  • The ancient name of the combined states of Dungarpur and Banswara wes Vagad.
  • So here the language is called Vagadi. There is more influence of Gujarati on this.
  • This language is spoken in the areas of the southern part of Mewar, southern Aravalli region and hills of Malwa.
  • It is also popular in Bhils.
  • Bhili dialect is its sub-dialect.

तोरावाटी –

झुंझुनूँ जिले का दक्षिणी भाग, सीकर जिले का पूर्वी एवं दक्षिणी-पूर्वी भाग तथा जयपुर जिले के कुछ उत्तरी भाग को तोरावाटी कहा जाता है।

अतः यहाँ की बोली तोरावाटी कहलायी।

कठेड़ी बोली जयपुर जिले  के दक्षिण भाग में प्रचलित है जबकि चौरासी जयपुर जिले  के दक्षिणी-पश्चिमी एवं टोंक जिले के पश्चिमी भाग में प्रचलित है।

नागरचोल  सवाईमाधोपुर जिले के पश्चिमी भाग एवं टोंक  जिले के दक्षिणी एवं पूर्वी भाग में बोली जाती है।

जयपुर जिले के पूर्वी भाग में राजावाटी बोली प्रचलित है।

वागड़ी –

डूँगरपुर एवं बांसवाड़ा के सम्मिलित राज्यों का प्राचीन नाम वागड़ था।

अतः यहाँ की भाषा वागड़ी कहलायी। इस पर गुजराती का प्रभाव अधिक है।

यह भाषा  मेवाड़ के दक्षिणी भाग, दक्षिणी अरावली प्रदेश तथा मालवा की पहाड़ियों तक के क्षेत्र में बोली जाती है।

यह भीलों में भी प्रचलित है।

भीली बोली इसकी सहायक बोली है।

खैराडी –

शाहपुरा (भीलवाड़ा) बूँदी आदि के कुछ इलाकों में बोली जाने वाली बोली , जो मेवाड़ी , ढूँढाड़ी, एवं हाडौती का मिश्रण है। 

 

 

RAS 2018 Rajasthan’s Main Dialects and their Area PDF –

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Khairadi –

  • The dialect spoken in some areas of Shahpura (Bhilwara), Bundi etc., which is a mixture of Mewari, Dundhari and Haroti.

Haroti –

  • Due to being governed by Hada Rajputs, the area of ​​Kota, Bundi, Baran and Jhalawar was called Haroti and here the dialect is called Haroti.
  • This is a dialect of  Dundhari.
  • The first use of haroti as language  was made in Kellogg’s Hindi Grammar in 1875 AD.
  • After this, Abraham Grierson recognized Haroti as dialect in his book too.
  • Most of the compositions of the suryamal mishran are in the Haroti language.
  • At present, Haroti is the main dialect of Kota, Bundi, Baran and northern part of Jhalawar.
  • The languages spoken are Nagarchol in the north of Haroti, Syaipuri in the north-east, Malvi in the south and east.

Ahirwati (Rathi) –

  • Being the language of the ‘Abheer’ caste, it is also called Ahirwati or Hirwal.
  • The language of this area is called ‘Rath’.
  • It is mainly spoken in Baharod and Mundawar Tehsil of Alwar, Kotputli tehsil of Jaipur, Gurgaon, Mahendragarh, Narnaul, Rohtak districts  in Haryana, and in the southern part of Delhi.
  • This is the dialect lying between Banguru (Haryanvi) and Mewati.
  • Hamdir Raso epic of Jodhpur, Bhima Vilas Kavya of Shankar Rao, Alibkshi Khyal Loknatya etc. have been composed in this dialect.

मारवाड़ी –

  • कुवलयमाला में इसे ही मरुभाषा कहा गया है।
  • इसका प्राचीन नाम मरुभाषा  ही है। यह पश्चिमी राजस्थान की प्रधान बोली है।
  • मारवाड़ी का आरम्भ काल 8 वीं सदी से माना जा सकता है।
  • विस्तार एवं साहित्य दोनों ही दृष्टियों से मारवाड़ी राजस्थान की सर्वाधिक समृद्ध एवं महत्त्वपूर्ण भाषा है।
  • इसका विस्तार जोधपुर, बीकानेर,  जैसलमेर, पाली, नागौर, जालौर एवं सिरोही जिलों तक है।
  • विशुद्ध मारवाड़ी केवल जोधपुर व इसके आसपास के जिलों में ही बोली जाती है।
  • मारवाड़ी के साहित्यिक रूप को ‘डिंगल’ कहा जाता है।
  • इसकी उत्पत्ति गुर्जरी अपभ्रंश से हुई।
  • जैन साहित्य एवं मीरा के अधिकाँश पद इसी भाषा में लिखे गए हैं।
  • ‘राजिये रा सोरठ’, ‘वेळी किसन रुकमणि री’, ‘ढोला मरावण’, ‘मूमल’ आदि लोकप्रिय काव्य मारवाड़ी भाषा में ही रचित  हैं।
  • मारवाड़ी की निम्न बोलियां हैं – मेवाड़ी,  बागड़ी, शेखावाटी, बीकानेरी, थली, खैराडी, नागौरी,देवडावाटी,  गौड़वाडी।

मेवाड़ी –

  • उदयपुर एवं उसके आसपास के क्षेत्र को मेवाड़ कहा जाता है, इसलिए यहाँ की बोली मेवाड़ी कहलाती है।
  • यह मारवाड़ी के बाद राजस्थान की महत्त्वपूर्ण बोली है।
  • मेवाड़ी भाषा का विकसीत रूप 12 वीं और 13 वीं शताब्दी से मिलने लगता है।
  • मेवाड़ी का शुद्ध रूप मेवाड़ के गावों में ही देखने को मिलता है।
  • मेवाड़ी   में लोक साहित्य का विपुल भण्डार है।
  • महाराणा कुम्भा द्वारा रचित  कुछ नाटक इसी भाषा में हैं। 

ढूँढाड़ी –

  • उत्तरी जयपुर को छोड़कर शेष जयपुर, किशनगढ़, टोंक, लावा तथा अजमेर-मेरवाड़ा के पूर्वी अंचलों में बोली जाने वाली भाषा को ढूँढाड़ी   कहा जाता है।
  • इस पर गुजराती, मारवाड़ी एवं ब्रजभाषा का प्रभाव सामान रूप से मिलता है। ढूँढाडी में गद्य और पद्य दोनों में प्रचुर साहित्य रचा गया।
  • संत दादू एवं उनके शिष्यों ने इसी भाषा में रचनाएँ की।
  • इसी बोली को जयपुरी या झाड़शाही भी  कहते हैं।
  • ढूँढाड़ी की प्रमुख बोलियाँ –  तोरावाटी, राजावाटी, चौरासी(शाहपुरा), नागरचोल, किशनगढ़ी, अजमेरी, कोठड़ी, हाड़ौती  आदि हैं। 

मेवाती –

  • अलवर एवं भरतपुर जिलों का क्षेत्र मेव जाती की बहुलता के कारण मेवात के नाम से जाना जाता  है। अतः यहाँ की भाषा को मेवाती कहते हैं।
  • यह अलवर की किशनगढ़, तिजारा, रामगढ़, गोविंदगढ़, लक्ष्मणगढ़ तहसीलों तथा भरतपुर की कामां, डींग व नगर तहसीलों के पश्चिम्मोत्तर भाग तक तथा हरयाणा के गुड़गाँव जिला व उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले तक  विस्तृत है।
  • उद्भव एवं विकास की दृष्टि से मेवाती पश्चिमी हिंदी एवं  राजस्थानी के मध्य सेतु का कार्य करती है।
  • लाल दासी एवं चारणदासी संत सम्प्रदायों का साहित्य मेवाती भाषा में ही रचा गया है।
  • चरणदास  की शिष्याएँ दयाबाई एवं सहजोबाई की रचनाएँ इसी बोली में हैं।
  • स्थान भेद के आधार पर मेवाती बोली के कई रूप देखने को मिलते हैं, जैसे – खड़ी मेवाती, राठी मेवाती, कठेर मेवाती, भयाना मेवाती, बीघोती, मेव व ब्राह्मण मेवाती  आदि।  

मालवी –

  • यह मालवी  क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषा है|
  • इस बोली  में मारवाड़ी  एवं ढूँढाड़ी दोनों की कुछ विशेषताएं पायी  जाती हैं।
  • कहीं-कहीं मराठी का भी प्रभाव झलकता है।
  • मालवी एक कर्णप्रिय एवं कोमल  भाषा है।

नीमाड़ी –

  • इसे मालवी की उपबोली  माना जाता है। इसको दक्षिणी राजस्थानी भी कहा जाता है। इस पर गुजराती, भीली  एवं खानदेशी का प्रभाव है। 

हाड़ौती – 

  • हाडा राजपूतों द्वारा शासित होने के कारण कोटा, बूँदी, बारां एवं झालावाड़ का क्षेत्र हाड़ौती कहलाया और यहाँ की बोली हाड़ौती।
  • यह ढूँढाड़ी की एक उपबोली है।
  • हाड़ौती का भाषा के अर्थ में प्रयोग सर्वप्रथम केलॉग की हिंदी ग्रामर में सन 1875 ई.  में किया गया था।
  • इसके बाद अब्राहम ग्रियर्सन ने अपने ग्रन्थ में भी हाड़ौती को बोली के रूप  में मान्यता दी।
  • सूर्यमल्ल मिश्रण की अधिकाँश रचनाएँ हाड़ौती भाषा में हैं।
  • वर्तमान में हाड़ौती कोटा, बूँदी, बाराँ तथा झालावाड़ के उत्तरी भाग की प्रमुख बोली है।
  • हाड़ौती  के उत्तर में नागरचोल, उत्तर-पूर्व  में स्यैपुरी, पूर्व तथा दक्षिण में मालवी बोली जाती है|

अहीरवाटी (राठी) –

  • ‘आभीर’  जाती के क्षेत्र की बोली होने के कारण इसे अहीरवाटी  या हीरवाल भी कहा जाता है।
  • इस बोली के क्षेत्र को ‘राठ’ कहा जाता है।
  • यह मुख्यतः अलवर की बहरोड़  व मुंडावर तहसील, जयपुर की कोटपूतली तहसील के उत्तरी भाग, हरियाणा के गुडगाँव, महेन्द्रगढ़, नारनौल, रोहतक जिलों एवं दिल्ली  के दक्षिणी भाग में बोली जाती है।
  • यह बाँगरु(हरियाणवी)   एवं मेवाती के बीच की बोली है।
  • जोधपुर का हम्मीर रासौ महाकाव्य, शंकर राव का भीम विलास काव्य, अलीबख्शी ख्याल लोकनाट्य  आदि की रचना इसी बोली में की गयी है|

Rangari –

  • The Rangari dialect, a mixture of Malvi and Marwari is  in use among the Rajputs of Malwa.

Shekhawati –

  • Marwari’s sub-dialect. This  language is spoken language in Shekhawati area (Sikar, Jhunjhunu, and some areas of Churu district) of Shekhawati. It is affected by Marwari and Dondhari.

Goudwadi –

  • This is Marwari’s dialect spoken in Bali (Pali) to the eastern part of Ahoh Tehsil in Jalore district.
  • Bisaldev Raso is the main composition of this dialect.
  • Balvi, Sirohi, Mahahadi etc. are its sub-dialects.

Devadavati –

  • It is also sub-dialect of Marwari, which is spoken in Sirohi area. Its second name is Sirohi.

Important Facts 

  • Famous Italian scholar and linguist Dr. L. P. Tessitori told that the emergence of West Rajasthani from shaurseni degeneration.
  • Mr. Tasisori spent most of his time in Bikaner and he died there.
  • Sir George Greeyarson has projected the emergence of Rajasthani from nagar degeneration.
  • Dr. Purushottam Menaria is also a supporter of this opinion.
  • Dr. Sunita Kumar Chatterjee tells that the  origin of Rajasthani is from Saurashtri degeneration.
  • Sri Kanhaiyalal Manikyalal Munshi and Dr. Motilal Menariya believe that the origin of Rajasthani is from gurjari degeneration of Saurasaini.
  • This opinion is more true. 

Rajasthani script – Mudia and Devanagari/

  • Marks, lines, pictures etc. which express the expressions and thoughts is called script.
  • Thus, the way to mark/write the language is called script.
  • In other words, the nature of written expression of language is called script.
  • Each language has its own unique script, through which the literary form of the language is manifested.
  • Through our script, our expressed speech can be protected in writing for a long time.
  • The initial scripture of human civilization was a pictorial script.
  • Other scripts of India have been developed from our country’s initial script ‘Brahmi script’. 
  • The present Devanagari script has evolved from the Brahmi script.
  • Most of the  letters of the Rajasthani script  (vowels and consonants) are similar to Devanagari script.
  • The form of some characters has a minute difference.
  • Slowly, this difference is also going away with the influence of Hindi.
  • Rajasthani script is written in ghaseet form.
  • The pure form of this script was mainly used in the courts (offices) and offices (offices), which is called ‘Kamdari script’. 
  • The letter ‘L’ is used exclusively in Rajasthani script.
  • There are different sounds of ‘L’ and ‘L’.
  • The use of both has different meanings.
  • In Rajasthani language, there are sounds of Talavya ‘sh’ and ‘Murdhanya’ ‘sh’ but in Rajasthani script there is the use of Dantya ‘s’ for them.
  • Similarly, there is no independent sign of ‘jya’ in Rajasthani script. Instead, they write ‘ghay’ instead.

Mudiya script –

  •  The Rajasthani script is used by traders and mahajan people not  written purely in their books, using its rough script.
  • The letters of the Mudiya script are called the Mudiya alphabet.
  • These  words(without matra) are written in a round form.
  • For this reason, they are called as Mudia Akshar.
  • In this script, the sentence can be written completely without raising the pen.
  • There is no use of nukta under the letters, in this script.
  • This script has been used in the areas of Rajasthan, Gujarat, Maharashtra etc. from 16th century to 1950 AD. 
  • It use has gradually reduced .
  • The credit of the invention of the Mudiya Alphabet is given to Raja Todramal, the head of Revenue Department of Mughal Emperor Akbar.

रांगड़ी –

  • मालवा के राजपूतों में मालवी एवं मारवाड़ी के मिश्रण से बनी रांगड़ी बोली भी प्रचालीत  है।

शेखावाटी –

  • मारवाड़ी की उपबोली शेखावाटी राज्य के शेखावाटी क्षेत्र (सीकर, झुंझुनू, तथा चूरू जिले के कुछ क्षेत्र) में बोली जाने वाली भाषा है जिस पर मारवाड़ी एवं ढूँढाड़ी का प्रभाव है।

गौड़वाड़ी –

  • जालौर जिले की आहोर तहसिल के पूर्वी भाग से प्रारम्भ होकर बाली (पाली) में बोली जाने वाली यह मारवाड़ी की उपबोली है।
  • बीसलदेव रासौ इस  बोली की मुख्य रचना है।
  • बालवी, सिरोही, महाहडी  आदि इसकी उपबोलियाँ हैं। 

देवडावटी –

  • यह भी मारवाड़ी की  उपबोली है जो सिरोही क्षेत्र में बोली जाती है।  इसका दूसरा नाम सिरोही है।

महत्त्वपूर्ण तथ्य –

  • प्रसिद्ध इटालियन विद्वान् एवं भाषाशास्त्री डॉ. एल पी तेस्सितोरी  ने पश्चिम राजस्थानी की उत्पत्ति शौरीसेना अपभ्रंश से बताई।
  • श्री तेस्सितोरी ने अपना अधिकाँश समय बीकानेर में ही गुजारा एवं वहीं उनका देहांत हुआ।
  • सर जॉर्ज ग्रीयर्सन ने राजस्थानी का उद्भव शौरसैनी ने नागर अपभ्रंश से होना प्रतिपादित किया है।
  • डॉ. पुरुषोत्तम मेनारिया भी इसी मत के समर्थक हैं।
  • डॉ.  सुनीता कुमार चटर्जी इसकी उत्पत्ति शौरसेनी के सौराष्ट्री अपभ्रंश से बताते हैं।
  • श्री कन्हैयालाल माणिक्यलाल मुंशी एवं डॉ. मोतीलाल मेंनारिया राजस्थानी की उत्पत्ति शौरसैनी के गुर्जरी अपभ्रंश से मानते हैं।
  • यही मत अधिक सही है।

राजस्थानी लिपि – मुड़िया व देवनागरी –

  • भावों और विचारों को व्यक्त करने वाले चिह्नों, रेखाओं, चित्रों आदि को लिपि कहा जाता है।
  • इस प्रकार भाषा को अंकित करने की रीति लिपि कहलाती है।
  • दूसरे शब्दों में भाषा  की लिखित अभिव्यक्ति के स्वरुप को लिपि(script) कहते हैं।
  • प्रत्येक भाषा की अपनी एक विशिष्ट लिपि होती है, जिसके माध्यम से ही भाषा का साहित्यिक रूप प्रकट होता है।
  • लिपि के माध्यम से हमारी व्यक्त वाणी चिरकाल तक लिखित रूप में सुरक्षित रह सकती है।
  • मानव सभ्यता की प्रारम्भिक लिपि भाव चित्रात्मक लिपि थी।
  • हमारे देश की  प्रारम्भिक लिपि ‘ब्राह्मी लिपि’ से ही भारत की अन्य लिपियाँ विकसित हुई हैं।
  • वर्तमान देवनागरी लिपि   ब्राह्मी लिपि से विकसित हुई है।
  • राजस्थानी भाषा की लिपि ‘राजस्थानी लिपि’ के अधिकाँश अक्षर (स्वर व व्यंजन) देवनागरी लिपि से मिलते-जुलते  हैं।
  • मात्र कुछ अक्षरों की बनावट से थोड़ा अंतर आता है।
  • धीरे-धीरे हिंदी के प्रभाव से यह अंतर भी अब शैने-शैने मिटता जा रहा है।
  • राजस्थानी लिपि लकीर खींचकर घसीट रूप में लिखी जाती है।
  • इस लिपि   विशुद्ध रूप मुख्य रूप से अदालतों(न्यायालयों) व  दफ्तरों (कार्यालयों) में प्रयुक्त किया जाता था, जिसे ‘कामदारी लिपि’ कहा जाता है।
  • राजस्थानी लिपि में  ‘ळ’ अक्षर का विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है।
  • ‘ल’ एवं ‘ळ’ की अलग-अलग ध्वनियाँ हैं।
  • दोनों के प्रयोग का अलग-अलग अर्थ होता है।
  • राजस्थानी भाषा में तालव्य ‘श’ एवं मूर्धन्य ‘ष’ की ध्वनियाँ  तो हैं परन्तु राजस्थानी लिपि में इनके लिए दंत्य ‘स’ का ही प्रयोग होता है।
  • इसी प्रकार राजस्थानी लिपि में ‘ज्ञ’ का स्वतंत्र संकेत नहीं है। बल्कि इसके स्थान पर ‘ग्य’ ही लिखते हैं।

मुड़िया लिपि –

  • राजस्थानी लिपि को व्यापारी एवं महाजन लोग अपने बहीखातों में विशुद्ध रूप से न लिखकर इसकी अशुद्ध लिपि प्रयुक्त करते हैं।
  • मुड़िया लिपि के अक्षरों को मुड़िया अक्षर कहते हैं।
  • ये बिना मात्रा वाले शब्द मोड़कर लिखे जाते हैं।
  • इसी कारण इनका नाम मुड़िया अक्षर पड गया।
  • इस लिपि में बिना कलम उठाये वाक्य पूर्ण किया जा सकता है।
  • मुड़िया लिपि में अक्षरों के नीचे नुक्ता लगाने का प्रचलन नहीं है।
  • इस लिपि का प्रयोग 16 वीं शताब्दी से 1950 ई.  तक राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र आदि क्षेत्रों में किया जाता रहा है।
  • वर्तमान में इसका प्रयोग धीरे-धीरे कम हो गया है।
  • मुड़िया अक्षरों के आविष्कार का श्रेय मुग़ल सम्राट अकबर के राजस्व विभाग  के मुखिया राजा टोडरमल को दिया जाता है।

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RAS 2018 Exam Rajasthani Language Origin and Classification | GK Study Material PDF| Exam Preparation

RAS 2018 Exam Rajasthani Language Origin and Classification | GK Study Material PDF | Exam Preparation

RAS 2018 Exam Rajasthani Language Origin and Classification | GK Study Material PDF| Exam Preparation

Rajasthani Language/राजस्थानी भाषा –

Rajasthani language origin and development/राजस्थानी भाषा उद्गम एवं विकास –

  • The native language of the residents of India’s largest state of Rajasthan is Rajasthani./भारत के सबसे बड़े राज्य राजस्थान के निवासियों की मातृभाषा राजस्थानी है।
  • There is a glorious history of the emergence and development of the Rajasthani language./राजस्थानी भाषा के उद्भव एवं विकास का गौरवमयी इतिहास है।
  • The origins of Rajasthani language is believed to be from Gujjar degeneration of Shaurseni./राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति शौरसेनी  के गुर्जर अपभ्रंश से मानी जाती है।
  • Some scholars believe it is also born from the nagar degeneration./कुछ विद्वान् इसे नागर अपभ्रंश  से उत्पन्न हुआ भी मानते हैं।
  • On observing the history of Rajasthani language, it is known that  , ‘Marubhasha’ is also included in the 18 languages ​​ mentioned in the Kuvayamimala (778 AD) written by Uthotan Suri. It was the language of Western Rajasthan. /राजस्थानी भाषा के इतिहास का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है की वि. सं. 835 (सन 778 ई. ) में उधोतन सूरी द्वारा लिखित कुवलयमाला में वर्णित 18 देशी भाषाओँ में ‘मरुभाषा’ को भी शामिल किया गया है जो पश्चिमी  राजस्थान की भाषा थी।
  • In the same way, the word ‘Marwari’ has also been used in the book ‘Pingal Sharomani’ and ‘aini Akbari’ of Abul Fazl. Abul Fazl has also included the Marwari language in major aryalanguages./इसी प्रकार कवि कुशललाभ के ग्रन्थ ‘पिंगल शारोमणि’  तथा अबुल फजल के ‘आईने अकबरी’ में भी ‘मारवाड़ी’ भाषा शब्द प्रयुक्त किया गया है। अबुल फजल ने प्रमुख आर्यभाषाओं में मारवाड़ी भाषा को भी शामिल किया है।
  • Here the word ‘Rajasthani’ for the language was first used by George Abraham Greerson in 1912 AD in the Linguistic Survey Of India book. It was the collective name of various languages ​​prevailing in this region./यहाँ की  भाषा के लिए ‘राजस्थानी’ शब्द सर्वप्रथम जॉर्ज अब्राहम ग्रिय्रसन ने 1912 ई.  में Linguistic Survey Of India ‘ ग्रन्थ में प्रयुक्त किया जो इस प्रदेश में प्रचलित विभिन्न भाषाओं का सामूहिक नाम था।
  • This name has been valid for the language of this region./यही नाम इस प्रदेश की भाषा के लिए मान्य हो चूका है।
  • Marwari, Mewari, Dhundhadi, Mewati, Haroti etc are all its different dialects./मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढुँढाडी, मेवाती, हाड़ौती आदि सब इसकी विभिन्न बोलियां हैं।
  • Kendriya Sahitya Akademi has recognized the Rajasthani language as an independent language, but it is yet to get constitutional recognition./केंद्रीय साहित्य अकादमी ने राजस्थानी भाषा को एक स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता दे दी है, परन्तु इसे अभी संवैधानिक मान्यता प्राप्त होना बाकी है।
  • The Central Government has also constituted a committee to give advice on the inclusion of Rajasthani in the eighth list of the constitution./राजस्थानी को संविधान की आठवीं सूची में शामिल करने के सम्बन्ध में सलाह देने हेतु केंद्र सरकार ने एक समिति का गठन भी किया है।
  • The development of the Rajasthani language is due to the degeneration./राजस्थानी भाषा का विकास अपभ्रंश से हुआ है।
  • So, till the 10th century, there was a great effect of degeneration on this./अतः 10 वीं शती तक तो इस पर अपभ्रंश का ही अत्यधिक प्रभाव रहा।
  • By the 13th century, the ancient western Rajasthan had finally broken the relation with the degenerated language , but the mixed form of Rajasthani and Gujarati continued till the end of the 16th century, along with it, their own characteristics also clearly emerged./13 सदी तक आते-आते प्राचीन  पश्चिमी राजस्थान ने अपभ्रंश से अंतिम रूप से सम्बन्ध विच्छेद  कर लिया था, परन्तु राजस्थानी एवं गुजराती का मिला जुला रूप 16वीं सदी के अंत तक चलता रहा, साथ ही दोनों की अपनी-अपनी   विशेषताएँ भी स्पष्ट रूप से उभरने लगी
  • After 16th century,  Rajasthani started developing as an independent language./16 वीं सदी के बाद राजस्थानी का विकास एक स्वतंत्र भाषा के रूप में होने लगा।
  • By the end of the 17th century, Rajasthan had completely taken the form of an independent language./17 वीं सदी के अंत तक आते-आते राजस्थानी पूर्णतः एक स्वतंत्र भाषा का रूप ले चुकी थी।
  • The development of  Rajasthani can be explained in the following steps./राजस्थानी के विकास को निम्न चरणों में स्पष्ट किया जा सकता है।
  • Gujjar-degeneration – 11th to 13th century/गुर्जर-अपभ्रंश – 11वीं से 13वीं सदी
  • Ancient Rajasthani-13th to 16th Century/प्राचीन राजस्थानी -13वीं से 16 वीं सदी
  • Madhya Rajasthani – 16th to 18th century/मध्य राजस्थानी – 16 वीं से 18 वीं सदी
  • Arvachin (modern) Rajasthani-from the 18th century till now./अर्वाचीन (आधुनिक) राजस्थानी -18 वीं सदी से अब तक। 

 

Expansion of Rajasthani /राजस्थानी का विस्तार

  • At present, the number of people who speak Rajasthani language is more than 8 crores./वर्तमान में राजस्थानी भाषा बोलने वालों की संख्या 8 करोड़ से भी अधिक है।
  • This language is spoken in Rajasthan, western part of Central India, Sindh, Punjab and adjacent areas of Haryana./यह भाषा राजस्थान, मध्यभारत के पश्चिमी भाग, सिंध, पंजाब एवं हरयाणा के निकटवर्ती क्षेत्रों में बोली जाती है।

Rajasthani language classification /राजस्थानी भाषा का वर्गीकरण

  • Dr. George Abraham Greerason was the first person to present a scientific analysis of Rajasthani as an independent language in the second part of the  ‘Linguistic Survey of India’ (in volume-11 and part 20)./डॉ. जॉर्ज अब्राहम ग्रीयरसन प्रथम व्यक्ति थे,  जिन्होंने अपनी पुस्तक Linguistic Survey of India (11 Volumes में एवं 20 भाग में)  के दुसरे भाग में राजस्थानी का स्वतंत्र भाषा के रूप में वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया।

He has described five sub-schools of Rajasthani language as follows/उन्होंने राजस्थानी भाषा की पाँच उपशाखाएँ निम्न प्रकार बताई है

Western Rajasthani/पश्चिमी राजस्थानी 

  •  Its representative languages are  – Marwari, Mewari, Bagri and Shekhawati./इसकी प्रतिनिधि बोलियाँ – मारवाड़ी, मेवाड़ी, बागड़ी एवं शेखावाटी हैं।

Middle Eastern Rajasthani/मध्य-पूर्वी राजस्थानी

  • Its main dialects are Dundhaari and Haroti./इसकी मुख्य बोलियां – ढूंढाड़ी  व हाड़ोती हैं।

RAS 2018 Exam Rajasthani Language Origin and Classification PDF

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North-eastern rajasthani/उत्तर-पूर्वी राजस्थानी –

  • Mewati and Ahirwati have been included in this./इसमें मेवाती एवं अहीरवाटी को शामिल किया गया है।

South-Eastern-Rajasthani/दक्षिण-पूर्वी-राजस्थानी

  • Malvi and Niwadi have been included in this./इसमें मालवी तथा निवाड़ी  को शामिल किया गया है।
  • Dr. LP Tessitouri has divided the dialects of Rajasthani into the following two parts /डॉ. एलपी तेस्सीटौरी ने राजस्थानी की बोलियों   निम्न दो भागों में बांटा है

Western Rajasthani /पश्चिमी राजस्थानी 

  • Shekhawati, Jodhpur’s Khadi Rajasthani, Dhatki, Thali, Bikaner, Kishangarh, Khairadi, Sirohi dialects – Godavadi and Devadavati./शेखावाटी, जोधपुर की खड़ी राजस्थानी, ढटकी, थली, बीकानेर, किशनगढी, खैराडी, सिरोही की बोलियाँ- गोडवाडी एवं देवड़ावटी।

Eastern Rajasthani (Dhoondhari) /पूर्वी राजस्थानी (ढूँढाड़ी)

  • Toorawati, Khadi Jayapuri, Kathodi, Ajmeri, Rajawati, Chaurasi, Nagarchaul, Haroati etc./तोरावाटी, खड़ी जयपुरी, काठैड़ी, अजमेरी, राजावाटी, चौरासी, नागरचौल, हाड़ौती आदि।
  • In view of the language classification by various scholars, we can translate the Rajasthani language into/विभिन्न विद्वानों के भाषा वर्गीकरण के मद्देनजर हम राजस्थानी भाषा को

(A) Eastern Rajasthani, and/पूर्वी राजस्थानी, एवं

(B) Western Rajasthani as  two main classes./पश्चिमी राजस्थानी   नामक दो मुख्या वर्गों में बाँट सकते हैं।

  • Representative languages of Eastern Rajasthan – Dundhari (Jaipuri), Haroti, Mewati and Ahirwati and representative lagnguages of Western Rajasthan – are Marwari, Mewari, Bagri and Shekhawati./पूर्वी राजस्थानी की प्रतिनिधि बोलियां – ढूंढाड़ी (जयपुरी), हाड़ौती, मेवाती  एवं अहीरवाटी हैं तथा पश्चिमी राजस्थान की प्रतिनिधि बोलियां – मारवाड़ी, मेवाड़ी, बागड़ी एवं शेखावाटी हैं।
  • There is a difference in the dialects at every 9-10 km distance intervals in Rajasthan./राजस्थान में हर 9-10 किमी के अंतराल पर बोली में अंतर आ जाता है। 

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RAS 2018 GK – Ancient Civilizations of Rajasthan PDF | Art and Culture Study Notes

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Rajasthan Art and Culture –

Ahad (Udaipur)/आहड़ (उदयपुर)

  • In Mewad there is abundant ancient civilization available around berach and banas rivers./मेवाड़ में बेडच व बनास नदियों के काँठे से हमें आहड  सभ्यता की प्रचूर झाँकी उपलब्ध होती है।
  • The old name of aahad was Tamarvati Nagari./आहड़ का प्राचीन नाम ताम्रवती नगरी थी।
  • In the 10th – 11th century, it was known as Aghattpur (Aghat durg)./10 वीं – 11 वीं शती  में यह आघाटपुर (आघाट दुर्ग) के नाम से जाना जाता था।
  • Pt. Akshayakirti Vyas is credited for first excavation here at small scale in 1953./पं. अक्षयकीर्ति व्यास को  सर्वप्रथम 1953 ई. में यहाँ लघु स्तर पर उत्खनन करवाने का श्रेय है।
  • The extensive excavation of ‘Dhoolkot’ (local name), a high mound of this village, on the banks of ayad river (Berach, tributary of  river Banas) near Udaipur was first done by R.C. Agarwal in 1954 and later in 1961-62, by V.N. Mishra and H.D Sankalia /उदयपुर के निकट आयड़  नदी (बनास की सहायक बेडच नदी) के किनारे इस गाँव के एक ऊँचे टीले ‘धूलकोट’ (स्थानीय नाम) का व्यापक उत्खनन सर्वप्रथम आर.सी. अग्रवाल ने  1954 में कराया तथा बाद में 1961-62 में वी. एन. मिश्रा एवं एच.डी. सांकलिया द्वारा उत्खनन करवाया गया।
  • Here are the remnants of the cosmopolitan civilization dating back to 1900-1800 B.C.  to 1200 BC./यहाँ 1900-1800  ई. पूर्व से 1200  ई. पूर्व की ताम्रयुगीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं।
  • It is called by  Dr. Sanklia as Aahad or Banas civilizaion./इसे डॉ सांकलिया ने आहड या बनास संस्कृति कहा है।
  • This was a rural civilization./यह एक ग्रामीण संस्कृति थी।
  • The three stages of this  civilization have been obtained  in various levels of excavation of this site./इस स्थल की खुदाई से प्राप्त विभिन्न स्तरों  में आहड सभ्यता के तीन चरणों का ज्ञान हुआ है।
  • In the first phase, the use of rhinestone stones was abundant, and from these different tools and equipemnts were made./प्रथम चरण में स्फटिक पत्थरों के प्रयोग की बहुतायत रही थी तथा इन्ही से विभिन्न औजार व उपकरण बनाये जाते थे।
  • In the second phase, instruments of copper-bronze and iron era have been obtained./द्वितीय चरण में ताम्र-कांस्य व लौह युग के उपकरण प्राप्त हुए हैं।
  • In the third phase, there is abundance of soil related material(pottery)./तृतीये चरण में  मृदभांड सम्बन्धित सामग्री की प्रचुरता है।
  • The houses here are made of clay and stone. /यहाँ के मकान मिटटी व पत्थरों के बने होते हैं।
  • These houses were covered with bamboos./इन मकानों को बाँस से ढका  जाता था।
  • The floor was made by adding  clay and yellow soil./फर्श चिकनी मिट्टी व पीली मिट्टी  मिलाकर बनायी जाती थी।
  • The houses were mostly rectangular./मकान अधिकांशतःआयताकार होते थे।
  • More than one stove has been found in houses which may indicate a large family or group food system./मकानों में एक से अधिक चूल्हे मिले हैं जो शायद बड़े परिवार या सामूहिक भोजन व्यवस्था को इंगित करते हैं।
  • 6 stoves have been found together in one house and one of them also has a human palm impression./एक घर में एक साथ 6 चूल्हे भी प्राप्त हुए हैं तथा इनमे से एक पर मानव हथेली की छाप भी प्राप्त हुई है ।
  • There is also a large dump of holding/storing grains./यहाँ कुछ अनाज  रखने के बड़े भाण्ड भी गड़े   मिले हैं।
  • Which was called ‘Goure’ and ‘kothe’ in the local language./जिन्हे स्थानीय भाषा में ‘गौरे’ व ‘कोठे’ कहा जाता था।

Ojhiyaan/ओझियाना –

  • This copper age archaeological site is located near the district of Badlapur in Bhilwara district./यह ताम्रयुगीन पुरातात्विक स्थल भीलवाड़ा जिले में बदनोर जिले के पास स्थित है।
  • Here B.R Meena and Alok Tripathi excavated in 2000 AD./यहाँ बी.आर. मीणा व आलोक त्रिपाठी ने सन 2000 ई.  में उत्खनन करवाया।
  • The small miniature form of cow obtained from here is very important./यहाँ से प्राप्त गाय की लघु मीणाकृति   बहुत महत्त्वपूर्ण है।
  • This place is another place for aahad civilization./यह स्थल आहड़  सभ्यता-संस्कृति का ही एक अन्य स्थल है।
  • One particularity of this is that it is located on the hill. While other places of Ahad civilization flourished in the river valleys./इसकी एक विशिष्टता यह है की यह पहाड़ी पर स्थित है। जबकि आहड सभ्यता के अन्य स्थल नदी घाटियों में पनपे हैं।
  • Based on the remains of structures, there are evidence of three stages of civilizations on this site. /ढांचों के अवशेषों के आधार पर इस स्थल पर तीन चरणों की सभ्यताओं के प्रमाण मिले हैं।
  • From the remains found in the first level, it is known that people of this age were agriculturists who preferred to live on the hills./प्रथम स्तर में प्राप्त अवशेषों से ज्ञात होता है की इस काल के लोग कृषक थे जो पहाड़ी पर रहना पसंद करते थे।
  • At that time their houses were made of raw soil./इस समय इनके मकान कच्ची मिट्टी के बने हुए थे।
  • It is evident from the second level residues that residents of this civilization were now using stone bricks as well as using stones in building construction./द्वितीय स्तर के अवशेषों से स्पष्ट होता है की इस सभ्यता के निवासी अब भवन निर्माण में मिट्टी की ईंटों के साथ-साथ पत्थरों का उपयोग भी करने लगे।
  • Many rooms and kitchen residues were found in the house./मकान में कई कमरों व रसोई के अवशेष मिले हैं।
  • In the third level excavation, in large quantities,  shaped clay oxen have been found, on which there is white painting separating this civilization from the other civilizations of the era. /तृतीये स्तर की खुदाई में बड़ी मात्रा में कई आकार  के मिटटी के बैलों की आकृतियाँ मिली हैं, जिन पर की गयी सफ़ेद रंग की चित्रकारी इस  सभ्यता को तत्कालीन अन्य सभ्यताओं से अलग करती है।
  • These white painted bulls are famous as the ojhiyan bull./ये सफ़ेद चित्रित  बैल ओझियां बैल के नाम से प्रसिद्ध है।
  • Based on the antiquities available at this site, it is estimated that the period of this civilization dates from 3000 BCE to 1500 BC /इस स्थल पर प्राप्त पुरावशेषों के आधार पर अनुमान है की इस सभ्यता का काल 3000 ई. पूर्व से 1500 ई.  पूर्व रहा होगा। 

Gilund/गिलूण्ड

  • In the Rajsamand district, at a distance from the banks of Banas river, in the excavation of the Giloond, the remnants of the copper age  civilization and later civilizations have been found./राजसमंद जिले में बनास नदी के तट से कुछ दूरी पर स्थित गिलूण्ड की खुदाई में ताम्रयुगीन सभ्यता एवं बाद की सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं।
  • This place is located approximately 30 km away from Ahad Civilization site./यह स्थल आहड सभ्यता स्थल से लगभग 30 किमी दूरी पर स्थित है।
  • There was a spread of aahad civilization here too./यहाँ भी आहड़  युगीन सभ्यता का प्रसार था।
  • Lime plaster and raw walls were used here. /यहाँ चूने  के प्लास्टर एवं कच्ची दीवारों का प्रयोग होता था।
  • Black and red color pottery have been found in Giloond./गिलूण्ड में काल व लाल  रंग के मृदभाण्ड मिले हैं।
  • The remains of a huge building of 100 * 80 feet have been found on this site, which is made of bricks./इस स्थल  पर 100*80  फ़ीट आकार के विशाल भवन के अवशेष  मिले हैं जो ईंटों से बना हुआ है।
  • The remains of buildings of this size have not been found in Aahad. /आहड  में इस आकार के भवनों के अवशेष प्राप्त नहीं हुए हैं। 

Lachchura/लछुरा –

  • Excavation work was done in 1998 under the guidance of Shri B.R. Meena by the Indian Archaeological Survey Department (ASI) near Hanuman Nalla in village Lachhura of Aasind, Asind Tehsil of Bhilwara./भीलवाड़ा  जिले की आसींद आसींद तहसील के गाँव लाछुरा में हनुमान नाले के पास भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग (ASI) द्वारा 1998 में श्री बी.आर मीणा के निर्देशन में उत्खनन कार्य संपन्न करवाया गया।
  • The remains found in the excavation have found evidence of civilizations from 7th century BC to the second century AD(700 B. C. to 200 A.D)./उत्खनन  में प्राप्त अवशेषों में यहाँ 7 वीं सदी ई. पूर्व से लेकर दूसरी सदी (700 B. C. से  200 A.D ) तक की सभ्यताओं के प्रमाण मिले हैं।
  • All these remains have been classified into four periods./ये सभी अवशेष चार कालों में वर्गीकृत किये गए हैं।
  • Here  the contemporary sharp-edged cups have been found./यहाँ संगकालीन तीखे किनारे वाले प्याले आदि मिले हैं।
  • In the first level, the material of the period from 700 BC to 500 BC has been found, in which the human miniature form made of soil are important./प्रथम स्तर में 700 BC से  500 BC तक के काल की सामग्री प्राप्त हुई है, जिनमे मिट्टी की मानव आकृतियाँ प्रमुख हैं।
  • It is estimated from the black-and-red painted pottery and copper utensils found in the excavation that copper age civilization flourished here. /खुदाई में मिले काले व लाल रंग के मृदभांड व ताँबे के बर्तन से अनुमान है कि यहाँ ताम्रयुगीन सभ्यता पनपी थी।  

RAS 2018 GK – Ancient Civilizations of Rajasthan PDF 

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Balathal/बालाथल –

  • From the excavation of a mound, Researchers have found remains of copper-stone civilization near Ballathal village in Ballabhnagar tehsil  Udaipur./उदयपुर जिले की बल्लभनगर तहसील में बालाथल गाँव के पास एक टीले के पास एक टीले के उत्खनन से यहाँ ताम्र-पाषाणकालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त  हुए हैं।
  • This civilization was discovered by Dr. V. N. Mishra in 1962-63./इस सभ्यता की खोज डॉ.  वी. एन मिश्र ने 1962-63 में की थी।
  • Here excavation work was done in the direction of Dr. V. N. Mishra in 1993, Dr. V. S. Shinde, Dr. R. K. Mohanty and Dr. Dev Kothari./यहाँ उत्खनन कार्य 1993 ई. में डॉ. वी. एन मिश्र के निदेशन में डॉ. वी. एस शिंदे, डॉ. आर. के. मोहंती  एवं डॉ. देव कोठारी द्वारा किया गया।
  • From the excavation of Balathal, there have been found the remains of a huge house, in which 11 rooms are present./बालाथल के उत्खनन से वहाँ  एक विशाल भवन के अवशेष मिले हैं, जिसमें 11 कमरे विधमान हैं।
  • It was probably built in second phase of copper-stone  period. /इसका  निर्माण संभवतः ताम्रपाषाण काल की द्वितीय अवस्था में हुआ  है।
  • Apart from this, the remains of a fortified building are also found in the excavation, which is constructed from a mud wall ./इसके अलावा खुदाई में एक दुर्ग जैसी इमारत के अवशेष भी मिले हैं, जिसका निर्माण मिट्टी की एक मोंटी दीवार से हुआ है।
  • In the third phase of this culture there is evidence of the use of mud bricks./इस  संस्कृति के तीसरे चरण में मिट्टी की कच्ची ईंटों के प्रयोग के प्रमाण मिले हैं।
  • Most equipment and tools in Balathal have been found of copper./बालाथल  में अधिकांश उपकरण एवं औजार ताँबे  के मिले हैं।
  • The number of stone tools is very low./पत्थर के उपकरणों की मात्रा बहुत कम है।
  • Copper made ornaments have also been obtained here in the excavation./यहाँ उत्खनन में ताँबे के बने आभूषण भी प्राप्त हुए हैं।
  • For the inhabitants of Balathal civilization, agriculture, hunting, and animal husbandry were the three main means of livelihood. / बालाथल सभ्यता के निवासियों के लिए कृषि, शिकार, एवं पशुपालन तीनों ही आजीविका के मुख्य  साधन रहे थे ।
  • In the agricultural crops, wheat, mustard and moong were major and mainly cow and ox in domestic animals./कृषि फसलों में गेहूं , मूंग एवं सरसों प्रमुख थी तथा पालतू पशुओं में मुख्यतः गाय एवं बैल थे।
  • Here are found two types of pottery with bright polish. /यहाँ चमकदार  पोलिश वाले दो प्रकार के मृदभांड मिले हैं।
    • Rough wall pottery, and/खुरदरी दीवार  मृदभांड, तथा
    • Smooth walled pottery/चिकनी दीवार वाले मृदभांड
  • The pots were glazed and coated in and out./बर्तनों पर अंदर व बाहर चमकदार लेप किया जाता था।
  • Residues show that residents of this civilization used kothis of clay  for storage of grains./अवशेषों से पता चलता है की इस सभ्यता के निवासी अनाज भंडारण हेतु मिट्टी की कोठियों का प्रयोग करते थे।
  • In addition, cereals were also kept in the floor of the house./इसके अलावा मकान की फर्श में वृत्ताकार गड्ढे  भी अनाज रखा जाता था।
  • cutting and  grinding of grain was done on the silbatta./अनाज को कूटने व पीसने  का कार्य सिलबट्टे पर होता था।
  • The sculptures of oxen and dogs in Balathal are notable, which is  found in the village Marmi (Chittorgarh), of aahad civilization./बालाथल में मिली बैल व कुत्ते की मूर्तियां  विशेष उल्लेखनीय है, जो आहड़ सभ्यता के एक स्थल मरमी गाँव (चित्तौड़गढ़ ) से भी मिली  है।
  • Probably the inhabitants of the city used to be non-vegeterians./संभवतः यहाँ के निवासी मांसाहार का प्रयोग भी करते थे।
  • Remains of iron smelting furnace were found in Balathal’s excavation./बालाथल के उत्खनन  में लोहा गलाने की भट्टी के अवशेष मिले हैं।
  • There is also a piece of cloth found in the excavation, from which it is known that the residents of the town also knew to knit garments./यहाँ खुदाई में एक वस्त्र का टुकड़ा भी मिला है, जिससे ज्ञात होता है की  यहाँ के निवासी वस्त्र बुनना भी जानते थे।
  • Apart from Bairath, the remains of the woven garments were found in Balathal only./बैराठ के अलावा बुने हुए वस्त्र का अवशेष बालाथल में ही मिला है।
  • Balathal culture was the culture of the later period of aahad civilization which developed independently from the Harappan culture./बालाथल संस्कृति आहड़ सभ्यता के पश्चात्वर्ती  काल की संस्कृति थी जो हड़प्पा संस्कृति से स्वतंत्र रूप से  विकसित हुई थी।

 

 

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RAS 2018 | Art and Culture – Tribes of Rajasthan | Rajasthan GK

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Meena Tribe:

  • They constitute major bulk of tribal population of Rajasthan.
  • Nearly 50% of Meenas are concentrated in Jaipur, Dausa, Sawai Madhopur, Rajsamand and Udaipur.

Origin of Meena Tribe

  • From traditional point of view, the origin of this tribe is related to fish.
  • Chandra Raj Bhandari, in his book titled Bhagwaan Mahaveer, has noted that there was a kingdom known as Mastasya kuru, situated in the southern part of Rajasthan on the western banks of Yamuna.
  • The rulers of this kingdom where known as Meenas.
  • Present day Meenas are said to be their descendants.
  • Also from regional point of view, a large number of meenas are settled in this region only.

Categories of meena tribe

  • Two main categories are  –
    • Zamidar Meena and
    • Chowkidar Meena
  • Meenas in southern part of state are considered to be of low origin whereas in the northeastern part, they are considered upper class.
  • The two meena classes maintain a lot of distance and no marital relations are found between them.

Social life of Meena Tribe

  • Marital ties, blood relations and kinship relations have utmost importance in the social life of Meena tribe.
  • They can also adopt children or people of any age
  • In adoption, preference  is given to primary or close kins.
  • In ancient days, they used to capture the women folk of the defeated enemies and marry them as a reward for winning the battle.
  • These days,  they marry according to hindu traditions.
  • Divorce is common among meenas and mode of divorce is also simple.
  • Both man and woman have rights to divorce each  other under certain circumstances.
  • The divorced women also have right to go for a second marriage.
  • The family of Meena tribe is joint in nature, similar to hindu joint family.
  • Both male and female work together equally.
  • Meena women are generally brave and hard working.
  • They cooperate with menfolk in agriculture, handicraft, cottage industry and even warfare.
  • Meenas are followers of hindu religion.
  • They generally worship power and Godess Durga, and lord Shiva.

Economy of the Meena tribe

  • Chaukidar Meenas work as watchmen for livelihood.
  • They consider themselves of higher status than other section of Meena.
  • They are accomplished in committing theft, dacoity and other criminal activities. Some of them adopted it as a chief means of their livelihood.
  • However, now, this habit is changing and they are adhering themselves to law abiding life.
  • As a result of reservation, lot of meenas are getting educated and placed at high posts in government.

मीणा जनजाति:

  • वे राजस्थान की जनजातीय आबादी में  सबसे अधिक हैं।
  • लगभग 50% मीणा आबादी जयपुर, दौसा, सवाई माधोपुर, राजसमंद और उदयपुर में केंद्रित हैं।

मीणा जनजाति की उत्पत्ति

  • पारंपरिक दृष्टिकोण से, इस जनजाति का मूल मछली से संबंधित है
  • चंद्र राज भंडारी ने अपनी किताब में भगवान महावीर नामित किया है, ने कहा है कि यमुना के पश्चिमी तट पर राजस्थान के दक्षिणी हिस्से में स्थित मस्तस्य कुरु नामक एक राज्य है।
  • इस राज्य के शासकों  को मीणा के नाम से जाना जाता था।  
  • वर्तमान  के मीणाओं   को उनका वंश कहा जाता है।  
  • क्षेत्रीय दृष्टि से भी, बड़ी संख्या में मीणा इस क्षेत्र में बसे हुए  हैं।

जनजाति की श्रेणियाँ

  • दो मुख्य श्रेणियां हैं –
    • ज़मीदार मीणा और
    • चौकीदार मीणा
  • राज्य के दक्षिणी भाग में  मीणाओं को निम्न मूल का माना जाता है, जबकि पूर्वोत्तर भाग में, उन्हें उच्च वर्ग का  माना जाता है।
  • ये दो मीणा जातियां आपस में काफी  दूरी बनाए रखती हैं और इन दोनों के बीच वैवाहिक संबंध  भी नहीं मिलते हैं।

मीणा जनजाति का सामाजिक जीवन

  • मीणा  जनजाति के सामाजिक जीवन में वैवाहिक संबंध, रक्त संबंध और रिश्तों के  सम्बन्धों को अत्यंत महत्त्व दिया जाता है।
  • वे किसी भी उम्र के बच्चों को  अपना सकते हैं।
  • गोद लेने में, प्राथमिकता  या तो करीबी रिश्तेदारों को या नजदीकी लोगों को दी जाती है।
  • प्राचीन दिनों में, वे पराजित शत्रुओं की महिला  को पकड़ लेते थे और लड़ाई जीतने के एक पुरस्कार के रूप में उनसे शादी करते थे।
  • इन दिनों, वे हिंदू परंपराओं के अनुसार शादी करते हैं।  
  • मीणाओं  में तलाक आम है और तलाक की प्रक्रिया भी सरल है।
  • कुछ परिस्थितियों में पुरुष और स्त्री दोनों को एक-दूसरे को तलाक देने का अधिकार है
  • तलाकशुदा महिलाओं को भी दूसरी शादी के लिए जाने का अधिकार है।
  • मीना जनजाति का परिवार प्रकृति में संयुक्त है, हिंदू संयुक्त परिवार के समान है।
  • पुरुष और महिला दोनों समान रूप से मिलकर काम करते हैं
  • मीणा महिलाएं आम तौर पर बहादुर और कड़ी मेहनत करने वाली होती हैं।
  • वे कृषि, हस्तकला, कुटीर उद्योग और यहां तक कि युद्ध में  भी पुरुषों के साथ सहयोग करती हैं।
  • मीणा  हिंदू धर्म के अनुयायी हैं।
  • वे आम तौर पर शक्ति ,  देवी दुर्गा की पूजा करते हैं, और भगवान शिव की भी  पूजा करते हैं।

मीणा जनजाति की अर्थव्यवस्था

  • चौकीदार मीना आजीविका के लिए चौकीदार के रूप में काम करते हैं।  
  • वे स्वयं को  को अन्य मीणाओं के मुकाबले उच्च स्तर का मानते हैं।  
  •  वे चोरी, डकैती और अन्य आपराधिक गतिविधियों में पारंगत होते हैं। उनमें से कुछ ने तो इसे अपनी आजीविका के प्रमुख साधन के रूप में अपनाया हुआ है ।
  • हालांकि, अब यह आदत बदल रही है और वे कानून को पालन करने वाले जीवन की तरफ बढ़ रहे  हैं।
  • आरक्षण की नीति के परिणामस्वरूप, बहुत से मीणा शिक्षित हो रही हैं और सरकार में उच्च पदों पर पहुँच रहे  है।

RAS 2018 | Art and Culture – Tribes of Rajasthan | Rajasthan GK PDF Download

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Bhil Tribe:

  • It is second major tribe of Rajasthan.
  • The people of thuis tribe are mainly  settled in Bhilwara, banswara, Dungarpur, Udaipur, Sirohi, Chittorgarh, etc.
  • They are stable agriculturists and a patriarchial tribe.
  • They are traditionally good archers.

Origin

  • There are many opinions regarding their origin.
  • Anthropologists consider them to be descendants of Mundas as mundari words are frequently used in their language.
  • Prof. Guha connects them to the Proto-Australoid race.
  • According to Col. Tod, Bhils were residents of Aravali range in Mewar state. They helped Maharana Pratap in his fight against Akbar.
  • Sanskrit literature relates Bhils to ‘Nishad’ or ‘Pulind’ caste.
  • Etymologically, the word ‘Bhil’ denotes Bowman or Archer.
  • It is a word from dravidian language, which means arrow.
  • The Bhils are short statured people with deep blackish complexion , broad nose, rough hairs, red eyes and elevated jaws.
  • The womenfolk are relatively good looking and beautiful than their male counterparts.
  • The complexion of women folk is wheatish in colour and their body is well built and attractive.
  • Bhils generally wear cheap and very little clothes, due to their poverty.
  • The menfolk generally cover their body with a towel like piece of cloth known as Falu, wrapped around waist.
  • They cover upper body with sleevless jacket and a turban as their headgear.
  • At home, they wear the undergarment – langot.
  • Womenfolk wear Falu, also known as kachwo.
  • Now they have also started donning blouses to cover the upper part of their body.
  • The womenfolk are interested in wearing ornaments like silver chain or necklace (Hasli) , Nath – in nose, earrings, bangles in arms, Bor- on their forehead.
  • They generally dwell in small villages of 20 to 200 hutments.
  • Their houses are known as ‘Koo’.
  • Their houses are rectangular in shape. The walls are made up of bamboo or stone .
  • They desert their own settlements and search for new whenever some epidemic breaks out and cattle start dying in small number.
  • While selecting a new residence, they give prime importance to the availability of a water source nearby.

Food

  • The staple food of Bhils is Maize and rice.
  • They also eat non-vegetarian food because of scarcity of agricultural products.
  • They are habitual drinkers of intoxicants such as Mahava – local wine prepared from seeds of  Mahuwa plant.
  • They are heavy drinkers and spend half of their day to day earning on intoxicants.

Social Organization

  • They live in joint families and the patriarch is the chief of the family.
  • All the powers are vested in the family chief/ father.
  • Women contribute a great deal in household activities and agriculture.
  • A Bhil village, typically comprises of people from the same lineage.
  • The village chief is called ‘Tadvi’ and ‘Bansao’.
  • Bhil husbands do not divorce their wives but the wives can do so.
  • The bhils are brave and fearless people.
  • They are known for their faithfulness to their masters.
  • The small village of Bhil is known as ‘Fala’, while big one is known as ‘Paal’.
  • Panchayat is a very powerful organization of the Bhil society.
  • Bhils have strong feeling of collective responsibility. So whenever an outsider hurts a Bhil, they consider it as a attack on the whole village and avenge it collectively.

Religion

  • They follow hindu religion and worship Mahadev, Ram, Durga, Hanuman, Ganesh etc.
  • They also burn their dead bodies like hindus and observe various death rites and rituals as hindus.

भील जनजाति:

  • यह राजस्थान की दूसरी प्रमुख जनजाति है।  
  • इस जनजाति के लोग मुख्य रूप से भीलवाड़ा, बंसवाड़ा, डुंगरपुर, उदयपुर, सिरोही, चित्तौड़गढ़ आदि में बेस हुए  हैं।
  • वे स्थिर किसान हैं और यह एक पुश्तैनी जनजाति हैं।  
  • वे पारंपरिक रूप से अच्छे धनुर्धर होते हैं।  

मूल

  • उनके मूल के बारे में कई राय है।  
  • मानवविज्ञानी मानते हैं कि वे मुंद वंश के  हैं क्योंकि उनकी भाषा में बार-बार मुंदरी शब्दों का  इस्तेमाल किया जाता है।
  • प्रो. गुहा उन्हें प्रोटो-ऑस्टेलोयड नस्ल से जोड़ते हैं।
  • कर्नल टॉड के अनुसार, भील मेवाड़ राज्य में अरवली रेंज के निवासियों थे। अकबर के खिलाफ उनकी लड़ाई में उन्होंने महाराणा प्रताप की मदद की।
  • संस्कृत साहित्य भिलओं को ‘निशाद’ या ‘पुलिंद’ जाति से संबोधित करते हैं।
  • शाब्दिक रूप से  ‘भील’ शब्द  धनुर्धर या तीरंदाज़  को दर्शाता है।
  • यह द्रविडीयन भाषा  का एक शब्द है, जिसका अर्थ है तीर।  
  • भिल छोटे आकार वाले लोग होते हैं, जो काले रंग के होते हैं , इनकी नाक व्यापक,  बाल रूखे, लाल आँखें और ऊंचा जबड़े होते हैं।
  • महिलाएं अपने पुरुष समकक्षों की तुलना में अपेक्षाकृत अच्छी लगती हैं और सुंदर होती  हैं।
  • महिलाओं  का रंग गेहूंआ होता  है और उनका शरीर अच्छी तरह से निर्मित और आकर्षक होता है।
  • भील आमतौर पर अपनी  गरीबी के कारण सस्ते और बहुत कम कपड़े पहनते हैं।
  • पुरुष आम तौर पर अपने शरीर को एक तौलिया के साथ ढकते  हैं जिसे फलु के रूप में जाना जाता है, इसे कमर के चारों ओर लपेटा जाता है।
  • वे ऊपरी शरीर को निर्बाध जैकेट और एक पगड़ी   से अपने सिर को ढकते हैं।
  • घर में, वे  नीचे लंगोट पहनते हैं।
  • महिलावर्ग फालु  पहनते हैं, जिन्हें कछवो भी कहा जाता है।  
  • अब उन्होंने ब्लाउज का उपयोग अपने शरीर के ऊपरी भाग को ढकने  के लिए शुरू कर दिया है।
  • महिलाओं को चांदी की चेन या हार (हस्ली), नाथ – नाक, कान की बाली, हाथों में चूड़ी, बोर-  उनके गले में पहनने में रुचि होती है।
  • वे आम तौर पर 20 से 200 झोपड़ियों के छोटे गांवों में रहते हैं।
  • उनके घर को ‘कु’ के नाम से जाना जाता है।  
  • उनके घर आकार में आयताकार होते हैं। दीवारें बांस या पत्थर से बनी होती हैं।  
  • जब कोई  महामारी फ़ैल  जाती है और मवेशी अधिक  संख्या में मरने लगती हैं तो  वे अपनी बस्तियों को छोड़ देते हैं और नई बस्ती की खोज करते हैं।  
  • एक नए निवास का चयन करते समय, वे पास में  जल स्रोत की उपलब्धता को काफी महत्व देते हैं।

भोजन

  • भीलों का मुख्य भोजन मक्का और चावल है।  
  • कृषि उत्पादों की कमी के कारण वे गैर-शाकाहारी भोजन भी खाते हैं।
  • वे  महवा  जैसे मादक  पदार्थों का  इस्तेमाल करते  हैं – ये महुवा  पौधे के बीज से स्थानीय  शराब तैयार  होती है
  • वे बहुत अधिक पीते हैं और अपने आधे दिन की कमाई नशे में ही लगा देते हैं ।

सामाजिक संस्था

  • वे संयुक्त परिवारों में रहते हैं और पुरुष/पिता ही   परिवार का प्रमुख है।
  • सभी  शक्तियां   परिवार के प्रमुख  / पिता में निहित हैं।  
  • महिला  घरेलू गतिविधियों  और कृषि में काफी योगदान  देती हैं।
  • एक भील गांव में , आम तौर पर एक ही वंश के लोग होते हैं।
  • गांव के प्रमुख को ‘तदवी’ और ‘बांसाओ’ कहा जाता है।
  • भील पति अपनी पत्नी को तलाक नहीं देते , लेकिन पत्नियां ऐसा कर सकती हैं।
  • भील बहादुर और निडर व्यक्ति होते हैं।
  • वे अपने स्वामी के प्रति अपनी वफ़ादारी/सच्चाई के लिए जाने जाते हैं|
  • भिलों के छोटे से गांव को ‘फला’ कहा  जाता है, जबकि बड़े गाँव को ‘पाल’ के नाम से जाना जाता है|
  • पंचायत भील समाज का एक बहुत शक्तिशाली संगठन होता है।  
  • भीलों में  सामूहिक जिम्मेदारी की मजबूत भावना होती है। इसलिए जब भी कोई बाहरी व्यक्ति किसी भील को कष्ट देता है, तो वे इसे पूरे गांव पर हमले के रूप में मानते हैं और इसका सामूहिक रूप से बदला लेते हैं।

धर्म

  • वे हिन्दू धर्म का पालन करते हैं और महादेव, राम, दुर्गा, हनुमान, गणेश आदि  की पूजा करते हैं
  • वे  मरे हुए शवों को हिन्दुओं की तरह  जला देते हैं और उनके विभिन्न मौत के संस्कार और अनुष्ठान हिंदूओं जैसे ही होते  हैं। 

 

 

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RAS 2018 Preparation II Rajasthan art and Culture II customs and costumes Part 2

RAS 2018 Preparation II Rajasthan customs and costumes Part 2

RAS 2018 Preparation II Rajasthan art and Culture II customs and costumes Part 2

(15). Purchase and Sale of Women and Girls

  • From the medieval period to 19th century , the purchase and distribution of women and boys and girls in Rajasthan was generally prevalent.
  • Some states used to collect tax on this purchase. In Kota State, this purchase and sale was taxed as ‘Chauthan’.
  • Rajputs were buying women and boys and girls for giving in dowry in the marriage of their daughter, some people used to buy women as a mistress and for prostitution.
  • However, this practice was banned in Kota State in 1831 AD but still the practice continued.
  • First of all, on February 16, 1847, the state of Jaipur issued an advertisement and declared this business as illegal.

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(15). औरतों व लड़कें-लड़कियों का क्रय-विक्रय :-

  • मध्यकाल से 19 सीं सदी मध्य तक राजस्थान में स्त्रियों और लड़के-लड़कियों की खरीद-फरोख्त सामान्य रूप से प्रचलित थी। कुछ राज्य तो इस खरीद-फरोख्त पर विधिवत कर वसूल करतें थे। कोटा राज्य में इस क्रय-विक्रय  पर ‘चौथान’ नामक कर वसूला जाता था।
  • राजपूत लोग अपनी पुत्री के विवाह में दहेज के साथ गोला-गोली (दास-दासी) देने के लिए स्त्रियां और लड़के-लड़कियाँ खरीदतें थे तो कुछ लोग स्त्रियों को रखैल के रूप में व वेश्यावृति करवाने के लिए खरीदते थे।
  • यधपि कोटा राज्य में 1831 ई. में इस कुप्रथा पर रोक लगाई गई थी लेकिन फिर भी यह प्रथा जारी रही।
  • सर्वप्रथम  16 फरवरी, 1847 ई. को जयपुर राज्य ने एक इश्तिहार जारी कर इस व्यापार को अवैध घोषित कर दिया।
  • People were forbidden to buy and sell Boys and girls, and strict action was taken against both the buyer and the seller.

(16). Slave custom : –

  • In Rajasthan, slave tradition was prevalent since ancient times. There slaves were often such people who were taken prisoner during the war. The slaves were also bought and sold.
  • These slaves had to adhere to the orders of their masters while facing much harrassment, even if the order was low and inhuman.
  • In the royal houses, a large number of slaves were kept in a separate department, which was called ‘Rajlok’.
  • लड़के- लड़की खरीदने-बेचने की मनाही की दी गई और खरीदने व बेचने वाले, दोनों के विरुद्ध सख्त कार्यवाही करने की घोषणा की गई।

Video : Rajasthan art and Culture II customs and costumes Part 2

 

(16). दास प्रथा :-

  • राजस्थान में प्राचीन काल से ही दास प्रथा प्रचलित थी। दास-दसियों में प्रायः ऐसे लोग होते थे, जिन्हें युद्ध के समय बंदी बना लिया जाता था।  दास-दासियों का क्रय भी किया जाता था।
  • इन दासों को अनेक संकटों का समाना करते हुए भी अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करना पड़ता था, चाहे वह आज्ञा निम्नस्तरीय और अमानवीय ही क्यों न हो।
  • राजघरनों में तो बड़ी संख्या में दासों का एक  पृथक विभाग रखा जाता था जिसे ‘राजलोक’ कहा जाता था।
  • Occasionally the King used to accept a maid as a concubine, which was called ‘Padadayat’.
  • If the ruler was happy and allowed her to wear gold ornaments in her hands and feet, she would have been called ‘Paswan’ or ‘Khavasan’ and in meetings, festivals and celebrations etc. lived under the queens. This slave tradition made a very moral decline of the Rajasthani society.
  • In 1832 William Bantick banned slavery. Even in Rajasthan, in 1832 AD, Kota and Bundi states banned the practice of slavery in the Haroti region.
  • कभी-कभी राजा लोग किसी दासी या गोली को उपपत्नी के रूप में स्वीकार  कर लेते थे, जिसे ‘पड़दायत’ कहा जाता था।
  • यदि शासक प्र्शन्न होकर उसे हाथ-पैरों  में सोने के आभूषण पहनने की स्वीकृति दे देते थे तो वह ‘पासवान’ अथवा ‘खवासन’ कहलाती थी और उत्सव -समारोहों आदि में उसकी बैठक रानियों के नीचे रहती थी। इस दास प्रथा ने राजस्थानी समाज का बेहद नैतिक पतन किया।  
  • सन 1832 में विलियम बैंटिक ने दास प्रथा पर रोक लगाई। राजस्थान में भी 1832 ई. सर्वप्रथम हाड़ौती क्षेत्र में कोटा व बूँदी राज्यों  ने दास प्रथा पर रोक लगाई।

(17).Begar practice: –

  • Taking the free services of the people and their exploitation by feudalists  was called Begar custom.
  • Except Brahmins and Rajputs, all the other castes had to give begar. Whenever there was a need to get the fodder for cattle, they used to take it from one village to another, cutting wood, painting houses, to do domestic chores etc.
  • All these services had to be given free. No wages were given in return for this.
  • The end of the traditional practice of begar in villages happened with the integration of Rajasthan and after the end of the feudalistic practices.

(17). बेगार प्रथा :-

  • सामन्तों, जागीरदारों व राजाओं द्वारा अपनी रैयत से मुक्त सेवाएँ लेना ही बेगार प्रथा कहलाती थी।
  • ब्राह्मण व राजपूत के अतिरिक्त अन्य सभी जातियों को बेगार देनी पड़ती थी। पशुओं के लिए चारा लाने, आवश्यकता पड़ते पर एक गाँव से दूसरे गाँव में बोझा ले जाने, लकड़ी चीरने, मकानों को लीपने-पोतने, घरेलू कामों आदि हेतु बेगार ली जाती थी।
  • ये सारी सेवाएँ मुक्त देनी पड़ती थी। इसके बदले कोई मजदूरी नहीं दी जाती थी।  
  • गाँवों में परम्परागत रूप से दी जाने वाली बेगार प्रथा का अंत राजस्थान के एकीकरण और उसके बाद जागीदारी प्रथा की समाप्ति के साथ ही हुआ।

(18). Bonded labour or Sagri Pratha: –

  • In exchange for the amount of money lent by the bourgeois or the Mahajan or the upper caste people, for  the amount of interest, instead of the amount of interest, that person or any of his family members were taken as bonded labor to work in  form of a domestic servant.
  • Unless the person returned the borrowed amount, he had to pay service to the bourgeoisie or the Mahajan for no wages at all.
  • In Rajasthan, in 1961, the ‘Sagri Prevention Act’ was passed and it tried to liberate the bonded laborers.

(18).बंधुआ मजदुर प्रथा या सागड़ी प्रथा :-

  • पूंजीपति या महाजन  अथवा उच्च कुलीन वर्ग के लोगों द्वारा साधनहीन लोगो को उधार दी गई राशि के बदले या ब्याज की राशि के बदले उस व्यक्ति या उसके परिवार के किसी सदस्य को अपने यहाँ घरेलू नौकर के रूप रख लेना बंधुआ मजदूर प्रथा कही जाती थी।
  • जब तक वह व्यक्ति उधार ली राशि चूका न दे, उसे बिना  मजदूरी लिए पूंजीपति या महाजन के यहाँ मजदूरी करनी पड़ती थी।
  • राजस्थान में 1961 ई. में ‘सागड़ी निवारण अधिनियम’ पारित करके बंधुआ मजदूरों को मुक्ति दिलाने का प्रयास किया गया।

Other important facts:

1). Rekh: –

  • That criterion, on the basis of which state tax was collected from the feudalists.

2). Talwar Bandhai or Najarana: –

  • Charges collected by the state from the new heirs of jagirs.

3). Tameej: –

  • Samanta’s privilege, in which the Maharana stood and respected him when he came in the court  and returned.

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य :-

1). रेख :-

  • वह मापदंड, जिसके आधार पर सामंतो व जागीदारों से राजकीय शुक्लों की वसूली की जाती थी।

2). तलवार बंधाई या नजराना :-

  • राज्य द्वारा  जागीर के नए उत्तराधिकारी से वसूल किया जाने वाला शुल्क।

3). तामीज :-

  • सामन्तो को प्राप्त विशेषाधिकार, जिसमें किसी  सामंत के दरबार में आने व वापस जाने के समय महाराणा खड़ा होकर उन्हें सम्मान देता था।

4). Qurab: –

  • Special honor to be given to the feudal lord, in which the ruler would put his hands on the shoulders of the feud and carry his chest, which meant that your place is in my heart.

(5). Banh passaw: –

  • Respect for the Samanta, in which Maharana accepted the greeting of Samanta and kept his hand on the shoulder of that feud.

(6). Missal: –

  • The method of sitting in a straight line  in the royal court was called Missal.

4). क़ुरब :-

  • सामंत को दिया जाने वाला विशेष सम्मान, जिसमें शासक सामंत के कंधों पर हाथ रखकर  अपनी छाती तक ले जाता था जिसका आशय होता था कि आपका स्थान मेरे ह्रदय में है।

(5). बाँह पसाव :-

  • सामन्त को प्राप्त सम्मान, जिसमे महाराणा सामन्त के अभिवादन को स्वीकार  करते हुए अपने हाथ उस सामन्त के कंधो पर रख देता था।

(6). मिसल :-

  • राजदरबार में पंक्तिबंद्ध तरिके से बैठने की रीति को मिसल कहा जाता था।

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