RAS 2018 Preparation II Rajasthan art and Culture II customs and costumes Part 2

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(15). Purchase and Sale of Women and Girls

  • From the medieval period to 19th century , the purchase and distribution of women and boys and girls in Rajasthan was generally prevalent.
  • Some states used to collect tax on this purchase. In Kota State, this purchase and sale was taxed as ‘Chauthan’.
  • Rajputs were buying women and boys and girls for giving in dowry in the marriage of their daughter, some people used to buy women as a mistress and for prostitution.
  • However, this practice was banned in Kota State in 1831 AD but still the practice continued.
  • First of all, on February 16, 1847, the state of Jaipur issued an advertisement and declared this business as illegal.

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Customs and Costumes in Rajasthan Part - 2

(15). औरतों व लड़कें-लड़कियों का क्रय-विक्रय :-

  • मध्यकाल से 19 सीं सदी मध्य तक राजस्थान में स्त्रियों और लड़के-लड़कियों की खरीद-फरोख्त सामान्य रूप से प्रचलित थी। कुछ राज्य तो इस खरीद-फरोख्त पर विधिवत कर वसूल करतें थे। कोटा राज्य में इस क्रय-विक्रय  पर ‘चौथान’ नामक कर वसूला जाता था।
  • राजपूत लोग अपनी पुत्री के विवाह में दहेज के साथ गोला-गोली (दास-दासी) देने के लिए स्त्रियां और लड़के-लड़कियाँ खरीदतें थे तो कुछ लोग स्त्रियों को रखैल के रूप में व वेश्यावृति करवाने के लिए खरीदते थे।
  • यधपि कोटा राज्य में 1831 ई. में इस कुप्रथा पर रोक लगाई गई थी लेकिन फिर भी यह प्रथा जारी रही।
  • सर्वप्रथम  16 फरवरी, 1847 ई. को जयपुर राज्य ने एक इश्तिहार जारी कर इस व्यापार को अवैध घोषित कर दिया।
  • People were forbidden to buy and sell Boys and girls, and strict action was taken against both the buyer and the seller.

(16). Slave custom : –

  • In Rajasthan, slave tradition was prevalent since ancient times. There slaves were often such people who were taken prisoner during the war. The slaves were also bought and sold.
  • These slaves had to adhere to the orders of their masters while facing much harrassment, even if the order was low and inhuman.
  • In the royal houses, a large number of slaves were kept in a separate department, which was called ‘Rajlok’.
  • लड़के- लड़की खरीदने-बेचने की मनाही की दी गई और खरीदने व बेचने वाले, दोनों के विरुद्ध सख्त कार्यवाही करने की घोषणा की गई।

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(16). दास प्रथा :-

  • राजस्थान में प्राचीन काल से ही दास प्रथा प्रचलित थी। दास-दसियों में प्रायः ऐसे लोग होते थे, जिन्हें युद्ध के समय बंदी बना लिया जाता था।  दास-दासियों का क्रय भी किया जाता था।
  • इन दासों को अनेक संकटों का समाना करते हुए भी अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करना पड़ता था, चाहे वह आज्ञा निम्नस्तरीय और अमानवीय ही क्यों न हो।
  • राजघरनों में तो बड़ी संख्या में दासों का एक  पृथक विभाग रखा जाता था जिसे ‘राजलोक’ कहा जाता था।
  • Occasionally the King used to accept a maid as a concubine, which was called ‘Padadayat’.
  • If the ruler was happy and allowed her to wear gold ornaments in her hands and feet, she would have been called ‘Paswan’ or ‘Khavasan’ and in meetings, festivals and celebrations etc. lived under the queens. This slave tradition made a very moral decline of the Rajasthani society.
  • In 1832 William Bantick banned slavery. Even in Rajasthan, in 1832 AD, Kota and Bundi states banned the practice of slavery in the Haroti region.
  • कभी-कभी राजा लोग किसी दासी या गोली को उपपत्नी के रूप में स्वीकार  कर लेते थे, जिसे ‘पड़दायत’ कहा जाता था।
  • यदि शासक प्र्शन्न होकर उसे हाथ-पैरों  में सोने के आभूषण पहनने की स्वीकृति दे देते थे तो वह ‘पासवान’ अथवा ‘खवासन’ कहलाती थी और उत्सव -समारोहों आदि में उसकी बैठक रानियों के नीचे रहती थी। इस दास प्रथा ने राजस्थानी समाज का बेहद नैतिक पतन किया।  
  • सन 1832 में विलियम बैंटिक ने दास प्रथा पर रोक लगाई। राजस्थान में भी 1832 ई. सर्वप्रथम हाड़ौती क्षेत्र में कोटा व बूँदी राज्यों  ने दास प्रथा पर रोक लगाई।

(17).Begar practice: –

  • Taking the free services of the people and their exploitation by feudalists  was called Begar custom.
  • Except Brahmins and Rajputs, all the other castes had to give begar. Whenever there was a need to get the fodder for cattle, they used to take it from one village to another, cutting wood, painting houses, to do domestic chores etc.
  • All these services had to be given free. No wages were given in return for this.
  • The end of the traditional practice of begar in villages happened with the integration of Rajasthan and after the end of the feudalistic practices.

(17). बेगार प्रथा :-

  • सामन्तों, जागीरदारों व राजाओं द्वारा अपनी रैयत से मुक्त सेवाएँ लेना ही बेगार प्रथा कहलाती थी।
  • ब्राह्मण व राजपूत के अतिरिक्त अन्य सभी जातियों को बेगार देनी पड़ती थी। पशुओं के लिए चारा लाने, आवश्यकता पड़ते पर एक गाँव से दूसरे गाँव में बोझा ले जाने, लकड़ी चीरने, मकानों को लीपने-पोतने, घरेलू कामों आदि हेतु बेगार ली जाती थी।
  • ये सारी सेवाएँ मुक्त देनी पड़ती थी। इसके बदले कोई मजदूरी नहीं दी जाती थी।  
  • गाँवों में परम्परागत रूप से दी जाने वाली बेगार प्रथा का अंत राजस्थान के एकीकरण और उसके बाद जागीदारी प्रथा की समाप्ति के साथ ही हुआ।

(18). Bonded labour or Sagri Pratha: –

  • In exchange for the amount of money lent by the bourgeois or the Mahajan or the upper caste people, for  the amount of interest, instead of the amount of interest, that person or any of his family members were taken as bonded labor to work in  form of a domestic servant.
  • Unless the person returned the borrowed amount, he had to pay service to the bourgeoisie or the Mahajan for no wages at all.
  • In Rajasthan, in 1961, the ‘Sagri Prevention Act’ was passed and it tried to liberate the bonded laborers.

(18).बंधुआ मजदुर प्रथा या सागड़ी प्रथा :-

  • पूंजीपति या महाजन  अथवा उच्च कुलीन वर्ग के लोगों द्वारा साधनहीन लोगो को उधार दी गई राशि के बदले या ब्याज की राशि के बदले उस व्यक्ति या उसके परिवार के किसी सदस्य को अपने यहाँ घरेलू नौकर के रूप रख लेना बंधुआ मजदूर प्रथा कही जाती थी।
  • जब तक वह व्यक्ति उधार ली राशि चूका न दे, उसे बिना  मजदूरी लिए पूंजीपति या महाजन के यहाँ मजदूरी करनी पड़ती थी।
  • राजस्थान में 1961 ई. में ‘सागड़ी निवारण अधिनियम’ पारित करके बंधुआ मजदूरों को मुक्ति दिलाने का प्रयास किया गया।

Other important facts:

1). Rekh: –

  • That criterion, on the basis of which state tax was collected from the feudalists.

2). Talwar Bandhai or Najarana: –

  • Charges collected by the state from the new heirs of jagirs.

3). Tameej: –

  • Samanta’s privilege, in which the Maharana stood and respected him when he came in the court  and returned.

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य :-

1). रेख :-

  • वह मापदंड, जिसके आधार पर सामंतो व जागीदारों से राजकीय शुक्लों की वसूली की जाती थी।

2). तलवार बंधाई या नजराना :-

  • राज्य द्वारा  जागीर के नए उत्तराधिकारी से वसूल किया जाने वाला शुल्क।

3). तामीज :-

  • सामन्तो को प्राप्त विशेषाधिकार, जिसमें किसी  सामंत के दरबार में आने व वापस जाने के समय महाराणा खड़ा होकर उन्हें सम्मान देता था।

4). Qurab: –

  • Special honor to be given to the feudal lord, in which the ruler would put his hands on the shoulders of the feud and carry his chest, which meant that your place is in my heart.

(5). Banh passaw: –

  • Respect for the Samanta, in which Maharana accepted the greeting of Samanta and kept his hand on the shoulder of that feud.

(6). Missal: –

  • The method of sitting in a straight line  in the royal court was called Missal.

4). क़ुरब :-

  • सामंत को दिया जाने वाला विशेष सम्मान, जिसमें शासक सामंत के कंधों पर हाथ रखकर  अपनी छाती तक ले जाता था जिसका आशय होता था कि आपका स्थान मेरे ह्रदय में है।

(5). बाँह पसाव :-

  • सामन्त को प्राप्त सम्मान, जिसमे महाराणा सामन्त के अभिवादन को स्वीकार  करते हुए अपने हाथ उस सामन्त के कंधो पर रख देता था।

(6). मिसल :-

  • राजदरबार में पंक्तिबंद्ध तरिके से बैठने की रीति को मिसल कहा जाता था।

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