Rajasthan GK Art and culture I religious cult part 2 I PDF I Video

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SantPipa (1383-1453 AD): –

  • He was born in the house of Gagron king Kadawa Rao khinchi (Chauhan). His mother’s name was Lakshmi-Vati and his childhood name was ‘Pratap Singh’.
  • Pipaji took initiation from Saint Ramanand and promoted Bhagvat devotion. Tailor community treats them as their god. There is a grand temple of Pipaji in Samadri village of Barmer where huge fair is held. Apart from this, fairs are also held in memory of Masurian and Gagron.
  • Saint Pippa also stayed for some time in Toda Gram (Tonk) where Pappa ji’s cave is situated in  which he used to sing hymns.

PDF Notes : Rajasthan GK Art and culture I religious cult part 2

RAS Rajasthan Notes art and culture

संतपीपा (1383-1453 ई.) :-

  • इनका जन्म गागरोन नरेश कड़ावा राव खींची (चौहान) के घर हुआ था। इनकी माता का नाम लक्ष्मी-वती था तथा इनके बचपन का नाम ‘प्रताप सिंह’ था।
  • पीपाजी ने संत रामानंद से दीक्षा ली तथा भगवत भक्ति का प्रचार किया। दर्जी समुदाय इन्हें अपना आराध्य मानता है। बाड़मेर के समदड़ी ग्राम में पीपाजी का भव्य मंदिर है जहाँ विशाल मेला भरता है। इसके अलावा मसूरिया एवं गागरोन में भी इनकी स्मृति में मेले लगते हैं।
  • संत पीपा कुछ समय तोडा ग्राम (टोंक) में भी रहे जहाँ पीपा जी की गुफा है जिसमें वे भजन किया करते थे।
  • Saint Pipa has strongly criticized castes, communalismn and discrimination and worshiped Nirguna Brahma, taught the necessity of the master to attain God and the means of salvation.
  • He was  the first saint who waved the Bhakti movement in Rajasthan.

Saint Sunderdas ji (1596-1707.): –

  • Mr. Sundar Das, the ultimate disciple of Dadu Ji, was born in the Khandeval Vaishya family in Dausa. His father was Shri Parmanand (Shah Chokha).
  • By taking initiation from Daduji, he preached his teachings and composed many texts. The main texts are- Gyaan Samundra, Gyaan Savaiyya (Sundarvilas), Sundar Saar, Sundar granthavali etc.
  • संत पीपा ने जाति-पाँति, सम्प्रदायवाद, ऊँच-नीच आदि भेदभावों की कटु आलोचना की एवं निर्गुण ब्रम्हा की उपासना करने, ईश्वर प्राप्ति हेतु गुरु की अनिवार्यता एवं भक्ति को मोक्ष प्राप्ति का साधन बनाने का उपदेश दिया।
  • राजस्थान में भक्ति आंदोलन का अलख जगाने वाले ये प्रथम संत थे।

संत सुंदरदास जी (1596-1707ई.) :-

  • दादूजी के परम शिष्य श्री सुंदरदास जी का जन्म दौसा में खण्डेवाल वैश्य परिवार में हुआ। इनके पिता श्री परमानंद(शाह चोखा) थे।
  • दादूजी से दीक्षा लेकर इन्होंने उनके उपदेशों का प्रचार किया और कई ग्रन्थों की रचना की। प्रमुख ग्रंथ हैं-ज्ञान समुन्द्र, ज्ञान सवैया (सुन्दरविलास), सुंदर सार, सुंदर ग्रंथावाली आदि।
  • He passed away in Sanganer in 1764. his main workplace was Dausa, Sanganer, Narayana and Fatehpur Shekhawati. He started the ‘Naga Sadhu’ class in the Dadu sect.

Saint rajjab ji: –

  • Rajjab ji was born in Sanganer (Jaipur) in the 16th century. While going for marriage, he  listened to the teachings of Daduji, he became his disciple and throughout his life he remained in  groom’s attire and spread ‘Dudu’s teachings’.
  • ‘Rajjabvani’ and Sarvangi are his main texts. He died in Sanganer.
  • इनका निधन संवत 1764 में सांगानेर में हुआ। इनके मुख्य कार्यस्थल दौसा, सांगानेर, नारायणा एवं फतेहपुर शेखावाटी रहे। इन्होने दादू पंथ में ‘नागा’ साधु वर्ग प्रारम्भ किया।

संत रज्जब जी :-

  • रज्जब जी का जन्म सांगानेर(जयपुर) में 16 वीं सदी में हुआ। विवाह के लिए जाते समय दादूजी के उपदेश सुनकर ये उनके शिष्य बन गये और जीवन भर दूल्हे के वेश में रहते हुए ‘दादू के उपदेशों’ का बयान किया।
  • ‘रज्जबवाणी’ एवं सर्वंगी इनके प्रमुख ग्रंथ हैं। इनका स्वर्गवास सांगानेर में हुआ, जहाँ इनकी प्रधान गद्दी है।

Saint Dhanna Ji: –

  • Sant Dhanna ji, disciple of Ramananda  was born in a Jat family in 1472 in ‘Dhuvan’ village near Tonk. Since childhood, he used to be absorbed in devotion of god.
  • These saints started preaching after taking knowledge from Ramnand. Serving saints, freedom of belief in God, and opposing Karm-kaands, superstitions,  and rituals etc. are his main teachings.

Saint Jaimladas ji: –

  • The revered Shree Jimal Das was a disciple of the famous saint, Shri Madhodas ji Diwan of the Ramasnehi Samradaya . He gave deeksha to  Sant Hariram Das, initiator of ramsnehi community of Sinhathal branch.

संत धन्ना जी :-

  • संत धन्ना जी रामानन्द के शिष्य संत धन्ना जी टोंक के निकट ‘धुवन’ ग्राम में संवत 1472 में एक जाट परिवार में पैदा हुए। ये बचपन से ही ईश्वर भक्ति में लीन रहते थे।
  • ये संत रामानंद से दीक्षा लेकर धर्मोप्रदेश एवं भगवत भक्ति का प्रचार करने लगे। संग्रह व्रति से मुक्त रहते हुए संतों की सेवा, ईश्वर में दृढ़ विश्वास तथा बाहरी आडंबरों व कर्मकाण्डों का विरोध आदि इनके प्रमुख उपदेश हैं।

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संत जैमलदास जी :-

  • पूज्यवाद श्री जैमलदास जी रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रसिद्ध संत श्री माधोदास जी दीवान के शिष्य थे। इन्होंने रामस्नेही सम्प्रदाय की सिंहथल शाखा के प्रवर्त्तक संत हरिरामदास जी को दीक्षा दी।
  • Therefore he is also considered as the Adi Acharya of the Sinhital Khopada Branch.

Devotee poet Durlabh: –

  • Sant Durlabh Jee was born in V.S  1753, it was in the Vaagad area . He preached Krishna’s devotion and drew the people to Krishna Leela. He created his work area in Banswara and Dungarpur. He is also called ‘Narsingh of Rajasthan’.

Saint Raidas ji: –

  • Ramanand’s disciple Sant Raidas was not from Rajasthan, but he spent some time in Rajasthan too. These was of the Chamar caste. They also preached  devotion and against discrimination prevailing in the society and devotion of Nirgun Brahma.
  • इसलिए इन्हें सिहंथल खोपडा शाखा का आदि आचार्य भी माना जाता है।

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भक्त कवि दुर्लभ :-

  • संत दुर्लभ जी का जन्म वि.सं. 1753 में वागड़ क्षेत्र में हुआ। इन्होंने कृष्ण भक्ति के उपदेश दिये  तथा लोगों को कृष्ण लीला के रसामृत से सराबोर किया। बाँसवाड़ा व डूँगरपुर को इन्होंने अपना कार्यक्षेत्र बनाया था। इन्हें ‘राजस्थान का नृसिंह’ भी कहते हैं।

संत रैदास जी :-

  • रामानंद के शिष्य संत रैदास राजस्थान के नहीं थे परन्तु इन्होने अपना कुछ समय राजस्थान में भी बिताया था। ये जाति के चमार थे। इन्होंने भी समाज में व्याप्त आडंबरों एवं भेदभावों का विरोध कर निर्गुण ब्रम्हा की भक्ति का उपदेश  दिया।
  • At the time of Meera, he came to Chittor. His chhatri is in a corner of Kumbhashyam temple of Chittorgarh. His teachings are in the book “Radias Ki Parachi”.

Saint Shiromani Meera: –

  • Meerabai was born in 1498 in Kurki village near Merta. His father Shri Ratna Singh ji Rathod was the Jageerdaar of Bajoli.
  • Meera ji was raised  at her grandfather’s house here. Her birth name was Pemal. She were married to Bhojraj, son of Maharana Sangram Singh (Sanga) of Mewar but he died only  few years later.
  • Meera Bai told the simple path of Saguna devotion, Bhajan, Dance and Krishna Smaran.
  • ये मीरा के समय चितौड़ आये। इनकी छतरी चितौड़गढ़ के कुम्भश्याम मंदिर के एक कोने में है। इनके उपदेश ‘रैदास की परची’ ग्रंथ में हैं।

संत शिरोमणी मीरा :-

  • मीराबाई का जन्म सन 1498 में मेड़ता के पास कुड़की ग्राम में हुआ था। इनके पिता श्री रत्न सिंह जी राठौड़ बाजोली के जागीरदार थे।
  • मीरा जी का लालन-पालन अपने दादाजी के यहाँ मेड़ता में हुआ। इनका जन्म नाम पेमल था। इनका विवाह मेवाड़ के महाराणा संग्रामसिंह (सांगा) के पुत्र भोजराज के साथ हुआ, परन्तु कुछ वर्ष बाद ही उनकी मृत्यु हो गई थी।
  • मीरा बाई ने सगुण भक्ति का सरल मार्ग भजन, नृत्य एवं कृष्ण स्मरण को बताया।
  • Meera ji went to the Ranchod temple in Dakor, Gujarat and in her last moments, got merged in his Girdhar Gopal. Meeraji’s ‘Padavalis’ are famous.

Gavri Bai: –

  • Born in Nagar family of Dungarpur, Gavari Bai flowed the stream of Bhaktiras like Meera in Vaagad. She is also called ‘Vaagad ki Meera’.

Saint Mawji: –

  • Saint Maawji was born in a Brahmin family of Sabla village (Dungarpur) In 1727, he received enlightenment at a place named Beneshwar.
  • मीरा जी अपने अंतिम समय में गुजरात के डाकोर स्थित रणछोड़ मंदिर में चली गई और वहीं अपने गिरधर गोपाल में विलीन हो गई। मीरा जी की ‘पदावलियाँ’ प्रसिद्ध हैं।

गवरी बाई :-

  • डूंगरपुर के नागर कुल में जन्मी गवरी बाई ने वागड़ में मीरा की तरह भक्ति रस की धारा प्रवाहित की। इन्हें ‘वागड़ की मीरा’ भी कहा जाता है।

संत मावजी :-

  • वागड़ प्रदेश के संत मावजी का जन्म साबला ग्राम (डूंगरपुर) के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। सन 1727 में इन्हें बेणेश्वर स्थान पर ज्ञान प्राप्त हुआ।
  • Saint Mavji founded Beneshwar Dham . His main temple is only in Sabla village on the Mahi coast.
  • He is installed in the form of the Nikalanki incarnation of Shri Krishna. He composed the Krishna Leela in Bagdi language.
  • His voice is called ‘Chopra’. Sant Mavji comes from those saints of Indian Saints tradition, who coordinated  Nirguna and Saguna and has the reputation of being on the omnipotent path.

Acharya Bhikshu Swamy: –

  • Shwetambar Jain Acharya who was born in Kantalia village of Marwar. 1783 (1726 AD). In 1751 AD, Acharya was conferred in the sect of Raghunath ji.

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