Rajasthan art folk god and goddesses of Rajasthan I art and culture part 1

Rajasthan art folk god and goddesses of Rajasthan I art and culture part 1
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Rajasthan art folk god and goddesses of Rajasthan I art and culture part 1

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Rajasthan art folk god and goddesses of Rajasthan I art and culture part 1

Folk Gods of Rajasthan : –

  • Legends of superhuman miracles and great acts of heroism became famous as folk gods.
  • Folk gods means those great men, who, by their hard work and self-confidence, established cultural values ​​in the society, protecting the Hindu religion and public interest .
  • Therefore, their supernatural powers and public works  became public belief and they started being worshipped by the people as remover of misery . Even today, in the villages, their ‘Deval-Devara’, or chabutra , are the center of faith in mind of people.

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Folk god and folk goddesses of Rajasthan PART – 1

राजस्थान के लोक देवता  :-

  • अलौकिक चमत्कारों से युक्त एवं वीरता पूर्ण कृत्यों वाले महापुरुष लोक देवता के रूप में प्रसिद्ध हुए।
  • लोकदेवता से तात्पर्य उन महापुरुषों से है, जिन्होंने अपने वीरोचित कार्यों तथा दृढ आत्मबल द्वारा समाज में सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना, हिन्दू धर्म की रक्षा तथा जनहितार्थ अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।

अतः ये अपनी अलौकिक शक्तियों एवं लोकमंगलकारी कार्यों हेतु लोक आस्था के प्रतीत हो गये, तथा इन्हें जनसामान्य द्वारा दुःखहर्ता और मगलकर्ता के रूप में पूजा जाने लगा। आज भी गाँव-गाँव में इनके ’स्थान’ देवल-देवरे, या चबूतरे लोक मानस के आस्था केंद्र के रूप में विधमान हैं।Rajasthan art folk god and goddesses of Rajasthan I art and culture part 1

  • People from all castes and sects come to worship them in these places regardless of caste and creed.
  • In the village, they are  worshiped to sought relief from disease and and ask for some wish . After completion of it they perform Jaagran.
  • In Marwar these five deities – Pabuji, Harbuji, Ramdev JI, Gogaji and Manglia Maha – are considered as Panch Pirs.

A brief description of these five deities of Marwar is as follows: –

Pabuji: –

  1. Pabuji Rathod of the Rathore dynasty was born in the house of Dhanadhal and Kamalda in Kolumand near Phalodi (Jodhpur) in the 13th century.
  • जाति-पाँति एवं छुआछूत से दूर इन थानों पर सभी जाति एवं सम्प्रदायों के लोग इनको पूजते है।
  • गाँव में हारी-बीमारी में इसकी पूजा की जाती है व् मनौतियाँ माँगी जाती है तथा उनके पूर्ण हो जाने पर रात्रि जागरण करवाया जाता है ।
  • मारवाड़ आँचल में इन पाँचों लोकदेवताओं- पाबूजी, हड़बूजी, रामदेवजी गोगाजी एवं मांगलिया महा जी को पंच पीर माना गया है।
  • राज्य के प्रमुख लोकदेवताओं का संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है:-

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पाबूजी :-

1). राठौड़ राजवंश के पाबूजी राठौड़ का जन्म 13वीं शताब्दी में फलौदी(जोधपुर) के निकट कोलुमण्ड में धाँधल एवं कमलादे के घर में हुआ।

  • He was the  descendant of Rathore  Rao Siha. when he was being married to king Surajmal Sodha of Amarkat’s  daughter Supyarde, he got up in the middle of the rounds and went to rescue the cow of Deval Charani (whose  mare he had brought) and in village Dechun village, he died . Therefore, he is worshiped as a cow-saver god.

2). Pabuji has special recognition in the form of plague guard and god of Camels. It is said that the credit to bring the first camel to Marwad (Saunde) goes to him.

  • Therefore, Raika caste (Rebari), the patron of the camels considers him to be their adorable god.
    • ये राठौड़ों के मूल पुरुष राव सीहा के वंशज थे। इनका विवाह अमरकोट के राजा सूरजमल सोडा की पुत्री सुप्यारदे से हो रहा था कि ये फेरों के बीच से ही उठकर देवल चारणी (जिसकी केसर कालमी घोड़ी ये माँग कर लाये थे) की गायें छुड़ाने चले और देचूँ गाँव में युद्ध में वीर गति को प्राप्त हुए। अतः इन्हें गौ-रक्षक देवता के रूप में पूजा जाता है।

    2). प्लेग रक्षक एवं ऊँटो के देवता के रूप में पाबूजी की विशेष मान्यता है। कहा जाता है कि मारवाड़ में सर्वप्रथम ऊँट(साण्डे) लाने का श्रेय पाबुजी को ही है।

    अतः ऊँटों की पालक राइका (रेबारी) जाति इन्हें अपना आराध्य देव मानती है।

  • He is very popular in  Thori and Bhil caste and the Muslims of the Meher caste worship him as Pir and he is also considered as the incarnation of Laxman.

3). Pabuji is famous for Kesar Kalami  mare and leaned pag in left. His insignia is spear

4). The most prominent temple is in Kolumand, where every year a fair is organised on Chaitra amavasya.

5). Saga song related to Pabuji  ‘Paboji Ki Paawde’ is sung by Nayak and Rebari caste with Maath instrument.

6). The ‘Pabuji ki Pas’ is sung by bhopas of Nayak caste using  Ravanhattha instrument.

7). Chanda-Dima and Harmal are known as the associates of Pabuju.

Rajasthan

  • ये थोरी एवं भील जाति में अति लोकप्रिय हैं तथा मैहर जाति के मुसलमान इन्हें पीर मानकर पूजा करते हैं इन्हे लक्ष्मण का अवतार भी माना जाता है।

3).  पाबूजी केसर कालमी घोड़ी एवं बाँयी और झुकी पाग के लिए प्रसिद्ध है। इनका बोध चिन्ह भाला है।

4). कोलुमण्ड में इनका सबसे प्रमुख मंदिर है, जहाँ प्रतिवर्ष चैत्र अमावस्या को मेला भरता है।

5). पाबूजी से संबंधित गाथा गीत ‘पाबूजी के पवाड़े’ माठ वाद्य के साथ नायक एवं रेबारी जाति द्वारा गाये जाते है।

6). ‘पाबूजी की पड़’ नायक जाति के भोपों द्वारा रावणहत्था वाद्य के साथ बाँची जाती है।

7). चाँदा-डेमा एवं हरमल पाबूजी के रक्षक सहयोगी के रूप में जाने जाते हैं।

8). ‘Papu Prakash’ written by Asia Modji is an important composition on the life of Pabuji.

Gogaji (Gogapir): –

1). Chauhan Vasanthi Gogaji was born in the 11th century in the house of Javar Singh-Bachhal at Dadreva in Churu district. His location in Dadreva is called Seershmedi, where every year Gogaji’s fair is organized.

2). Gogaji gave up his life for protecting the cow and protecting the  country from Muslim invaders (Mahmud Ghaznavi). Therefore, he started being worshiping in the form of folk god. he is also worshiped as ‘Jaharpir’ or ‘Gugga’.

8). आशिया मोड़जी द्वारा लिखित ‘पाबू प्रकाश’ पाबूजी के जीवन पर एक महत्वपूर्ण रचना है।

गोगाजी (गोगापीर) :-

1).  चौहान वंशीय गोगाजी का जन्म 11वीं शताब्दी में चूरू जिले के ददरेवा नामक स्थान पर जेवरसिंह-बाछल के घर हुआ। ददरेवा में इनके स्थान को शीर्षमेड़ी कहते है जहाँ हर वर्ष गोगाजी का मेला भरता है।

2). गोगाजी ने गौ-रक्षार्थ एवं मुस्लिम आक्रांताओं (महमूद गजनवी) से देश की रक्षार्थ अपने प्राण न्योछावर कर दिये। इसलिए इन्हें लोकदेवता के रूप में पूजा जाने लगा। इन्हें ‘जाहरपीर’ या ‘गुग्गा’ के नाम से भी पूजा जाता है।

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