RAS exam I Rajasthan GK I Rajasthan Economics I poverty in Rajasthan Part 1

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Rajasthan GK

  • Poverty alleviation was accepted as the purpose of in our Five Year Plan (1974-79) plan.
  • Under the chairmanship of Dr. C. Rangarajan, the Planning Commission had appointed a specialist team to review the method of measurement of poverty. In its report of June 2014, based on the newly established method for 2011-12 and 2009- 10, statistics of poverty were presented to various states and Nation as whole.
  • Estimation of poverty in India Arjun Sen Gupta Committee has submitted its report in its “Unorganized Labor” and former Member of Planning Commission Dr. N.C. Saxena had given his inquiry report.

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  • हमारे देश की पंचवर्षीय योजना (1974-79) में निर्धनता उन्मूलन को योजना के उद्देश्य के रूप में स्वीकार किया गया था।
  • डॉ. सी. रंगराजन की अध्यक्षता में योजना आयोग ने निर्धनता के माप की विधि की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ-दल नियुक्त  किया गया था। जिसने जून, 2014 की अपनी रिपोर्ट में 2011-12 व 2009-10 के लिए नई प्रस्थापित विधि के आधार पर विभिन्न राज्यों व समस्त भारत के लिए निर्धनता के आँकड़े प्रस्तुत किये थे।
  • भारत में निर्धनता के अनुमान अर्जुन सेन गुप्ता समिति ने अपनी “असंगठित श्रम” की रिपोर्ट में तथा योजना आयोग के पूर्व सदस्य डॉ.एन.सी. सक्सेना  ने अपनी जाँच रिपोर्ट दिए थे I
  • Suresh Tandulkar changed the proportion of poverty in 2004-05 compared to the previous estimates presented by the Planning Commission.
  • There has been a new outcome in the MRI estimates and the number of poor in the eight states of Bihar, Chhattisgarh, Jharkhand, Madhya Pradesh, Orissa, Rajasthan, Uttar Pradesh and West Bengal has increased to 42.1 million. Africa, which is 11 million more than the 26 poorest countries. Rajasthan is also included in these 8 states.
  • Earlier it was thought that due to planned development, poverty will automatically decrease. It has been called ‘the evolutionary growth’ or ‘dripping effect’.
  • सुरेश तेन्दुल्कर ने 2004-05 के लिए निर्धनता के अनुपातों  में योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत पूर्व अनुमानों की तुलना में परिवर्तन  किया था।
  • MRI के अनुमानों  में एक नया परिणाम सामने आया है और वह भारत के आठ राज्यों -बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान उत्तरप्रदेश, पश्चिमबंगाल  में निर्धनों की संख्या 42.1 करोड़ हो गयी है। जो अफ्रीका 26 निर्धनतम देशों से भी 1.1 करोड़ ज्यादा है। इन 8 राज्यों में राजस्थान भी शामिल पाया जाता है।
  • पहले यह सोचा गया था कि योजनाबद्ध विकास  के फलस्वरूप अपने आप गरीबी कम होती जाएगी। इसे ‘विकास का ढलने वाला’ या ‘टपकने वाला प्रभाव’ कहा गया है।

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  • It was also thought that the financial instruments to be handed over to the states on behalf of the Center should be on basis of poverty.
  • In the second and final report of the new Finance Commission, on the basis of the number of scheduled castes and tribes and agricultural laborers in their place, it was emphasized to prepare a mixed index of backwardness and adopt it as a new foundation.
  • Poverty has been a considerable subject in both national and state levels in the country. Therefore, detailed study on measurements, reasons, government policy and consequences has been considered necessary.
  • केन्द्र की तरफ से राज्यों को हस्तान्तरित किये जाने वाले वित्तीय साधनों के लिए गरीबों  के स्तर को आधार बनाने की बात भी सोची जाने लगी थी।
  • नवें वित्त आयोग ने अपनी दूसरी व अंतिम रिपोर्ट में इनके स्थान पर अनुसूचित जाति व जनजाति  और खेतिहर मजदूरों की संख्या के आधार पर।’पिछड़ेपन का एक मिश्रित सूचकांक’ तैयार करके उसे एक नये आधार के रूप में अपनाने पर बल दिया गया
  • देश में राष्ट्रीय व राज्यीय दोनों स्तरों पर गरीबी एक विचारणीय विषय रहा है। अतः इसके माप, कारणों ,सरकारी नीति व परिणामों पर विस्तृत अध्ययन करना आवश्यक माना  गया है।
  • “Oxford Poverty and Human Development Initiative” A new multidimensional poverty index has also been prepared with assistance of UNDP.
  • In this, not only income, but also  medical education, assets, and services have also been measured to find status of family.

Measurement of poverty line: –

  • In the early seventies, the line of poverty was defined as the per capita monthly expenditure, at the rate of Rs 49 for rural areas and Rs 56.6 for urban areas at the prices of 1973-74.
  • In rural areas it would be possible to get 2400 calories per person per day and consumption level of 2100 calories in urban areas.
  • “ऑक्सफ़ोर्ड पाँवर्टी एण्ड ह्यूमन डवलपमेंट इनीशियेटिव” ने यु.एन.डी.पी. सहायता  से एक नया बहु आयामी निर्धनता सूचकांक भी तैयार किया है।
  • इसमें निर्धनता को केवल आय से ना जोड़कर शिक्षा,चिकित्सा परिसम्पतियों व सेवाओं से परिवारों का स्तर जोड़ा गया है।

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गरीबी की रेखा का माप :-

  • सत्तर के दशक के प्रारम्भ में गरीबी की रेखा को प्रति व्यक्ति मासिक व्यय के रूप में परिभाषित किया गया था,1973-74 के मूल्यों पर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए लगभग 49 रूपये व शहरी क्षेत्रों के लिए 56.6 रूपये निर्धारित किया  गया था।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 2400 कैलोरी के बराबर उपभोग और शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी के बराबर उपभोग का स्तर प्राप्त करना सम्भव हो सकेगा।
  • The person who spent per capita per month below this mark was considered poor.
  • For the rural areas, the poverty line is estimated to be Rs. 816 per person per month. And for urban areas it was considered 1000
  • The concept of poverty in India is an ‘absolute concept’. Because it has been combined with consumption of minimal calories.

Poor people Ratio and Number of poor in Rajasthan

  • Nowadays, the National Sample Survey Organization is counting the number of poor people using data usage expenditure per five years. The ratio of the total population of the poor is called ‘poverty-ratio’.
  • इन स्तरों के नीचे प्रति व्यक्ति प्रति माह खर्च करने वाले व्यक्ति गरीब माने गए।
  • 2011-12 के भावों पर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए गरीबी रेखा 816 रूपये प्रति व्यक्ति प्रति माह की व्यय मानी गयी है। व शहरी क्षेत्रों के लिए यह 1000 रूपये मानी गई।
  • भारत में गरीबी की अवधारणा एक ‘निरपेक्ष अवधारणा’ है। क्योकि इसे न्यूनतम कैलोरी के उपभोग से जोड़ दिया गया है।

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राजस्थान में निर्धनता-अनुपात व निर्धनों की संख्या

  • आजकल प्रति पांच वर्ष में राष्ट्रीय सेम्पल सर्वेक्षण संगठन द्वारा उपभोग व्यय के आँकड़ों का उपयोग करके निर्धन व्यक्तियों की गिनती की जाती है। निर्धन व्यक्तियों का कुल जनसंख्या से अनुपात ‘निर्धनता-अनुपात’ कहलाता है।
  • Most of our country’s poor and marginal farmers, agricultural laborers,  rural people and scheduled castes and scheduled tribes, bonded laborers, poor people, lackless farmers etc. come under this .The impact of poverty in cities is mostly seen in the casual labor-class.
  • The Planning Commission had appointed a committee to look into the poverty related figures of 2004-05 under the chairmanship of Suresh Tendulkar. Who presented its report on December, 2009.
  • The Expert Group appointed under the chairmanship of Dr C. Rangarajan has presented the proportion of total poverty for 2011-12 in accordance with its proposed method.
  • हमारे देश के गरीबों में ज्यादातर लघु व सीमांत किसान, खेतिहर, मजदुर, ग्रामीण काश्तकार व अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लोग, बंधुआ मजदूर, अपाहित व्यक्ति, साधनहीन कृषक आदि आते है। शहरों में गरीबी का प्रभाव ज्यादातर आकस्मिक श्रमिक-वर्ग में देखने को मिलता है।  
  • योजना आयोग ने सुरेश तेन्दुलकर की अध्यक्षता में 2004-05 के निर्धनता संबन्धी आँकड़ो की जाँच के लिए एक समिति नियुक्त की थी। जिसने अपनी रिपोर्ट दिसम्बर, 2009 को प्रस्तुत की थी।
  • डॉ. सी रंगराजन की अध्यक्षता में नियुक्त विशेषज्ञ-दल ने 2011-12 के लिए कुल निर्धनता के अनुपात अपनी प्रस्तावित विधि के अनुसार प्रस्तुत किये हैं-
    • Most     poor – Chhattisgarh              47.9%
    • Minimum             – Goa           6.3%
    • All India                                                  29.5%
    • Rajasthan                                               21.7%
    • According to the Rangarajan method, the proportion of poverty in Rajasthan in rural and urban and overall in  2011-12 is as follows
  • सर्वाधिक     – छत्तीसगढ़             47.9%      न्यूनतम    – गोआ                   6.3%      समस्त भारत                                  29.5%     राजस्थान                                       21.7%
    • रंगराजन विधि के अनुसार राजस्थान में ग्रामीण व शहरी तथा समग्र रूप से 2011 -12 में निर्धनता के अनुपात निम्न हैं –
  • राजस्थान ग्रामीण शहरी कुल
    21.4 22.5 21.7

     

    • n 2011-12, 112.0 lakh people  in the rural areas of Rajasthan,  and 39.5 lakh persons in the cities were found poor, and the total number of both were 151.5 lakh.
  • Reasons of  poverty in Rajasthan: –

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  • 1) Historical and geographical conditions: –
    • Before the integration of Rajasthan, there was a group of 19 princely states and 3 chiefships, in which social economic development was very backward.
    • Apart from this, 61% of the total land area and 40% of the population is found in dry and semi-arid regions of the state.
    • Farmers were economically exploited. The state’s feudal atmosphere was the reason of poverty and backwardness.
    • 2011-12 में राजस्थान ग्रामीण क्षेत्रों में 112.0 लाख व्यक्ति एवं शहरों में 39.5 लाख व्यक्ति निर्धन आँके गये, और दोनों की कुल संख्या 151.5 लाख आँकी गयी।
  • राजस्थान में निर्धनता के कारण:-1) ऐतिहासिक व भौगोलिक परिस्थितियाँ :-
    • राजस्थान एकीकरण से पूर्व 19 सामन्ती राज्यों व 3 चीफशिफों का समूह था,जिनमे  सामाजिक आर्थिक विकास काफी पिछड़ा हुआ था।
    • इसके अलावा राज्य के शुष्क व अर्द्ध-शुष्क प्रदेशों में कुल भू-क्षेत्र का 61% व जनसंख्या का 40% पाया जाता है।
    • कृषकों का आर्थिक शोषण होता था। राज्य का सामन्ती वातावरण गरीबी  व पिछड़ेपन का जनक था।
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