RAS GK Exam Preparation : Ancient Civilization of Rajasthan Notes | Part 3

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Rajasthan Art and Culture –

Ganeshwar

  • In the north-eastern region of Rajasthan, at a distance from Neem ka Thana town of Sikar district, at a place called Ganeshwar, copper age equipments  have been found in a large quantity, from the excavation of the Kantali river.
  • This is the first time that so many copper equipments have been found at any place in India.
  • The fishing thorns, etc., are the main ones. By getting copper from copper mines in Khetri nearby, copper tools were made.
  • From here, they were exported to places like Pakistan, Haryana and Punjab, as there  also similar equipments have been found.
  • Archaeologists have called this civilization a pre-Harappan-style copper civilization, which was developed from 3000-2800 BC.
  • This is the oldest civilization in the copper age civilization.
  • In Ganeshwar, excavation was done in the year 1977-78 under the guidance of Shri Ratnachandra Agarwal and Vijay Kumar.
  • Ganeshwar civilization is also called copper-cumulative culture.
  • copper-pin is  an important item found from the excavation of Ganeshwar.
  • A similar type of 3000 BC  Pin is found in Western and Central Asia also.
  • Probably these pins were exported from Ganeshwar.
  • Remains of two types of culture have been found in the excavation of Ganeshwar.
    • Pottery of former Harappan culture
    • Culture and sculpture utensils of ancient Rajasthan
  • All these utensils are mainly of 6 types – martbaan, kalash, tasle, pyale, lid and handi.
  • Many utensils were square, cyclical and ring shaped.
  • The clay pot is found only in Ganeshwar.
  • Other such evidence have not been found in any other copper-stone age civilization.
  • People of Ganeshwar civilization used to raise cattle, cattle, sheep, goats, pigs, dogs, donkeys, poultry etc.
  • They were also non-vegetarians. 

राजस्थान कला और संस्कृति –

गणेश्वर

  • राजस्थान के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में सीकर जिले के नीम का थाना कस्बे से कुछ दूरी पर गणेश्वर नामक स्थान पर काँतली नदी के एक टीले  के उत्खनन से ताम्रयुगीन उपकरण -कुहाड़े आदि बड़ी मात्रा में मिले हैं।
  • भारत में किसी स्थान पर एक साथ इतने ताम्र  उपकरण प्रथम बार मिले हैं।
  • इनमे मछली पकड़ने के काँटे, आदि प्रमुख हैं। पास  में खेतड़ी में तांबे की खानों से ताम्बा प्राप्त कर इसके  उपकरण बनाये जाते थे।
  • यहाँ से इनका निर्यात पकिस्तान, हरियाणा, पंजाब आदि स्थानों को किया  जाता होगा क्यूंकि वहाँ भी इस प्रकार के उपकरण मिले
  • पुरातत्विदों ने इस सभ्यता को पूर्व हड़प्पा कालीन ताम्रयुगीन सभ्यता कहा है, जो 3000-2800 ई. पूर्व विकसित  हुई थी।
  • यह ताम्रयुगीन संस्कृतियों में सबसे प्राचीन सभ्यता है।
  • गणेश्वर  में श्री रत्नचन्द्र  अग्रवाल व विजय कुमार के निर्देशन में वर्ष 1977-78 में खुदाई की गयी।
  • गणेश्वर सभ्यता को ताम्र-संचयी संस्कृति भी कहते हैं।
  • गणेश्वर के उत्खनन से प्राप्त दोहरी पेचदार शिरेवाली ताम्रपिन इसकी विशिष्टता है।
  • इसी प्रकार की 3000 ई.  पूर्व की पिन पश्चिमी तथा मध्य एशिया में भी मिली है।
  • संभवतः गणेश्वर से इन पिनों का निर्यात वहां किया जाता होगा।
  • गणेश्वर के उत्खनन से दो प्रकार की संस्कृति के अवशेष मिले हैं।
    • पूर्व हड़प्पाकालीन संस्कृति के बर्तन
    • प्राचीन राजस्थान की संस्कृति व शिल्पकला के बर्तन
  • ये सभी बर्तन मुख्यतः 6 प्रकार के हैं – मर्तबान, कलश, तसले, प्याले, ढक्कन एवं हांडी थे।
  • कई बर्तन चौरस, चक्रिक एवं छल्लेदार आकार के पाए गए हैं।
  • मिट्टी के छल्लेदार बर्तन केवल गणेश्वर में ही प्राप्त हुए हैं।
  • अन्य किसी भी ताम्र पाषाणकालीन सभ्यता में इनके प्रमाण नहीं मिले हैं।
  • गणेश्वर सभ्यता के लोग गाय, बैल, भेड़, बकरी, सूअर, कुत्ता, गधे, मुर्गे आदि पशुओं को पालते थे।
  • ये मांसाहारी भी थे।  

Rangmahal

  • It is located in Hanumangarh district near the ancient Saraswati (present Ghaghar) river, where under the direction of Dr. Hannarid, excavation was done by a Swedish Expedition Team in 1952-54.
  • Here the remains of Kushan period and Pre-Gupta culture have been found, which flourished from the 1st century BC to 300 AD.
  • Various sculptures found here are known to be of  Gandhar style.
  • Among the Idols thers is a idol of disciple and teacher.
  • The pottery were particularly red or pink.
  • Here metal tools and ornaments have also been found, in which there are items of   bronze like bajuband, tabeej, hatthe etc.
  • In iron equipments, there are hatthe, kabje,  rings, dantaliya, spears, bells, hooks, lamps.
  • Here a total of 105 copper coins have been found which are of Kushan period or from the previous period, which have some punch marks.
  • Some are of the period of Kanishka -first and Kanishka-III.
  • Two bronze seals have also been found, which have been written in Brahmi script, which is estimated of around 300 AD.
  • The inhabitants here used to specially cultivate rice. This was their main meal.
  • They probably ate buffalo, pigs, birds and fish meat.
  • There were also temples in RangMahal.
  • Devotees of Matradevi, Shiva and Krishna were found principally here.
  • Playing dancing and gambling has been a part of their life.
  • In the places of Hanumangarh district,  in places like Badapol, ‘Dabri’ , etc., similar materials of archeological importance have been found in excavation. 

रंगमहल

  • यह हनुमानगढ़ जिले में प्राचीन सरस्वती (वर्तमान घघर) नदी के पास स्थित है, जहाँ डॉ.हन्नारीड के निर्देशन में एक स्वीडिश एक्सपिडिशन दल द्वारा 1952-54 ई. में खुदाई की गयी।
  • यहाँ कुषाणकालीन एवं पूर्वगुप्तकालीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी से ३०० ई. तक पनपी थी।
  • यहाँ मिली हुई  विभिन्न मूर्तियां गांधार शैली की मालूम होती हैं।
  • मूर्तियों में एक मूर्ती शिष्य और शिक्षक की है।
  • यहाँ के मृदभांड विशेषतःलाल या गुलाबी रंग के थे।
  • यहाँ धातु के उपकरण व आभूषण भी प्राप्त हुए हैं जिसमे कांसे की वस्तुओं के बाजूबंद, ताबीज, हत्थे आदि हैं।
  • लौहे के  उपकरणों में हत्थे, कब्जे, अंगूठियाँ,  दाँतलियाँ, भाले, घण्टियाँ, हुक, दीपक मिले हैं।
  • यहाँ कुषाण कालीन   उससे पिछले काल की कुल 105 ताम्बे की मुद्राएँ  हैं, जिनमे कुछ पंच-मार्क हैं।
  • कुछ कनिष्क प्रथम और कनिष्क तृतीय के काल की हैं।
  • दो कांसे की सीलें भी मिली हैं, जिन पर ब्राह्मी लिपि में नाम अंकित हुए हैं, जो 300  ई. के लगभग की आँकी गयी है।
  • यहाँ के निवासी विशेष रूप से चावल की खेती करते थे। यही उनका मुख्य भोजन था।
  • वे संभवतः भैंसे, सूअर, पक्षी तथा मछली का माँस खाते थे।
  • रंगमहल में मंदिर भी थे।
  • मातृदेवी, शिव तथा कृष्ण की भक्ति यहाँ प्रधान रूप से पाई जाती थी ।
  • नाचना और जुआ खेलना उनके जीवन का एक अंग रहा है।
  • हनुमानगढ़  जिले की ही बड़ापोल, ‘डाबरी’  अादि स्थानों पर भी उत्खनन में इसी प्रकार के पुरातात्विक महत्त्व की सामग्रियां उपलब्ध हुई हैं।
  • वे संभवतः भैंसे, सूअर, पक्षी तथा मछली का माँस खाते थे।
  • रंगमहल में मंदिर भी थे।
  • मातृदेवी, शिव तथा कृष्ण की भक्ति यहाँ प्रधान रूप से पाई जाती थी ।
  • नाचना और जुआ खेलना उनके जीवन का एक अंग रहा है।
  • हनुमानगढ़  जिले की ही बड़ापोल, ‘डाबरी’  अादि स्थानों पर भी उत्खनन में इसी प्रकार के पुरातात्विक महत्त्व की सामग्रियां उपलब्ध हुई हैं।  

Noah

  • The remains of five civilizations have been found in excavation at Noh on the Agra Road, 6 km from Bharatpur.
  • Here the remains of black and red utensils have been found.
  • In later levels, copper coins and Kushanas and Mauryan  era remains were found.
  • It is known from the objects obtained from here that iron was used in the 12th century BC.
  • Here  the remains of three types of structures made of clay bricks have been found.
  • There is evidence of the use of pucca  bricks in all levels.
  • Here, excavation was conducted in 1963-67 by the Directorate of Archaeological Survey of Rajasthan Government, joint director of the University of California, Dr. Davidson and Mr. Ratnachandra Agrawal.

नोह

  • भरतपुर से 6 किमी दूर आगरा रोड पर स्थित नोह स्थान पर की गयी खुदाई में पाँच सांस्कृतिक युगों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • यहाँ काले व लाल रंग के पात्रों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • बाद के स्तरों में ताम्बे के सिक्के तथा कुषाणकालीन एवं मौर्यकालीन अवशेष मिले हैं।
  • यहाँ से प्राप्त वस्तुओं से ज्ञात हुआ है की ईसा  पूर्व 12 वीं शताब्दी में यहाँ लोहे का प्रयोग होता था।
  • यहाँ मिट्टी की ईंटों से बने तीन प्रकार के ढांचों के अवशेष मिले हैं।  
  • सभी स्तरों में पकी  हुई ईंटों का प्रयोग होने के प्रमाण है।

यहाँ 1963-67 में राजस्थान सरकार के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के डॉ. डेविडसन और श्री श्री रत्नचन्द्र अग्रवाल के संयुक्त निर्देशन में उत्खनन करवाया गया था।

Bairath

  • The excavation work on the hill of the beejak, Bhimji’s Dungari and Mahadev ji’s  Dungri, etc., was done for the first time by Dayaram Sahni in 1936-37 and again in 1962-63 by the archaeologist Nilratna banerjee and kailashnath dikshit in the capital city of Viratnagar (present-day Bairath, District- Jaipur) .
  • Remains of the Mauryan and its pre-civilizations were found in excavation.
  • Here coins and punchmark currency have been found tied in cotton cloth.
  • A large amount of archaeological material has been received from this area.
  • Iron tools have also been found here.
  • In 1999, the remains of the Ashoka era Buddhist temple and Buddhist stupas and remains of Buddhist monastery were found in the hill of the beejak, which is related to the Hinayana sect.
  • In the second level excavation, there is info. of cultures using gray paintings on pottery.
  • In the third level found in excavation, there are found remains of the earliest centuries AD.
  • Here are many iron tools, including nails, and many other iron tools etc.
  • The time of these items has been detrmined as  250 BC to 50 BC.
  • Apart from this, there are also remains of medieval culture.
  • In the year 1937, two pillar articles/edicts of Emperor Ashoka engraved in the Brahmi script  have been found from the Bhabru hill, which were of Ashoka’s Buddha, Dama and unfounded loyalty in the Sangh.
  • China’s famous traveler Hiuen Tsang  also possibly came here around 634 AD, during his visit.
  • He wrote that there are 8 Buddhist monasteries.
  • This town has been mentioned several times in the Mahabharata by the name of Viratnagar.
  • The Pandavas had spent the last days of their agyatwas at the King Viraat palace of the Matasya janpad.
  • In the same way, the Bairath is also witness to the remnants of Mauryan and post moryan periods.
  • It is said that Mughal Emperor Akbar used to rest at night here during his journey of Ajmer.
  • Bricks of different sizes have been obtained from the excavation of Bairath.
  • They were used in the construction of chabutaras, maths, stoopas and temples .
  • The dimensions of most of the bricks are 78*40*8.
  • Pucca tiles were laid on the floor.
  • It is important that despite excessive stones near Bairath,  bricks have been used more.
  • These bricks are similar to those of  Mohenjodaro.
  • 36 silver coins are found in excavated rooms.
  • 8 are punch marked. The remaining 28 coins are of Greek and Indo-Greek rulers.
  • The cloth on which the coin was tied, the cloth was of hand-woven cotton.
  • So, It is known that the inhabitants of this town knew the art of weaving.
  • The second place here was ‘Balathal’.
  • In the middle of the city of Virat, Akbar opened a mint.
  • Copper coins were minted here, during the reign of Akbar, Jahangir and Shahjahan.
  • Here a Mughal Garden, Idgah and some other buildings were also built.
  • Of these, the door of Mughal Garden is worth a visit.
  • Located in the south-eastern corner of the bairath, the Beejak mountain is made of gray stone rocks.
  • Two of the 8 Buddhist monasteries described by Hiuen Tsang were located on this hill.
  • The two pillars of these monasteries are  on this hill.

बैराठ

  • प्राचीन मतस्य जनपद की राजधानी विराटनगर (वर्तमान – बैराठ, जिला- जयपुर) में बीजक की पहाड़ी,  भीमजी की डूँगरी तथा महादेव जी की डूँगरी आदि स्थानों पर उत्खनन कार्य प्रथम बार दयाराम साहनी द्वारा 1936-37  में तथा पुनः 1962-63 में पुरातत्वविद नीलरत्न बनर्जी तथा कैलाशनाथ दीक्षित द्वारा किया गया।
  • खुदाई करने पर मौर्यकालीन एवं उसके पूर्व की सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं।
  • यहाँ सूती कपड़े में बँधी मुद्राएँ व पंचमार्का सिक्के मिले हैं।
  • इस क्षेत्र से पुरातात्विक सामग्री का विशाल भण्डार प्राप्त हुआ है।
  • यहाँ लौह उपकरण भी प्राप्त हुए हैं।
  • 1999 में बीजक की पहाड़ी से अशोक कालीन गोल बौद्ध मंदिर एवं बौद्ध स्तूप एवं बौद्ध मठ के अवशेष मिले हैं, जो हीनयान सम्प्रदाय से सम्बन्धित है।
  • दुसरे स्तर की खुदाई में यहाँ चित्रित स्लेटी मृदभांड का प्रयोग करने वाली संस्कृतियों  का ज्ञान हुआ है।
  • खुदाई  में मिले तीसरे स्तर में यहाँ इसा  की प्रारंभिक शताब्दियों की संस्कृति के अवशेष मिले हैं।
  • यहाँ मंदिर के किवाड़ों में लगी कीलें, कब्जे आदि सहित कई लौह उपकरण आदि  प्राप्त हुए हैं।
  • इन वस्तुओं का समय 250 ई. पूर्व से 50 ई. पूर्व निर्धारित किया  गया है।
  • इसके  अलावा यहाँ मध्ययुगीन संस्कृति के अवशेष भी मिले हैं।
  • सन 1937  में भाब्रु पहाड़ी से सम्राट अशोक के ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण दो प्रस्तर लेख (स्तम्भ लेख) भी प्राप्त  हुए हैं, जिनसे अशोक की बुद्ध, धम्म और संघ में अगाध निष्ठा लक्षित होती है।
  • चीन का प्रसिद्ध यात्री ह्यूएन त्सांग  भी संभवतः सन 634 ई. के लगभग अपनी यात्रा के दौरान यहाँ आया था।
  • उसने यहाँ बौद्ध मठों की संख्या 8 लिखी थी।
  • इस कसबे का विराटनगर नाम से महाभारत में कई  बार उल्लेख हुआ है।
  • मतस्य  जनपद के राजा विराट के यहाँ पांडवों ने अपने अज्ञातवास के अंतिम दिन व्यतीत किये थे।
  • वैसे बैराठ मौर्यकाल और मौर्योत्तर काल  के अवशेषों का भी साक्षी रहा है।
  • कहा जाता है की मुग़ल सम्राट अकबर अजमेर की यात्रा के दौरान यहाँ रात्रि विश्राम  करता था।
  • बैराठ के उत्खनन से अलग- अलग आकार की ईंटें प्राप्त हुई हैं।
  • इनका उपयोग चबूतरों, मठों, स्तूपों, तथा मंदिरों को बनवाने में किया गया था।
  • अधिकांश ईंटों की लम्बाई, चौड़ाई तथा मोटाई 78*40*8 है।
  • फर्श पर पक्की टाइलें लगी थी।
  • यह महत्त्वपूर्ण है की बैराठ के पास पत्थर अत्यधिक पाए जाने पर भी यहाँ ईंटों  का प्रयोग अधिक किया गया है।
  • ये ईंटें मोहनजोदड़ो से मिलती-जुलती हैं।
  • उत्खनित कमरों से 36 चाँदी की मुद्राएँ मिली हैं।
  • इसमें 8 पंचमार्क हैं। शेष 28 मुद्राएं यूनानी और भारतीय-यूनानी शासकों की हैं।
  • जिस कपडे पर में मुद्रा बंधी हुई मिली है, यह कपड़ा हाथ से बुनी  हुई रुई का था।
  • इससे विदित  होता है कि यहाँ के निवासी वस्त्र-बुनाई कला को जानते थे।
  • इसी प्रकार का दूसरा स्थल ‘बालाथल’ था।
  • विराट नगर के मध्य में अकबर ने एक टकसाला खोली  थी।
  • इस टकसाला में  अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ के काल में ताँबे के सिक्के ढाले जाते थे।
  • यहाँ एक मुग़ल गार्डन, ईदगाह तथा कुछ अन्य इमारतें  भी बनवायी गई थी।
  • इनमे से मुग़ल गार्डन  का दरवाजा आज भी दर्शनीय है।
  • बैराठ के दक्षिण पूर्वी कोने में स्थित बीजक की पहाड़ी विशालाकार स्लेटी प्रस्तर खडों से निर्मित है।
  • ह्यूएन त्सांग द्वारा वर्णित 8 बौद्ध मठों  में से 2 मठ इस पहाड़ी पर स्थित थे।
  • इन मठों के दो चबूतरे इसी पहाड़ी पर बने हुए हैं। 

Other archaeological sites

Bagor –

  • This archaeological site located on the banks of Kothari river in Mandal tehsil of Bhilwara district has been excavated from 1966-68 to 1969-70, under the auspices of the Rajasthan State Archaeological Department and Deccan College, Pune, where the medieval age stone tools and items are obtained.

Nagari (Chittorgarh)

  • The excavation of Nagari (ancient Madhyamika) 13 km from Chittorgarh was first done by Dr Bhandarkar in 1904 and again by Central Archeology Department in 1962-63.
  • Here coins of Shivi janpad are found, which prove that this area was under shivi janpad.
  • There are also remains of Gupta era art.

Jodhpura (Jaipur)

  • Khudai village  on the banks of Sabi river of Jodhpura village of Kotputli tehsil of Jaipur was excavated in 1972-73 by the Rajasthan Archaeology Department.
  • From the excavation here, the remains of Shangu and Kushan era civilization have been found in the final level and furnaces of iron making equipment have also been found.
  • Here in various levels, things have been found from 2500 B.C. to the second century AD. 

Sunaari (Khetri-jhunjhunu):

  • The site was excavated in 1980-81 by Rajasthan State Archeology Department.
  • In the excavation here, the oldest furnaces of making iron have been found.
  • Iron weapons and utensils have also been found here.
  • These people used rice and were dependent on hunting and agriculture.

Tilwara

  • Based on the bank of the Luni river of Barmer district, the remains of civilizations developed  from 500 to 200 AD have been found in the period.It was excavated in the year 1967-68 by Rajasthan State Archeology Department.

 

 

Raidh (Tonk)

  • In this village situated on the banks of the river Dhil  in Niwai Tahsil, the remnants of the former Gupta civilization have been found.
  • A huge reservoir of iron materials was found here.
  • It is called ‘Tatanagar of ancient India’.
  • The largest collection of coins of Asia till date was found here.
  • It was excavated by Dr. Kedarnath Puri between 1938-1940.
  • Here art works have been found from BC era, on which there is a clear impression of Mathura art.
  • This area was known in the first century BC as ‘Malva Jaanapada’.
  • Hundreds of silver coins  have been found from the excavation of the Raidh.

City (district tonk)

  • A large number of Malav coins and currencies have been found from Uniara town in Tonk district, whose ancient name was ‘Malav Nagar’, Here evidences have been found of the civilization from the second century BC to the third and fourth century AD.
  • This place was the capital of the Malav Republic.
  • The ancient name of this place was Karakota town.
  • Some texts have been found in the excavation, which are from the Gupts era.
  • The first excavation of this archaeological site was done in 1942-43 by Shri Krishna Dev.
  • After that, the latest excavation work was done in 2008-09 under the guidance of Mr. T. J. Alon by Manoj Dwivedi, Shivkumar Bhagat and Shri Pravin Singh etc. .

Naliasar

  • Excavation at this place near Sambhar lake in Sambhar (Jaipur district) has given information and knowledge of ancient civilization before the Chauhan era.
  • Some of the seals found here have something  written in Brahmi script.
  • This civilization flourished  from the third century BC to the beginning of the Chauhan era and then vanished.

Aheda (Sarwad – Ajmer), Sukhpura (Tonk):

  • This place has a collection of Gupta era coins, in which 48 gold coins of  the reign of Gupta ruler Samudragupta and Chandragupta II Vikramaditya have been found.
  • Prior to this, the largest collection of Gupta coins in Rajasthan was found in Nagalachail village of Bayana.

Elana –

  • A place in Jalore district where copper-era remains are found.
  • Jawar – excavated by Mohanlal Sukhdia University in 1983-84. 

RAS GK Exam Preparation : Ancient Civilization of Rajasthan Notes | Part 3 PDF –

Ancient-Civilizations-of-Rajasthan-and-Important-Archaeological-Sites-Part-3

अन्य पुरातात्विक स्थल

बागोर –

  • भीलवाड़ा जिले की मांडल तहसील में कोठारी नदी के तटपर स्थित इस पुरातात्विक स्थल का उत्खनन 1966-68 से 1969-70 की अवधि में राजस्थान राज्य पुरातात्विक विभाग एवं दक्कन कॉलेज, पुणे के तत्वाधान में हुआ है,  जहाँ मध्य पाषाणकालीन लघु पाषाण उपकरण व वस्तुएं प्राप्त हुई हैं।

नगरी (चित्तौड़गढ़)

  • चित्तौड़गढ़ से 13 किमी दूर नगरी(प्राचीन मध्यमिका) की खुदाई सर्वप्रथम 1904 ई. में डॉ. भण्डारकर ने करवाई तथा दुबारा 1962-63 में केंद्रीय पुरातत्व विभाग द्वारा करवाई गयी।
  • यहाँ शिवि जनपद के सिक्के मिले हैं, जिनसे इस क्षेत्र पर शिवि जनपद होना साबित होता है।
  • यहाँ गुप्तकालीन कला के अवशेष भी मिले हैं।

जोधपुरा(जयपुर)

  • साबी नदी के किनारे जयपुर की कोटपूतली तहसील के ग्राम जोधपुरा के प्राचीन टीले   खुदाई 1972-73 में राजस्थान पुरातत्व विभाग द्वारा करवाई गई।
  • यहाँ के उत्खनन से अंतिम स्तर में शंगु एवं कुषाण कालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं तथा लौह उपकरण बनाने की भट्टियां भी मिली हैं।
  • यहाँ विभिन्न स्तरों में 2500 ई. पूर्व से लेकर ईसा  की दूसरी सदी तक की वस्तुएं मिली हैं।

सुनारी (खेतड़ी -झुंझुनू) :

  • इस स्थल का उत्खनन 1980-81 में राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा करवाया गया।
  • यहाँ खुदाई में लोहे के अयस्क से लोहा बनाने की प्राचीनतम भट्टियां मिली हैं।
  • लोहे के शस्त्र एवं बर्तन भी यहाँ प्राप्त हुए हैं।
  • ये लोग चावल का प्रयोग करते थे तथा आखेट एवं कृषि पर निर्भर थे।

तिलवाड़ा

  • बाड़मेर जिले के लूणी नदी के किनारे बसे इस स्थल के राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा वर्ष 1967-68 में करवाए गए उत्खनन से ई.पूर्व 500 से ईस्वी 200 तक की अवधि   में विकसित सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं।

रैढ़(टोंक)

  • निवाई तहसील में ढील नदी के किनारे स्थित इस गाँव में पूर्व गुप्तकालीन सभ्यता तक के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • यहाँ लौहा सामग्री का विशाल भण्डार मिला है।
  • इसे ‘प्राचीन भारत का टाटानगर’ कहा जाता है।
  • यहाँ एशिया का अब तक का सबसे बड़ा सिक्कों का भण्डार मिला है।
  • इसकी खुदाई डॉ. केदरनाथ पूरी ने 1938-1940 के मध्य कराई।
  • यहाँ इसा पूर्व की कलाकृतियां मिली हैं, जिस पर मथुरा कला की स्पष्ट छाप है।
  • यह क्षेत्र इसा पूर्व की प्रथम शती में ‘मालव जानपद’ के नाम से जाना जाता था।
  • रैढ़ की खुदाई से चाँदी की सैंकड़ों आहात मुद्राएं मिली हैं।

नगर (जिला टोंक)

  • टोंक जिले के उनियारा कस्बे, जिसका प्राचीन नाम ’मालव नगर’ था,  में बड़ी संख्या में मालव सिक्के एवं मुद्राएं मिली हैं, जो इसा पूर्व की द्वितीय शताब्दी से लेकर इसा की तीसरी-चौथी शताब्दी तक की सभ्यता के प्रमाण मिले हैं।
  • यह स्थान मालव गणराज्य की राजधानी थी।
  • इस स्थल का प्राचीन नाम करकोटा नगर था।
  • उत्खनन में कुछ लेख मिले हैं जो गुप्तकालीन हैं।
  • इस पुरातात्विक स्थल का प्रथम बार उत्खनन सन 1942-43 में श्रीकृष्ण देव द्वारा करवाया गया था।
  • उसके बाद नवीनतम उत्खनन कार्य 2008-09 में श्री टी.जे अलोन के निर्देशन में मनोज द्धिवेदी, शिवकुमार भगत एवं श्री प्रवीण सिंह आदि द्धारा  किया गया। 

 

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