Religious Cult Part 1 I Rajasthan Art and Culture I Rajasthan GK I RAS

Religious Cult Part 1 I Rajasthan Art and Culture I Rajasthan GK I RAS

Religious Cult Part 1 I Rajasthan Art and Culture I Rajasthan GK I RAS

Religious Cult Part 1 I Rajasthan Art and Culture I Rajasthan GK I RAS

Religious Cult Part 1 I Rajasthan Art and Culture I Rajasthan GK I RAS

  • Since ancient times, the society of Rajasthan has been influenced by religious sentiments. Here reside the people of almost all the major religions.
  • Here people believe in both  Saguna and Nirguna worship. In the Saguna Bhakti section, Shaiva and Shakta etc. have been practiced since ancient times.
  • Later, Ramanujacharya, Vallabhacharya, Nimbakacharya etc. Saints  started flow of Vaishnavism in the country, Rajasthan was not left behind  and here also the main branches of Vaishnavism – Pushtimaarg, Nimbarka and Gaudya Sampradaya etc. flourished.
  • प्राचीन समय से ही राजस्थान का समाज धार्मिक भावनाओं से अनुप्रमाणित रहा है। यहाँ लगभग सभी प्रमुख धर्मों व सम्प्रदायों के मतावलम्बी पाये जाते हैं।
  • यहाँ सगुण एवं निर्गुण दोनों प्रकार की उपासना पद्धति की अविरल धारा प्रवाहित है। सगुण भक्ति धारा में शैव, शाक्त आदि सम्प्रदाय यहाँ प्राचीन काल से ही पल्ल्वित रहें है
  • वहीं बाद में रामानुजाचार्य, वल्ल्भाचार्य, निम्बकाचार्य आदि संत मनीषियों ने देश में वैष्णव धर्म की सरिता बहाई जिससे राजस्थान भी अछूता नहीं रहा और यहाँ भी वैष्णव मत की मुख्य शाखाएँ-पुष्टिमार्ग, निम्बार्क व गौडीय सम्प्रदाय आदि फले-फुले।

PDF : Religious Cult Part 1

Religious cults Part - 1
  • In the medieval period, along with the Saguna Bhakti section of the Bhakti movement (Ramananda, Ballabh, Nimbark community) another devotional stream flowed in the country.
  • Which showed the simple and straightforward way of worshiping the Nirakar Brahma to the people, and who gave equal rights to all people to worship God by eliminating discrimination,  untouchability, etc. in the society.
  • This infinite section of devotion is called a section of Nirgun Bhakti because it was worshiped as shapeless , in which God was worshiped as nirguna(no form).
  • मध्य काल में भक्ति आंदोलन की सगुण भक्ति धारा (रामानन्द, बल्लभ, निम्बार्क सम्प्रदाय) के साथ साथ एक अन्य भक्ति रस धारा देश में प्रवाहित हुई।
  • जिसने जन-जन को निराकार  ब्रह्मा की उपासना का सीधा व सरल मार्ग दिखाया तथा जिसने समाज में व्याप्त भेदभाव, ऊँच-नीच, छुआ-छूत आदि को समाप्त कर सभी लोगों को भगवत भक्ति का समान अधिकार दिया।
  • भक्ति रस की यह अविरल धारा निर्गुण भक्ति की धारा कहलायी क्योंकि इसमें परमात्मा को निराकार, निर्गुण मानकर उसकी आराधना की जाती थी।

  • It completely opposed idol worship and rituals, and gave the message of brahma being entrenched in every particle.
  • The proponents of this devotional path have tried to overcome  caste-based discrimination and put the sense of welfare of the human beings in mind, to remove the disorders in the religion.
  • It explained the path of worship of God, kirtan, meditation, remembrance  to reach God.
  • In the 15th century and later in Rajasthan, there was an emergence of many Nirguna saints, who paved the way for the welfare of the common people through their teachings.
  • The devotees  Kabir, Nanak, Jambhoji, Jasnathji, Daduji, Ramacharanji etc. rendered the Nirguna Bhakti Marg during this period.
  • इसने मूर्ति पूजा एवं कर्मकाण्डों का पूर्ण रूप से विरोध किया तथा उस अमूर्त परब्रहा के कण-कण में व्याप्त होने का संदेश दिया।
  • इस भक्ति मार्ग के प्रवर्त्तकों ने जाति-पाँति के भेदभावों से ऊपर उठकर मनुष्य मात्र के कल्याण की भावना मन में रखकर धर्म में पैदा हुए विकारों को दूर करने का प्रयास किया।
  • इन्होने भजन, कीर्तन, मनन, नाम-स्मरण एवं गुरु-सानिध्य को ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बताया।
  • 15वीं शताब्दी एवं उसके उपरांत राजस्थान में अनेक निर्गुणी संत सम्प्रदायों का आविर्भाव हुआ जिन्होंने अपने उपदेशों एवं शिक्षाओं द्वारा सामान्य जन के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया।
  • कबीर, नानक, जाम्भोजी, जसनाथजी, दादूजी, रामचरणजी आदि संतों ने इस काल में निर्गुण भक्ति मार्ग का प्रतिपादन किया।  

Saguna devotion section: –

Shaivism: –

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  • Lord Shiva worshipers are called Shaiva. The worship of Shiva has been happening since ancient times.
  • From Kalibanga, indus valley civilization and other excavations, it is known that at that time also Shiva was worshiped in some form.
  • During the medieval period, the incarnation of the four sects – Kapalika, Pashupat, Lingayat or Veer Shaiva  had fallen. There has also been a lot of expansion in the state of the Kapalika and Pashupaat communities.
  • In the Kapalik community, Bhairav ​​is worshiped as an incarnation of Shiva.

सगुण भक्ति धारा :-

शैव सम्प्रदाय :-

  • भगवान शिव की उपासना करने वाले शैव कहलाते हैं। शिव की पूजा अति प्राचीनकाल से होती रही है।
  • कालीबंगा, सिंधुघाटी सभ्यता एवं अन्य उत्खननों से ज्ञात हुआ है कि उस समय भी किसी रूप में शिव की पूजा होती थी।
  • मध्यकाल तक शैव मत चार सम्प्रदायों- कापालिक, पाशुपत, लिंगायत या वीर शैव एवं कश्मीरक का आविर्भाव हो चूका था। कापालिक एवं पाशुपात सम्प्रदायों का राजस्थान में भी काफी विस्तार हुआ।
  • कापालिक सम्प्रदाय में भैरव को शिव का अवतार मानकर पूजा की जाती है।
  • Tantrics  of this community wrap  their body with ash.
  • The main characteristic of this is the Surapaan, narbali etc. laculish has been considered the liberator of the Pashupat community The saints of this community often bath during the day, take dand in their hands, and worship Shiva several times a day.

Nath Samarthya: –

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  • A new form of Shaivism originated in the medieval period as the Nath sect .Nath Muni is believed to be  Its promoter.
  • Matsyendra Nath, Gopichandahtara, Bhartrihari, Gorakhnath etc. were the chief monks of this sect, who are still worshipped in many places in Rajasthan.
  • इस सम्प्रदाय के साथ तांत्रिक व श्मशान वासी होते है और अपने शरीर पर भस्म लपेटते हैं।
  • सुरापान, मुण्डमाल, नरबलि  आदि इनके मुख्य लक्षण हैं। पाशुपत सम्प्रदाय का प्रवर्त्तक दंडधारी लकुलीश को माना गया है। इस सम्प्रदाय के साधु दिन में कई बार स्नान करते हैं, हाथ में दण्ड धारण करते हैं तथा दिन में कई बार शिव पूजा करते हैं।

नाथ सम्प्रदाय :-

  • नाथ पंथ के रूप में शैव मत का एक नवीन रूप पूर्व मध्यकाल में उद्भूत हुआ। इसके प्रवर्तक नाथ मुनि माने जाते हैं।
  • मत्स्येन्द्र नाथ, गोपीचन्दहर्तृ, भर्तृहरि,गोरखनाथ आदि इस पंथ के प्रमुख साधु हुए जिनकी आराधना आज भी राजस्थान में कई जगह होती है।
  • Jodhpur is an important center for the Nath sect. Rathore ruler Mansingh had become the follower of Nath guru Ayes Devanath . There are two branches of Nath sect in Rajasthan-
  • 1. Beraag cult: – Its center is near Rathadunga near Pushkar.
  • 2. Mannathi sect: – Its main center is Jodhpur’s great palace built by Maharaja Mansingh.

Shaakt sect: –

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  • Shaakts worship Durga in various forms. Ancient excavations have found evidence that the worship of the Goddess in the form of maternal power was also prevalent at that time. Shakti has been worshiped in various names and forms in all the regions of Rajasthan.
  • जोधपुर नाथ सम्प्रदाय का महत्वपूर्ण केंद्र रहा हैं। यहाँ के राठौड़ शासक मानसिंह तो नाथ मत के गुरु आयस देवनाथ के अनुनायी हो गए थे। राजस्थान में नाथ मत की दो शाखाएँ हैं-
  • 1. बेराग पंथ :- इसका केंद्र पुष्कर के पास राताडुँगा है।
  • 2. माननाथी पंथ :- इसका मुख्य केंद्र जोधपुर का महामंदिर है जो महाराजा मानसिंह ने बनवाया था।

शाक्त सम्प्रदाय :-

  • शाक्त मतावलम्बी शक्ति (दुर्गा) की पूजा विभिन्न रूपों में करते हैं। प्राचीन उत्खननों से प्रमाण मिले है कि मातृ शक्ति के रूप में देवी की पूजा उस समय भी प्रचलित थी। राजस्थान के सभी भूभागों में शक्ति की पूजा विविध नामों एवं रूपों में होती रही है।
  • The rulers here adopted different forms of  Goddess as their ancestral goddess, and built many  temples.

Vaishnava sect: –

  • Vishnu is considered as a devoted lord and worshippers are known  as Vaishnava. Vaishnavas were against the complex rituals and the horrific acts of animal sacrifice and did not regard them as a supporter in finding God.
  • In this community, devotion, kirtan, dance etc. were given priority for getting God. In the South India, the devotees-  Aalvaar saints had a great contribution in activating the Vaishnava Bhakti movement.
  • यहाँ के शासकों ने देवी के विभिन्न रूपों को अपने कुल की आराध्य देवी के रूप में अपनाया और इनके अनेकानेक मंदिरों का निर्माण करवाया।

वैष्णव सम्प्रदाय :-

  • विष्णु को प्रधान देव मानकर उसकी आराधना करने वाले वैष्णव कहलाये। वैष्णव मतावलम्बी जटिल कर्मकांड तथा भयावह नरबलि एवं पशुबलि की क्रियाओं के विरोधी थे तथा इन्हें ईश्वर की प्राप्ति में सहयोगी नहीं मानते थे।
  • इस सम्प्रदाय में ईश्वर प्राप्ति हेतु भक्ति, कीर्तन, नृत्य आदि को प्रधानता दी गई। दक्षिण भारत में वैष्णव भक्ति आंदोलन को सक्रिय करने में तमिल के आलवार संतों का योगदान रहा।

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