Marine Organisms Ecology Study Notes For UPSC IAS Exam 2018

Marine Organisms Ecology Study Notes For UPSC IAS Exam 2018

Marine Organisms Ecology Study Notes For UPSC IAS Exam 2018

Marine Organisms Ecology Study Notes For UPSC IAS Exam 2018

Marine Organisms Ecology Study Notes For UPSC IAS Exam 2018

Plankton –

  • Plankton includes plants and animals that float along at the mercy of the sea’s tides and currents
  • The name comes from a greek word which means ‘drifter’
  • There are two types of plankton- tiny plants called phytoplanktons and weak swimming planktons called zooplanktons.
  • their distribution is controlled due to their limited power of locomotion largely by currents in the aquatic ecosystems.
  • The growth rate, productivity and species diversity of plankton in tropical waters especially in mangrove water are high 

Phytoplankton  –

  • It is usually made up of very tiny usually single cells.
  • It is estimated that 80% of the oxygen on earth is produced by them.
  • Diatom are most common type of phytoplankton
  • Dinoflagellates are both like plants and animals they can move themselves through the water using two flagella in grooves along their body, yet they can also produce their own food like plants.
  • Their total biomass is many times greater than that of the total plants on land and they serve as the “pasture grounds” in the aquatic environment. 

Factors Affecting Phytoplankton Biodiversity –

  • Light directly affects the rate of photosynthesis and apart from this depending on the light intensity phytoplanktons are limited in the uppermost layers of the ocean only.
  • Nutrients- nitrogen and phosphorus are the major inorganic nutrients required for the growth and reproduction of phytoplanktons
  • Diatoms and silicoflagellates also require silicates in significant amounts.
  • Some nitrogen fixing phytoplanktons are also present.Apart from this traces of iron are used which limits phytoplankton growth in large areas of the ocean.
  • Temperature along with illumination influences seasonal variation of phytoplankton production in the temperate latitudes.
  • The highest concentration are found at high latitudes, with the exception of upwelling areas on the continental shelves, while the tropics and subtropics have 10 to 100 times lower concentrations.
  • In addition to nutrients, temperature, salinity and light availability; the high levels of exposure to solar UV-B radiation that normally occur within the tropics and subtropics may play a role in phytoplankton distributions
  • Phytoplankton productivity is limited to the euphotic zone, the upper layer of the water column in which there is sufficient sunlight to support net productivity.
  • The position of the organisms in the euphotic zone is influenced by the action of wind and waves.

 प्लवक –

  • प्लवक में वे पौधे तथा जंतु शामिल हैं जो समुद्र के ज्वार तथा धाराओं में तैरते हैं |
  • यह नाम एक ग्रीक शब्द से उत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है “ ड्रिफ्टर या मछली फंसाने की नाव”
  • प्लवक के दो प्रकार होते हैं – छोटे प्लवक पादप प्लवक कहे जाते हैं तथा कमज़ोर तैरते प्लवक को वृहत पादप कहा जाता है |
  • उनकी गति की सीमित शक्ति के कारण उनका वितरण नियंत्रित है तथा जलीय पारितंत्र में मुख्य रूप से उन्हें धाराओं के द्वारा गति प्राप्त होती है |
  • उष्णकटिबंधीय जल विशेष रूप से मैन्ग्रोव जल में प्लवक की विकास दर, उत्पादकता, तथा प्रजाति विविधता उच्च है |

पादप प्लवक –

  • यह सामान्यतः बहुत छोटी एक कोशिका से निर्मित होता है |
  • ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि पृथ्वी का 80 प्रतिशत ऑक्सीजन इनके द्वारा उत्पादित किया जाता है |
  • पादप प्लवक का सबसे सामान्य प्रकार डायटम है |
  • कशाभी (Dinoflagellates ) पादप एवं जंतु दोनों प्रकार के होते हैं , अपने शरीर के खांचे में दो कशाभिका का उपयोग करके वे पानी में खुद को संचालित कर सकते हैं , तथा साथ ही पौधों की तरह वे अपना भोजन भी खुद से तैयार कर सकते हैं |
  • उनका कुल जैवभार भूमि पर सभी पादपों के जैव भार से कई गुणा अधिक होता है तथा वे जलीय पर्यावरण में “ चारागाह स्थल” के रूप में कार्य करते हैं | 

पादप प्लवक को प्रभावित करने वाले कारक –

  • प्रकाश सीधे तौर पर प्रकाश संश्लेषण की दर को प्रभावित करता है तथा प्रकाश के आधिक्य पर निर्भरता के अतिरिक्त पादप प्लवक केवल महासागरो के ऊपरी परतों में सीमित हैं |
  • पोषक तत्त्व : नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस प्रमुख अकार्बनिक पोषक तत्व हैं जो पादप प्लवक की वृद्धि तथा प्रजनन के लिए आवश्यक हैं |
  • डायटम तथा सिलिकॉन फ्लेजिलेट को भी बड़ी मात्रा में सिलिकेट की आवश्यकता होती है |
  • नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले कुछ पादप प्लवक भी उपस्थित होते हैं |
  • इसके अतिरिक्त लोहे के निशानों का इस्तेमाल किया जाता है जो महासागरों के बड़े  क्षेत्रों  में पादप प्लवक की वृद्धि को सीमित करते हैं |
  • तापमान : तापमान में वृद्धि के साथ प्रकाश संश्लेषण की दर में वृद्धि होती है किन्तु एक बिंदु पर पंहुचने के बाद यह तेजी से गिरता है |
  • प्रकाश के साथ-साथ तापमान शीतोष्ण अक्षांशों में  पादप प्लवक के उत्पादन की ऋतुकालीन भिन्नता को प्रभावित करता है |
  • लवणता प्राथमिक उत्पादन को प्रभावित करती है |
  • जंतुप्लवक चारण : यह पादप प्लवक की खड़ी फसल को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारणों में से एक है , तथा साथ ही इससे उत्पादन की दर भी प्रभावित होती है |
  • वितरण : समुद्री पादप प्लवक पूरे विश्व के महासागरो में एकरूपता से वितरित नहीं हैं |
  • सबसे अधिक सांद्रता अधिक उंचाई वाले क्षेत्रों में पायी जाती है, जहाँ महाद्वीपीय चट्टानों पर उमड़ने वाले क्षेत्र इसके अपवाद हैं, जबकि उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में 10 से 100 गुणा कम सांद्रता होती है |
  • पोषक तत्वों, तापमान, लवणता और प्रकाश उपलब्धता के अलावा; सौर यूवी-बी विकिरण के जोखिम का उच्च स्तर जो कि सामान्यतः उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में  होता है, वह पादप प्लवक के वितरण में एक भूमिका निभा सकता है |
  • पादप प्लवक की उत्पादकता सुप्रकाशित क्षेत्र तक सीमित है ,जल स्तम्भ की ऊपरी परत जिसमें शुद्ध उत्पादकता की सहायता करने के लिए पर्याप्त रोशनी मौजूद होती है |
  • सुप्रकाशित क्षेत्र में जीवों की स्थिति को हवा तथा लहरों की क्रियाएं प्रभावित करती हैं | 

Importance of Phytoplankton

Food web- phytoplanktons (primary producers) are the foundations of aquatic food web.

Small fishes and invertebrates graze on the phytoplanktons, and then those smaller animals are eaten by bigger ones.

Climate and carbon cycle Phytoplanktons are responsible for most of the transfer of carbon dioxide from the atmosphere to the ocean.Carbon dioxide is consumed during Photosynthesis, and the carbon is incorporated in the phytoplankton, just as carbon is stored in the wood and leaves of a tree.

  • Most of the carbon is returned to near-surface waters when phytoplankton are eaten or decompose, but some falls into the ocean depths.
  • worldwide , this “biological carbon pump” transfers about 10 gigatonnes of carbon from the atmosphere to the deep ocean each year.
  • Even small changes in the growth of phytoplankton may affect atmospheric carbon dioxide concentrations, which would feed back to global surface temperatures. 

पादप प्लवक का महत्व :

खाद्य जाल : पादप प्लवक (प्राथमिक उत्पादक ) जलीय खाद्य जाल की नींव होते हैं |

छोटी मछलियाँ तथा अकशेरुकी जीव इन पादप प्लवकों को चरते हैं , तथा फिर उन छोटे जीवों को बड़े जीवों के द्वारा खा लिया जाता है |

जलवायु तथा कार्बन चक्र :

पादप प्लवक वायुमंडल से महासागर तक कार्बन डाइऑक्साइड के अधिकांश स्थानांतरण के लिए जिम्मेदार होते हैं |

कार्बन डाइऑक्साइड का उपभोग प्रकाश संश्लेषण के दौरान कर लिया जाता है , तथा यह कार्बन पादप प्लवक में सम्मिलित हो जाता है , उसी प्रकार जैसे कार्बन लकड़ियों तथा वृक्ष की पत्तियों में संचित होता है |

  • जब पादप प्लवक खा लिए जाते हैं अथवा अपघटित होते हैं, तब अधिकांश कार्बन नजदीकी सतही जल में वापिस आ जाता है , लेकिन इसकी कुछ मात्रा महासागर की गहराइयों में चली जाती है |
  • पूरी दुनिया में , यह “जैविक कार्बन पंप” लगभग प्रतिवर्ष 10 गीगाटन कार्बन वायुमंडल से गहरे समुद्र में स्थानांतरित करता है |
  • यहाँ तक कि पादप प्लवक की वृद्धि में छोटे परिवर्तन भी वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता को प्रभावित कर सकते हैं,  

Zooplankton –

  • It is second step in the traditional food chain of the ocean i.e they eat phytoplankton and are themselves eaten by small fishes.
  • Crustaceans are most important members of zooplankton
  • They are more abundant within mangrove water-ways than in adjacent coastal waters, and a large proportion of the juvenile fish of mangrove habitat are zooplanktivorous.
  • Zooplankton may be carnivorous, omnivorous or detrivorous
  • They are used for assessing the productivity vis-a-vis fishery resource, fertility and health status of the ecosystem 

जंतु प्लवक –

  • यह पारंपरिक खाद्य श्रृंखला की दूसरी सीढ़ी है अर्थात् वे पादप प्लवक को खाते हैं तथा बाद में उन्हें छोटी मछलियाँ खा लेती हैं |
  • क्रस्टेशियन, जंतु प्लवक के सबसे महत्वपूर्ण सदस्य होते हैं |
  • वे समीपवर्ती तटीय जल की तुलना में मैन्ग्रोव जल में अधिक प्रचुरता से पाए जाते हैं , तथा मैन्ग्रोव आवास की अल्पायु मछलियों की बड़ी मात्रा जंतुप्लवक को खाने वाली होती है |
  • जंतु प्लवक मांसाहारी, सर्वहारी अथवा अपरदाहारी हो सकते हैं |
  • उनका उपयोग पारितंत्र के मत्स्य संसाधन, उर्वरता तथा स्वास्थ्य स्थिति की तुलना में उत्पादकता के आकलन के लिए किया जाता है | 

Sea-Grass –

  • They are submerged flowering plants found in shallow marine waters, such as bays and lagoons.
  • Sea grasses provide food, habitat and nursery areas for numerous vertebrate and invertebrate species
  • Seagrasses performs functions like- stabilizing the sea bottom, providing food and habitat for other marine organisms, maintaining water quality, supporting local economies.
  • Stabilization- extensive root system in sea grasses, which extends both vertically and horizontally, helps stabilize the sea bottom.
  • Food While some organisms, including endangered florida manatee and green sea turtle graze directly on seagrass leaves
  • Nursery areas the relative safety of seagrass meadows provide an ideal environment for juvenile fish and invertebrates to conceal themselves from predators. Seagrass leaves are also ideal for attachment of larvae and eggs.
  • Habitat species such as clams, worms, crabs, and echinoderms like starfishes, sea cucumbers and sea urchin use buffering capability of seagrasses to provide a refuge from strong currents.
  • Water quality it help trap find sediments and particles that are suspended in the water column, which increases water clarity.

समुद्री घास –

  • वे पुष्पों वाले जलमग्न पादप होते हैं जो उथले समुद्री जल, जैसे खाड़ियों तथा लैगून में पाए जाते हैं |
  • समुद्री घास कई कशेरुकी तथा अकशेरुकी प्रजातियों को भोजन, आवास, तथा शिशु पालन के लिए स्थल प्रदान करती है |
  • समुद्री घास इस तरह के कार्य करती है- समुद्र तल को स्थिर करना, अन्य समुद्री जीवों को भोजन एवं आवास प्रदान करना, पानी की गुणवत्ता को बनाए रखना, स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं की सहायता करना |
  • स्थिरीकरण : समुद्री घासों के विस्तृत जड़ तंत्र , जो उर्ध्वार्धर एवं क्षैतिज दोनों तरह से फैले होते हैं, समुद्र तल को स्थिर करने में सहायक होते हैं |
  • भोजन- जहाँ कुछ जीव, जिसमें संकटग्रस्त फ्लोरिडा मानाती एवं हरे समुद्री कछुए भी शामिल हैं , वे प्रत्यक्ष रूप से समुद्री घास की पत्तियों को खाते हैं |
  • नर्सरी क्षेत्र : समुद्री घास चारागाहों की सापेक्षिक सुरक्षा अल्पायु मछलियों तथा अकशेरुकियों को शिकारियों से खुद को छुपाने के लिए आदर्श वातावरण प्रदान करती है  | समुद्री घास की पत्तियां लार्वा तथा अण्डों की आसक्ति के लिए भी आदर्श है |
  • आवास : बड़ी सीपी, कृमि, केकड़े, तथा शूलचर्मी, जैसे स्टारफिश, समुद्री खीरे एवं समुद्री साही,  समुद्री घास की प्रतिरोधक क्षमता का उपयोग मजबूत धाराओं से बचने के लिए आश्रय के रूप में करते हैं |
  • जल की गुणवत्ता : यह गाद एवं कणों को ढूंढने में जाल की  सहायता करता है, जो जल स्तम्भ में निलंबित रहते हैं | इससे जल की शुद्धता में वृद्धि होती है |

Threats to Sea Grass Beds –

Eutrophication, siltation, trawling, coastal engineering constructions and over exploitation for commercial purposes are the major threats for seagrass beds

Management –

The most common approach to conserving seagrass ecosystems to reduce common threats to them(pollution, damage by boats)

समुद्री घास तलों के लिए खतरे

सुपोषण, गाद निक्षेपण, मछली पकड़ने का कार्य, तटीय अभियांत्रिकी निर्माण, तथा वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए इसका अति दोहन,  समुद्री घास तलों के लिए प्रमुख खतरे हैं |

प्रबंधन

समुद्री घास पारितंत्र को संरक्षित करने का सबसे सामान्य दृष्टिकोण यह है कि उनके सामान्य खतरों को कम किया जाए ( प्रदूषण , नौकाओं के द्वारा होने वाला नुकसान )

Seaweeds

  • They are macroscopic, multicellular, marine algae.
  • Seaweeds, the larger and visible marine plants are found attached to rocks, corals and other submerged strata in the intertidal and shallow sub tidal zones of the sea.
  • Seaweed supports primary production levels that are 6-10 times greater that the most intensive land based agricultural systems.
  • Seagrasses are amongst the fastest growing organisms on the planet.
  • Based on the colour of their pigmentation, sea weeds are broadly classified into different classes such as Blue-green, green, brown, red etc.

Uses of Seaweeds-

  • Green seaweeds- eaten as a green vegetable in salads and soups, are known to help in preventing cancer, heart disease and strokes
  • Brown seaweeds- considered as excellent detoxifying agent. They produce alginate a substance of considerable economic value and used as a gelling and emulsifying agent. Widely used as fertiliser and plant growth regulator.
  • Seaweeds are used as drug for goiter treatment, intestinal and stomach disorders.
  • Extracts of some seaweeds species show antibacterial activity.

Harmful Effects of Seaweeds –

Rotting seaweed is a potent source of hydrogen sulfide, a highly toxic gas, and has been implicated in some incidents of apparent hydrogen-sulphide poisoning. It can cause vomiting and diarrhoea.

समुद्री शैवाल –

  • वे सूक्ष्मजीवीय, बहुकोशिकीय समुद्री शैवाल हैं|
  • समुद्री शैवाल, बड़े एवं दृश्यमान समुद्री पौधे हैं जो समुद्र के अंतर्ज्वारीय तथा उप-ज्वारीय क्षेत्रों में चट्टानों, प्रवालो तथा अन्य जलमग्न स्तरों से संलग्न पाए जाते हैं |
  • समुद्री शैवाल प्राथमिक उत्पादन स्तर  में सहायता करते हैं जो स्थल आधारित कृषि प्रणालियों से 6 से 10 गुणा अधिक बड़े हैं |
  • समुद्री घास इस ग्रह के सबसे तेजी से वृद्धि कर रहे जीवों में से एक हैं |
  • उनके रंजक के रंग के आधार पर, समुद्री शैवालों को मोटे तौर पर विभिन्न वर्गों में विभाजित किया जाता है | जैसे  – नील हरित, हरे, भूरे, लाल आदि |

समुद्री शैवालों का उपयोग :

  • हरित समुद्री शैवाल : सलाद तथा सूप में हरी सब्जी के रूप में खाए जाते हैं , तथा इन्हें कैंसर, दिल की बीमारियाँ, एवं आघात के रोकथाम के लिए जाना जाता है |
  • भूरे समुद्री शैवाल : इन्हें एक अति-उत्कृष्ट विषहर्ता एजेंट के रूप में माना जाता है | वे एल्गिनेट उत्पादित करते हैं , जो आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाने वाला पदार्थ है तथा जिसका इस्तेमाल एवं पायसीकारी एजेंट के रूप में किया जाता है | इसका उपयोग उर्वरक तथा पादप वृद्धि नियामक के रूप में भी किया जाता है |
  • समुद्री शैवालों का उपयोग घेंघा, आंत एवं पेट सम्बन्धी विकारों  के उपचार के लिए औषधि के रूप में किया जाता है |
  • समुद्री शैवालों की कुछ प्रजातियों के अर्क  जीवाणुरोधी क्रिया का प्रदर्शन करते हैं |

समुद्री शैवालों के हानिकारक प्रभाव :

सड़ रहे समुद्री शैवाल हाइड्रोजन सल्फाइड के शक्तिशाली स्रोत हैं , जो एक बेहद विषैली गैस है तथा तथा हाइड्रोजन सल्फाइड विषाक्तीकरण की कुछ प्रत्यक्ष घटनाओं में शामिल रही है | इसकी वजह से उल्टियाँ एवं दस्त हो सकते हैं |

 

 

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