Sociology Study Notes | Max Weber – Social action, Ideal types

Sociology Study Notes | Max Weber – Social action, Ideal types

Sociology Study Notes | Max Weber – Social action, Ideal types

Sociology Study Notes | Max Weber – Social action, Ideal types

Sociology Study Notes | Max Weber – Social action, Ideal types

Max Weber / मैक्स वेबर:-

Max Weber (1864 – 1920)/मैक्स वेबर (1864-1920) :

  • Weber is accused of producing bourgeois social theory as opposed to the proletarian social theory of Marx. He came from a wealthy established family, and thus had the benefits of a privileged education and good social and career prospects./वेबर को मार्क्स के श्रमिक सामाजिक सिद्धांत के खिलाफ पूंजीवादी सामाजिक सिद्धांत को प्रतिपादित करने का आरोपी का माना जाता है  | वह एक स्थापित धनी परिवार से थे और इस प्रकार उनके पास एक अच्छी शिक्षा का लाभ था और अच्छे सामाजिक व करियर संभावनाओं का भी |
  • Weber worked in a society in which the dominant political issue was the decline of the liberal, Protestant and highly individualistic attitude of the established middle class, and the emergence of an authoritarian, militarised, bureaucratic regime that accompanied the rise of the ‘new Germany’./वेबर एक ऐसे समाज में कार्य करते थे जिसमें स्थापित मध्यवर्ती वर्ग के उदारवादी, प्रतिवादी व अत्यधिक व्यक्तिगत रवैया और एक सत्तावादी, सैन्य, नौकरशाह शासन का उदय, जिससे ‘नए जर्मनी’ का उदय हुआ, महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा था |
  • For Weber and many of his contemporaries, the demise of traditional liberal values of personal responsibility and autonomy, and their replacement with a much more paternalistic notion of national service, was a matter of great concern./वेबर और उनके समकालीनों के लिए व्यक्तिगत दायित्व व स्वायत्तता के पारंपरिक उदारवादी मूल्यों की समाप्ति और राष्ट्रीय सेवा के एक अधिक पैतृक धारणा के साथ उन्हें बदलना एक अधिक चिंता का विषय था |
  • Weber become involved in the heated discussions about the role of social-scientific study, and the difference between this and the natural sciences, taking place in Germany around 1900. These philosophical debates began with the revival of one of the old chestnuts of philosophy and social theory, which is the distinction between empirical knowledge and rational knowledge./वेबर सामाजिक-वैज्ञानिक अध्ययन के भूमिका के महत्वपूर्ण चर्चा में शामिल हुए, और इस व प्राकृतिक विज्ञानों के बीच अंतर 1900 के आसपास जर्मनी में आने लगा था | इन दार्शनिक वादों की शुरुआत दर्शन और सामाजिक सिद्धांत के एक पुराने सुर्खी के पुनर्जीवन के साथ हुई, जो कि अनुभवजन्य ज्ञान विवेकी ज्ञान के बीच अंतर है |

Immanuel Kant (1724 – 1804)/इम्मानुअल कान्त (1724-1804) :

  • A German philosopher, Immanuel Kant argued that while knowledge of the real world was something that comes through our physical senses, it can only be made sense of once this information has been structured and organised by the mind. Kant’s position is dualistic because he accepts the necessary combination of sense perception and cognitive reason. Hegel is monistic as he emphasises the absolute primacy of intellectual reason alone./एक जर्मन दार्शनिक, इम्मानुअल कान्त का तर्क था कि जहाँ वास्तविक दुनिया का ज्ञान वह था जो हमारे भौतिक बोध द्वारा आता था, इसे सिर्फ एक बार का बोध तभी बनाया जा सकता था यदि इस सूचना की सरंचना और संगठन मन द्वारा किया जाता हो | कान्त का पद द्वैतवादी है क्योंकि वह संवेदन बोध व ज्ञान-सम्बन्धी तर्क के अनिवार्य मेल को स्वीकारते हैं | हेगल मोनिस्टिक है क्योंकि वह सिर्फ बौद्धिक तर्क के निरपेक्ष उत्कृष्टता पर जोर डालते हैं |
  • Kant tried to reconcile his rationalist view with the strict objectivism and empiricism of John Locke (1632 – 1704) and David Hume (1711 – 1796) who argued that all our ideas and concepts, including both physical sensations and intellectual reflections, are derived from practical experience of the world around us and not from pre-existing capacities of the human mind. From an empiricist viewpoint, there cannot be any knowledge or consciousness until after we have had physical contact with the material world around us. This dispute over 2 kinds of knowledge is useful to study the nature of social-scientific knowledge./कान्त ने अपने तर्कवादी दृष्टिकोण को जॉन लॉक (1632 – 1704) और डेविड ह्यूम (1711 – 1796) के निष्पक्षतावाद और अनुभवजन्यवाद से मिलाने की कोशिश की जिनका तर्क यह था कि हमारे सभी विचार और धारणाएं, भौतिक संवेदनाएं और बौद्धिक मीमांसाएँ दोनों सहित, हमारे आसपास के विश्व के व्यावहारिक अनुभव से प्राप्त होते हैं न कि मानव मन के पूर्व-मौजूदा क्षमताओं से | एक अनुभववादी दृष्टिकोण से कोई ज्ञान या चेतना नहीं हो सकती जब तक कि हमारे आसपास के भौतिक विश्व के साथ हमारी भौतिक संपर्क न हो | ज्ञान के 2 प्रकार के बीच यह विवाद सामाजिक -वैज्ञानिक ज्ञान के प्रकृति के अध्ययन के लिए उपयोगी है 
  • Kant argued that the free individual was intuitively capable of moral self-direction. As natural objects, the behaviours of individuals could be investigated according to the same scientific methodologies that would be appropriate for any natural object. As moral subjects, individuals are not part of the natural world, for God has given the individual free choice to act in either a moral or an immoral fashion. A civilized society is one that encourages individuals to act morally. But society cannot deterministically generate morality because moral action is always an outcome of free will./कान्त का तर्क था कि स्वतन्त्र व्यक्ति नैतिक स्व-निर्देश के लिए सहज रूप से समर्थ था | प्राकृतिक वस्तुओं की तरह व्यक्तयों के व्यवहार का भी समान वैज्ञानिक प्रणाली के अनुसार परीक्षण किया जा सकता है जो कि किसी अन्य प्राकृतिक वस्तु के लिए उचित होती | नैतिक विषयों के रूप में, व्यक्ति प्राकृतिक विश्व का हिस्सा नहीं है, क्योंकि ईश्वर ने व्यक्ति को किसी नैतिक या अनैतिक रूप से कार्य करने के लिए स्वतन्त्र विकल्प दिया है | एक सभ्यात्मक समाज वह है जो व्यक्तियों को नैतिक रूप से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करे | लेकिन समाज निर्धारणात्मक नैतिकता का निर्माण नहीं कर सकता क्योंकि नैतिक कार्य स्वतन्त्र इच्छा का परिणाम है |
  • The Kantian emphasis on the dualism of the individual – the view of man as both natural object and moral subject – strongly influenced Simmel and Weber. For Simmel and Weber, sociology, unlike biology or chemistry, had to come to terms with the fact that, to some extent, the individual was not, and could not be, constrained by determinate laws./व्यक्ति के द्वैतामक  – इंसान का प्राकृतिक व नैतिक वस्तु के रूप में दृष्टिकोण – पर कान्तीय जोर ने बहुत अधिक सिम्मेल और वेबर को प्रभावित किया | सिम्मेल व वेबर के लिए समाजशास्त्र को, जीवविज्ञान व रसायनविज्ञान के बिलकुल उलट, तथ्यों के साथ सन्दर्भों पर आना पड़ता कि कुछ हदों तक व्यक्ति न तो निर्धारित नियमों द्वारा विवश किया जाता था और न ही किया जा सकता है |
  • The younger followers of Kant or ‘neo- Kantians’, and other interested including Weber, turned their attention to /कान्त के युवा अनुयायी या ‘नव कान्तवादी’ और वेबर सहित अन्य रूचि रखने रखने वालों ने अपना ध्यान मोड़ा –

(a) They wanted to challenge the idea that the kind of knowledge generated by the natural sciences was the only kind of knowledge available./वे इस विचार को चुनौती देना चाहते थे कि प्राकृतिक विज्ञानों द्वारा सृजित ज्ञान का प्रकार उपलब्ध एकमात्र ज्ञान का प्रकार था |

(b) They wanted to show that the 2 kinds of science had to be different because they were looking at two fundamentally different kinds of phenomena./वे दिखाना चाहते थे कि विज्ञान के 2 प्रकारों को अलग होना चाहिए क्योंकि वे घटना के 2 मुलभूत अलग प्रकारों की खोज कर रहे थे |

(c) If these points are valid, then it was obvious that 2 distinct methodologies were required to investigate them./यदि ये बिंदु वैध हैं, तो यह स्पष्ट था कि उनके निरीक्षण के लिए 2 अलग प्रणालियों की आवश्यकता थी |

Methodenstreit/मेथोदेन्स्त्रेइत :

  • The philosophical debates between the positivists and anti-positivists, which began in Germany in the latter part of the 19th century, are known as Methodenstreit./प्रत्यक्षवादी और गैर-प्रत्यक्ष्वादियों के बीच दार्शनिक विवादों, जो 19वीं शताब्दी के बाद के भाग में जर्मनी में शुरू हुआ, को मेथोदेन्स्त्रेइत से जाना जाता है |

Difference between the natural world and the social or cultural world as given by Wilhelm Dilthey/विल्हेल्म दिल्थे द्वारा दिए गए प्राकृतिक विश्व और सामाजिक या सांस्कृतिक विश्व के बीच अंतर :

  • The natural world can only be observed and explained from the outside, while the world of human activity can be observed and comprehended from the inside, and is only intelligible because we ourselves belong to this world and have to do with the products of minds similar to our own./प्राकृतिक विश्व को सिर्फ बाहर से ही अवलोकन और व्याख्या किया जा सकता है, जबकि मानव क्रियाकलापों के दुनिया का अवलोकन और उसका सम्मलेन अन्दर से किया जा सकता है, और सिर्फ सुगम है क्योंकि हम स्वयं ही इस दुनिया का हिस्सा है और हमारे स्वयं के समान ही मन के उत्पादों से लेना देना है |
  • The relations between phenomena of the natural world are mechanical relations of causality, whereas the relations between phenomena of the human world are relations of value and purpose./प्राकृतिक दुनिया के घटना के बीच संबध कारणत्व के यांत्रात्मक सम्बन्ध हैं, जबकि मानवीय दुनिया के घटना के सम्बन्ध मूल्य व प्रयोजन के सम्बन्ध हैं |

Various Scholars/विभिन्न विद्वान् :

William Dilthey (1833 – 1911)/विलियम दिल्थे (1833 – 1911) :

  • Dilthey believed that since social or cultural science studied acting individuals with ideas and intentions, a special method of understanding (Verstehen) was required, while natural science studied soulless things and, consequently, it did not need to understand its objects./दिल्थे का मानना था कि क्योंकि सामाजिक या सांस्कृतिक विज्ञान ने विचारों व इरादों के साथ कार्य करने वाले व्यक्तियों का अध्ययन किया, समझ की एक विशेष प्रणाली-विज्ञान की आवश्यकता थी (वेर्स्तेहें), जबकि प्राकृतिक विज्ञान ने निष्प्राण वस्तुओं का अध्ययन किया और इसके परिणामस्वरूप इसे इसके वस्तुओं को समझने की आवश्यकता नहीं थी |

Wilhelm Windelband (1848 – 1915)/विल्हेल्म विन्देल्बंद (1848 – 1915) :

  • He proposed a logical distinction between natural and social sciences on the basis of their methods./उन्होंने अपने प्रणालियों पर आधारित प्राकृतिक व सामाजिक विज्ञानों के बीच एक तार्किक अंतर का प्रस्ताव दिया |
  • Natural sciences use a ‘nomothetic’ or generalizing method, whereas social sciences employ an ‘ideographic’ or individualizing procedure, since they are interested in the non-recurring events in reality and the particular or unique aspects of any phenomenon./प्राकृतिक विज्ञान एक ‘संवर्धित’’ या सामान्यीकृत प्रणाली का प्रयोग करता है, जबकि सामाजिक विज्ञानें एक ‘विचारधारा’ या व्यक्तिगत प्रक्रिया का उपयोग करते हैं, क्योंकि वास्तविक में ये गैर-आवर्ती घटनाओं में रुचिकर होते हैं और किसी घटना के विशेष या अनोखे पहलुओं में |
  • He argued that the kinds of knowledge generated by the natural and the social sciences were different as they were looking at 2 different levels of reality. The natural scientists were concerned with material objects and with describing the general laws that governed their origins and interactions, social and cultural scientists were concerned with the ethical realm of human action and culture./उनका तर्क था कि सामाजिक और प्राकृतिक विज्ञानों द्वारा सृजित ज्ञान के प्रकार अलग थे क्योंकि वे वास्तविकता के 2 अलग स्तरों पर आधारित थे | प्राकृतिक वैज्ञानिक भौतिक वस्तुओं व सामान्य नियमों, जो उनके मूलों व परस्पर क्रिया को संचालित करते थे, के व्याख्या के बारे में चर्चा करते थे, जबकि सामाजिक व सांस्कृतिक वैज्ञानिक मानव क्रिया व संस्कृति के नैतिक क्षेत्र के बारे में चर्चा करते थे |
  • Although knowledge of natural phenomena could be achieved directly through observation and experimentation, knowledge of human motivation, of norms and patterns of conduct, and of social and cultural values, had to be based on a more abstract process of theoretical reasoning./हालाँकि प्राकृतिक घटना का ज्ञान अवलोकन व प्रयोगकार्य द्वारा प्रत्यक्ष प्राप्त किया जा सकता है, मानव प्रेरणा, आचरण के मानदंड व प्रारूप, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के ज्ञान को सैद्धांतिक तर्क के एक अधिक अमूर्त प्रक्रिया पर आधारित होना था |

Heinrich Rickert (1863 – 1936)/हैनरिक रिकर्ट (1863 – 1936) :

  • He argued that the natural sciences are ‘sciences of fact’ and so questions of value were necessarily excluded from the analysis./इनका तर्क था कि प्राकृतिक विज्ञान ‘तथ्य के विज्ञान’ हैं और इसलिए विश्लेषण से अनिवार्य रूप से  मूल्यों के प्रश्नों को बाहर कर दिया गया |
  • The social sciences are ‘sciences of value’ because they are specifically concerned with understanding why social actors choose to act in the ways that they do./सामाजिक विज्ञान ‘मूल्य के विज्ञान’ हैं क्योंकि ये इस बात से विशेषकर सम्बंधित होते हैं कि क्यों सामाजिक कर्ताएं तरीकों में कार्य करना चयन करते हैं जो वे करते हैं |

Influence of these perspectives on Weber/वेबर पर इन परिप्रेक्ष्यों का प्रभाव :

  • Weber accepted the positivists’ argument for the scientific study of social phenomena and appreciated the need for arriving at generalizations if sociology had to be a social science./वेबर ने सामाजिक घटना के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए प्रत्यक्षवादियों के तर्कों को माना  और सामान्यीकरण पर आने की जरुरत को स्वीकार यदि समाजशास्त्र को एक सामाजिक विज्ञान होना था |
  • He criticized the positivists for not taking into account the unique meanings and motives of the social actors into consideration./उन्होंने अनोखे अर्थों को समावेश नहीं करने व सामाजिक कर्ताओं के उद्देश्यों को विचार में नहीं लेने के लिए प्रत्यक्षवादियों की आलोचना की |
  • He argued that sociology, given the variable nature of the social phenomena, could only aspire for limited generalizations (‘thesis’, as he called), not universal generalizations as advocated by the positivists./उनका तर्क था कि समाजशास्त्र, सामाजिक घटना के अचर प्रकृति को देखते हुए, सिर्फ सीमित सामान्यीकरण के लिए महत्वाकांक्षी (‘थीसिस’ जैसा वह कहते थे) था, न कि प्रत्यक्षवादियों जिसका पक्ष लेते थे उस सार्वभौमिक सामान्यीकरण के लिए |
  • Weber appreciated the neo-Kantians for taking into cognizance the subjective meanings and motives of the social actors to understand the social reality but also stressed the need for building generalizations in social sciences. Natural reality is distinguished from the social reality by the presence of ‘Geist’. By virtue of it, humans respond to external stimuli in a meaningful way./वेबर ने सामाजिक वास्तविकता की समझ के लिए सामाजिक कर्ताओं के व्यक्तिपरक अर्थों और उद्देश्यों को संज्ञान में लेने के लिए नव कान्तीवादियों की सराहना की लेकिन सामाजिक विज्ञानों में सामान्यीकरणों के निर्माण पर भी जोर दिया | प्राकृतिक वास्तविकता ‘वास्तविकता’ की उपस्थिति द्वारा सामाजिक वास्तविकता से अलग है | इसके आधार पर मानव बाह्य उत्प्रेरकों में एक सार्थक तरीके से प्रतिक्रिया करते हैं |
  • Weber partly accepted Marx’s view on class conflict (economic factors) in society but argued that there could be other dimensions of the conflict as well such as status, power etc. Weber was also skeptical about the inevitability of revolution as forecasted by Marx.  He accepted Marxian logic of explaining conflict and change in terms of interplay of economic forces but criticized Marxist theory as mono-causal economic determinism. Weber argued that the social science methodology should be based on the principle of causal pluralism./वेबर ने आंशिक रूप से समाज में वर्ग टकराव (आर्थिक कारकों) पर मार्क्स के दृष्टिकोण को स्वीकार किया लेकिन तर्क दिया कि दर्जे, शक्ति इत्यादि जैसे मतभेद के अन्य आयाम भी हो सकते हैं | मार्क्स के पूर्वानुमान के अनुसार क्रांति के अनिवार्यता के बारे में वेबर भी उलझन में थे | उन्होंने आर्थिक शक्तियों के परस्पर क्रिया के सन्दर्भ में परिवर्तन व मतभेद को व्याख्या करने के मार्क्सवादी तर्क को स्वीकार किया लेकिन मार्क्सवादी सिद्धांत की एकल-करणीय आर्थिक नियतिवाद के रूप में आलोचना की | वेबर ने तर्क दिया कि सामाजिक विज्ञान प्रणाली को करणीय बहुलवाद के सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए |

 

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