Sociology Online Study Notes | HCS RAS PCS Exam Preparation 2018

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Qualitative and Quantitative Methods-

Sociologists can be identified as:

  • Positivists:

Sociologists who advocated the use of scientific and also quantitative methods. Ex., Auguste Comte, Herbert Spencer, Durkheim etc.

  • Anti-Positivists:

Sociologists who advocated the use of more humanistic and qualitative methods.

गुणात्मक एवं मात्रात्मक विधियाँ

समाजशास्त्रियों को वर्गीकृत किया जा सकता है :

  • प्रत्यक्षवादी :

वे समाजशास्त्री जिन्होंने वैज्ञानिक तथा साथ ही मात्रात्मक विधियों के उपयोग की वकालत की | उदाहरण – आगस्त कॉम्त, हरबर्ट स्पेंसर, दुर्खीम आदि |

  • गैरप्रत्यक्षवादी :

वे समाजशास्त्री जिन्होंने अधिक मानवतावादी तथा गुणात्मक विधियों के प्रयोग की वकालत की |

Quantitative Methods-

Features of Quantitative research in sociology:

  • Comte being a positivist, believed that the scientific study of society should be restricted to collecting information about phenomena that can be objectively observed. He asserted that sociologists should not be concerned with feelings, emotions of people as these only exists in consciousness and they cannot be observed. Durkheim argued that social facts should be treated as ‘things’. It implies that the belief systems, customs and institutions of society should be considered as things in a similar manner as the objects of the natural world.
  • Positivists advocate the use of statistical data. Since it is possible to classify the social world in an objective way, it is also possible to count sets of observable social facts and so produce statistics. For ex., Durkheim collected data on social facts such as the suicide-rate and membership of different religions.
  • Positivist methods tries to establish correlations between different social facts. Durkheim, in his study of suicide, found an apparent correlation between a particular religion, Protestantism and a high suicide rate.
  • The quantitative research methods try to establish causal relationship between variables. If there is a strong correlation between two or more types of social phenomena, then a positivist sociologist might suspect that one of these phenomena was causing the other to take place. Ex., Durkheim, in his study of suicide, explained that low solidarity among the Protestants was the causal factor for high suicide rate amongst them.
  • Generalization- Quantitative methods are concerned with establishing the result of a particular investigation which can be generalized to the larger population. Positivists like Comte, Durkheim believed that just as natural sciences could arrive at universal laws with regard to matter, similarly laws of human behaviour can also be discovered in social sciences.
  • Replicability- Positivism views science as using a mainly inductive methodology. An inductive methodology starts by collecting the data. The data are then analysed and then theories are developed. Once the theory has been developed, it can be tested against other sets of data to see if it is confirmed or not. If it is repeatedly confirmed (replicated), then positivists assume that they have discovered a law of human behaviour.
  • Fred Kerlinger said “There’s no such thing as qualitative data. Everything is either 1 or 0”.

Sociology Online Study Notes
 

 मात्रात्मक विधियाँ-

समाजशास्त्र में मात्रात्मक अनुसंधान की विशेषताएं :

  • एक प्रत्यक्षवादी होने के नाते कॉम्त का यह मानना था कि समाज का वैज्ञानिक अध्ययन उस घटना के बारे में सुचना एकत्रित करने तक सीमित होना चाहिए जो निष्पक्ष रूप से देखी जा सकती है | उन्होंने जोर दिया कि समाजशास्त्रियों को लोगों की भावनाओं से चिंतित नहीं होना चाहिए क्योंकि वे केवल चेतना में मौजूद हैं तथा उन्हें देखा नहीं जा सकता है | दुर्खीम ने यह तर्क दिया कि सामाजिक तथ्यों को “चीजों” के रूप में मानना चाहिए | इसका अर्थ है कि आस्था प्रणालियाँ, रीति-रिवाज तथा समाज के संस्थानों को ऐसी वस्तुएं मानना चाहिए कि मानों वे प्राकृतिक दुनिया की वस्तुएं हों |
  • प्रत्यक्षवादी सांख्यिकीय आंकड़ो के उपयोग की वकालत करते हैं | चूँकि सामाजिक दुनिया को वस्तुओं के रूप में वर्गीकृत करना संभव है, अतः प्रत्यक्ष सामाजिक तथ्यों के समुच्चय की गणना तथा इस प्रकार आंकड़े तैयार करना भी संभव है | उदाहरण के लिए, दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों पर आंकड़ों को इकठ्ठा किया, जैसे कि आत्महत्या-दर तथा विभिन्न धर्मों की सदस्यता |
  • प्रत्यक्षवादी विधियाँ विभिन्न सामाजिक तथ्यों के बीच सह-सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयत्न करती हैं | दुर्खीम ने अपने आत्महत्या वाले अध्ययन में एक विशेष धर्म, प्रोटोस्टेंट धर्म तथा उच्च आत्महत्या दर के बीच एक स्पष्ट सह-सम्बन्ध पाया |
  • मात्रात्मक अनुसंधान विधियाँ चरों के बीच एक करणीय सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास करती हैं | यदि किसी दो या दो से अधिक प्रकारों की  सामाजिक घटनाओं के बीच एक मजबूत सहसंबंध है, तो कोई प्रत्यक्षवादी समाजशास्त्री को यह संदेह हो सकता है कि इनमें से कोई एक घटना दूसरी घटना के होने के कारण पैदा कर रही थी | उदाहरण – दुर्खीम ने अपने आत्महत्या वाले अध्ययन में, यह वर्णन किया कि प्रोटोस्टेंट धर्म वालों की निम्न एकजुटता उनके उच्च आत्महत्या दर की करणीय कारक थी |
  • सामान्यीकरण : मात्रात्मक विधियाँ एक विशेष जांच के परिणाम की स्थापना से सम्बंधित हैं जिसे बड़ी आबादी के लिए सामान्यीकृत किया जा सकता है | कॉम्त तथा दुर्खीम जैसे प्रत्यक्षवादियों का यह मानना था कि जिस प्रकार प्राकृतिक विज्ञान पदार्थ के सम्बन्ध में सार्वभौमिक नियमों तक पँहुच सका, उसी प्रकार सामाजिक विज्ञानों में मानव व्यवहार के भी नियम खोजे जा सकते हैं |
  • प्रतिकृतिता-  प्रत्यक्षवाद विज्ञान को मुख्य रूप से एक प्रेरक कार्यप्रणाली का प्रयोग करते हुए देखता है | एक प्रेरक कार्यप्रणाली आंकड़ों को संगृहित करने से शुरू होती है | इन आकड़ों का तब विश्लेषण किया जाता है तथा फिर सिद्धांत विकसित होते हैं | एक बार जब सिद्धांत विकसित हो गया हो, तो यह आकड़ों के अन्य समुच्चयों के साथ भी यह देखने के लिए जांचा जा सकता है कि यह पुष्टिकृत है या नहीं | यदि यह बार बार पुष्टिकृत (प्रतिरूपित )  होता है, तो प्रत्यक्षवादी यह मान लेते हैं कि उन्होंने मानव व्यवहार के एक नियम की खोज की है |
  • फ्रेड कर्लिंगर ने कहा था “गुणात्मक डाटा जैसी कोई चीज नहीं है | हर चीज या तो है या”  

Qualitative Methods-

  • Qualitative research includes study of the social world which seeks to describe and analyse the culture and behaviour of humans and their groups from the point of view of those who are being studied.
  • The qualitative data is richer, more vital having greater depth and more likely to present a true picture of a way of life, of people’s experiences, attitudes and beliefs.
  • Participant observation, unstructured interview, focus group discussion, case study are major techniques of data collection in qualitative research.

Features of qualitative research in sociology:

  • Qualitative research describes social reality, i.e., it views events, actions, norms, values etc from the perspective of the people being studied.
  • It prefers contextualism to understand events, behaviour etc. in their respective context. It is almost inseparable from another theme in qualitative research namely ‘holism’ – to examine social entities as wholes to be analysed and understood in their entirety.
  • Qualitative research views social life in processual, rather than static terms. It implies social order is interconnected and changing which reflects the reality of everyday life.
  • Qualitative researchers favour open and unstructured research strategy. It provides them flexibility to view unexpectedly important topics and increase their scope of study.

गुणात्मक विधियाँ-

  • गुणात्मक अनुसंधान में सामाजिक दुनिया का अध्ययन शामिल है जो अध्ययन किये जा रहे लोगों के दृष्टिकोण से मनुष्यों तथा उनके समूहों की संस्कृति तथा व्यवहार को परिभाषित एवं विश्लेषित करने का प्रयास करता है |
  • गुणात्मक आंकड़े प्रचुर, अधिक महत्वपूर्ण तथा अधिक गहराई वाले होते हैं तथा उनमें जीवन व्यतीत करने के तरीके, लोगों के अनुभव, विचार तथा आस्था की सच्ची तस्वीर पेश करने की अधिक संभावना होती है |
  • सहभागी अवलोकन, असंरचित साक्षात्कार, केन्द्रित सामूहिक चर्चा, केस स्टडी,  आदि गुणात्मक अनुसंधान में आंकड़े संगृहित करने की प्रमुख तकनीकें हैं |

समाजशास्त्र में गुणात्मक अनुसंधान की विशेषताएं :

  • गुणात्मक अनुसंधान समाज की वास्तविकता को बयां करता है | अर्थात् यह घटनाओं, क्रियाओं, नियमों, मूल्यों, आदि को अध्ययन किये जा रहे लोगों की दृष्टिकोण से देखता है |
  • यह उनके संबंधित संदर्भ में घटनाओं, व्यवहार आदि को समझने के लिए सन्दर्भवाद को पसंद करता है। यह गुणात्मक अनुसंधान में एक और विषय साकल्यवाद से लगभग अविभाज्य है | सकल्यवाद – सामाजिक संस्थाओं की   उनकी समग्रता में समष्टियों के रूप में विश्लेषित करने तथा समझने हेतु जांच करना |
  • गुणात्मक अनुसंधान सामाजिक जीवन को स्थिर के बजाय प्रक्रियात्मक रूप में देखते हैं | इसका अर्थ है कि सामाजिक क्रम परस्पर जुड़े हुए हैं तथा परिवर्तित हो रहे हैं, जो हर रोज के जीवन की वास्तविकता को दर्शाता है |
  • गुणात्मक शोधकर्ता खुली और असंरचित अनुसंधान रणनीति का समर्थन करते हैं। यह उन्हें अप्रत्याशित रूप से महत्वपूर्ण विषयों को देखने और अध्ययन के क्षेत्र में वृद्धि करने के लिए लचीलापन प्रदान करता है।

Combination of both Approaches-

Some sociologists have advocated combining both quantitative and qualitative methodology.

Alan Bryman has suggested some ways in which a plurality of methods (a practice known as triangulation) can be useful.

  • Quantitative and qualitative data can be used to check the accuracy of the conclusions drawn on the basis of each of them.
  • Qualitative research can be used to produce hypotheses which can then be checked using quantitative methods.
  • Both of them can be used together to produce a complete picture of the social group being studied.
  • Qualitative research may be used to explain why certain variables are statistically correlated. Ex., Durkheim, in his study of suicide, concluded that the rate of suicide varies from religion to religion because of their varying degree of solidarity.
  • Bryman believes that neither quantitative nor qualitative research can produce totally valid and completely reliable data, but both can provide useful insights into social life. Quantitative data tends to produce rather static pictures, but it can allow researchers to examine and discover overall patterns and structures in a society as a whole. Qualitative data allow in-depth understanding of the process of change in social life.

दोनों दृष्टिकोणों का संयोजन-

कुछ समाजशास्त्रियों ने मात्रात्मक तथा गुणात्मक दोनों पद्धतियों को संघटित करने की वकालत की है |

एलन ब्रायमैन ने कुछ तरीके सुझाए हैं जिसमें विधियों की अनेकता ( एक पद्धति जिसे त्रिभुजन के नाम से जाना जाता है ) उपयोगी हो सकती है |

  • मात्रात्मक तथा गुणात्मक आंकड़े उनमें से प्रत्येक के आधार पर निकाले गए निष्कर्षों की सटीकता को जांचने हेतु उपयोग किये जा सकते हैं |
  • गुणात्मक अनुसंधान का इस्तेमाल परिकल्पना का निर्माण करने के लिए किया जा सकता है, जिसे फिर मात्रात्मक  विधियों का उपयोग करके जांचा जा सकता है |
  • दोनों का उपयोग एकसाथ अध्ययन किये जाने वाले सामाजिक समूह की पूरी तस्वीर का निर्माण करने के लिए किया जा सकता है |
  • गुणात्मक अनुसंधान का इस्तेमाल यह बताने के लिए किया जा सकता है कि क्यों कुछ चर सांख्यिकीय रूप से सहसम्बद्ध होते हैं | उदाहरण – दुर्खीम ने अपने आत्महत्या वाले अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला कि एकजुटता के परिमाण में भिन्नता होने के कारण एक धर्म से दूसरे धर्म की आत्महत्या दर में भिन्नता पायी जाती है |
  • ब्रायमैन यह मानते हैं कि ना तो मात्रात्मक ना ही गुणात्मक अनुसंधान पूर्ण रूप से मान्य तथा भरोसेमंद आंकड़े का निर्माण कर सकता है, किन्तु दोनों सामाजिक जीवन में उपयोगी अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकते हैं | मात्रात्मक आंकड़े कुछ कुछ स्थिर तस्वीर का निर्माण करते हैं किन्तु ये अनुसंधानकर्ताओं को एक समष्टि के रूप में किसी समाज में सभी प्रारूपों एवं संरचनाओं की जांच तथा खोज करने की अनुमति देते है | गुणात्मक आंकड़े सामाजिक जीवन में परिवर्तन की प्रक्रिया को गहराई से समझने में सहायता करते हैं |

 

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