Indian Polity 2018 Study Notes for UPSC IAS Civil Services Exam

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Finance Commission

  • Art. 280 of the Constitution of India provides for a Finance Commission as a quasi judicial body.
  • It is constituted by the President of India every fifth year or at earlier time as he considers necessary.
  • Its main function is to give its recommendations on distribution of tax revenues between the Union and the States and amongst the States themselves.
  • The recommendations made by the Finance Commission are only of advisory nature.

वित्त आयोग-

  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 280 में एक अर्ध न्यायिक निकाय के तौर पर वित्त आयोग की व्यवस्था की गई है |
  • इसका गठन राष्ट्रपति द्वारा हर पांचवें वर्ष या आवश्यकतानुसार उससे पहले किया जाता है |
  • इसका मुख्य कार्य केंद्र और राज्य एवं राज्यों के बिच कर राजस्व के वितरण की इसकी सिफारिश करना है |
  • वित्त योग के द्वारा दी गई सिफारिशें सलाहकारी प्रकृति की होती है | 

Composition of Finance Commission 

  • The Finance Commission consists of a chairman and 4 other members to be appointed by the President.
  • They hold office for such period as specified by the President in his order.
  • They are eligible for reappointment.
  • Parliament may by law determine the qualifications which shall be requisite for appointment as members of the Commission and the manner in which they shall be selected.
  • Accordingly, the provisions contained in the Finance Commission Act, 1951 and the Finance Commission (Salaries and Allowances) Rules, 1951, require that the Chairman of the Commission is selected from among persons who have had experience in public affairs, and the 4 other members are selected from amongst the following:
    • A judge of high court or one qualified to be appointed as one.
    • A person who has specialised knowledge of finance and accounts of the government.
    • A person who has wide experience in financial matters and in administration.
    • A person who has special knowledge of economics.
  • The First Finance Commission was constituted vide Presidential Order in 1951 under the Chairmanship of Shri K.C. Neogy on 1952. 14 Financial Commissions have been appointed so far.

वित्त आयोग की बनावट –

  • वित्त आयोग में एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य होते हैं, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है |
  • उनका कार्यकाल राष्ट्रपति के आदेश के तहत तय होती है |
  • उनकी पुनर्नियुक्ति भी हो सकती है |
  • संसद इन सदस्यों की योग्यता और चयन के तरीके करने का निर्धारण कानून द्वारा करता है |
  • वित्त आयोग अधिनियम, 1951 और वित्त आयोग ( वेतन एवं भत्ते ) नियम, 1951 में शामिल प्रावधानों के अनुसार आयोग के अध्यक्ष का चुनाव उन व्यक्तियों में किया जाता है जिन्हें लोक मामलों में अनुभव होता है और अन्य चार सदस्य  निम्नलिखित में से चुने जाते हैं :
    • किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या इस पद के लिए योग्य व्यक्ति |
    • ऐसा व्यक्ति जिसे भारत के लेखा एवं वित्त मामलों का विशेष ज्ञान हो |
    • ऐसा व्यक्ति जिसे प्रशासन एवं वित्तीय मामलों का व्यापक अनुभव हो |
    • ऐसा अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञाता हो |
  • 1951 में राष्ट्रपति आदेश के द्वारा श्री के. सी. नोगी की अध्यक्षता में 1952 में पहली वित्त आयोग का गठन किया गया | इसके बाद अब तक 14 वित्त आयोग का गठन किया जा चुका है | 

Functions of the Finance Commission –

It is the duty of Finance Commission to make recommendations to the President on the following matters:

  • The distribution of the net proceeds of taxes to be shared between the Centre and the states, and the allocation between the states of the respective shares of such proceeds.
  • The principles that should govern the grants-in-aid to the states by the Centre (i.e., out of the Consolidated Fund of India).
  • The measures needed to augment the Consolidated Fund of a State to supplement the resources of the Panchayats and the Municipalities in the state on the basis of the recommendations made by the state finance commission.
  • Any other matter referred to it by the President in the interests of sound finance.
  • The commission submits its report to the President. He lays it before both the Houses of Parliament along with an explanatory memorandum as to the action taken on its recommendations.

वित्त आयोग के कार्य-

यह वित्त आयोग का दायित्व है कि वह राष्ट्रपति को निम्नलिखित मामलों पर सिफारिशें करे :

  • संघ और राज्यों के बीच करो के शुद्ध आगामों का वितरण और राज्यों के बीच ऐसे आगमों का आवंटन |
  • भारत की संचित निधि में से राज्यों के राजस्व में सहायता अनुदान को शासित करने वाले सिद्धांत |
  • राज्य वित्त आयोग द्वारा की गई सिफारिशों के आधार पर राज्य में नगरपालिका और पंचायतों के संसाधनों की अनुपूर्ति के लिए राज्य की संचित निधि के संवर्धन के लिए आवश्यक उपाय |
  • राष्ट्रपति द्वारा आयोग को सुदृढ़ वित्त के हित में निर्दिष्ट कोई अन्य विषय |
  • आयोग अपना प्रतिवेदन राष्ट्रपति को सौंपता है | वह इसे संसद के दोनों सदनों में पेश करता है और साथ ही उसका आकलन सम्बन्धी ज्ञापन एवं इस सम्बन्ध में उठाये जा सकने वाले क़दमों के बारे में विवरण भी रखता है |

Impact of the Planning Commission

  • The setting up of the Planning Commission has in practice restricted the scope and functions of the Finance Commission.
  • The Finance Commission can consider both capital and revenue requirements of the states in formulating a scheme of devolution and in recommending grants under Art. 275 of the Constitution. But setting up to Planning Commission has led to overlapping of functions.
  • The main function of Finance Commission now is to determine the revenue gap of each state and providing for filling up the gap by a scheme of devolution, partly by a distribution of taxes and duties and partly by grants-in-aid. 

योजना आयोग का प्रभाव-

  • योजना आयोग के गठन ने वित्त आयोग के कार्यों और क्षेत्र पर प्रतिबन्ध लगाया है |
  • वित्त आयोग संविधान के अनुच्छेद 275 के तहत राज्यों के पूंजी और राजस्व दोनों आवश्यकताओं  के अनुदानों की सिफारिश करने में और हस्तान्तातरण की योजना को तैयार करने में विचार विमर्श कर सकता है | लेकिन योजना आयोग के गठन ने कार्यों का हस्तक्षेप किया है |
  • वित्त आयोग का मुख्य कार्य अब प्रत्येक राज्य के राजस्व का अंतर का निर्धारण करना और इस अंतर को हस्तांतरण की योजना द्वारा भरना, जो कि आंशिक रूप से करों और शुल्कों के वितरण द्वारा औए आंशिक रूप से सहायता अनुदान द्वारा, है | 

Evolution of NCSC and NCST

  • Originally, Art. 338 of the Constitution provided for the appointment of a Special Officer for SCs and STs to investigate all matters related to the constitutional safeguards for the SCs and STs and to report to the President on their working. He was designated as the Commissioner for SCs and STs.
  • An amendment was made in the Art. 338 of the Constitution on the demand of members of the Parliament that the office of the Commissioner was not enough to monitor the implementation of constitutional safeguards replacing one member system with a multi-member system.
  • In 1978, the Government set up a non-statutory multi-member Commission for SCs and STs; the Office of Commissioner for SCs and STs also continued to exist.
  • In 1987, the Government modified the functions of the Commission and renamed it as the National Commission for SCs and STs.
  • By 65th Constitutional Amendment Act, 1990, a high level multi-member National Commission for SCs and STs in the place of a single Special Officer for SCs and STs.
  • The 89th Amendment Act bifurcated this Commission into National Commission for SC (under Art. 338) and National Commission for ST (under Art. 338-A). Year 2003

एनसीएससी और एनसीएसटी का उदय-

  • मूल रूप से, संविधान के अनुच्छेद 338 में अनु जाति और जनजाति के संवैधानिक सरंक्षण से सम्बंधित सभी मामले की जाँच करने और इसपर राष्ट्रपति को सूचित करने के लिए अनु जाति और जनजाति के लिए एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति की व्यवस्था की गई है | उसे अनु जाति और जनजाति के लिए आयुक्त की संज्ञा दी गई |
  • संसद के सदस्यों की मांग पर संविधान के अनुच्छेद 338 में संशोधन किया गया कि आयुक्त संवैधानिक सरंक्षण के कार्यान्वयन को करने में सक्षम नहीं था तो इस एक सदस्यीय प्रणाली को बहुसदस्यीय प्रणाली में बदल दिया गया |
  • 1978 में सरकार ने अनु जाति और जनजाति के लिए एक गैर-विधायी आयोग का गठन किया ; और इसके साथ अनु जाति और जनजाति के आयोग का पद भी जारी रहा |
  • 1987 में सरकार ने आयोग के कार्यों को संशोधित किया और इसका नाम बदलकर अनु जाति और जनजाति के लिए राष्ट्रीय आयोग कर दिया |
  • 65वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1990 द्वारा एक अनु जाति और जनजातियों के लिए एक विशेष अधिकारी के स्थान पर एक उच्च स्तरीय बहुसदस्यीय राष्ट्रीय अनु जाति और जनजाति आयोग की स्थापना की गई |
  • 89वें संशोधन अधिनियम के द्वारा इस आयोग को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ( अनुच्छेद 338 के अंतर्गत )  और अनुसूचित जनजाति के लिए राष्ट्रीय आयोग ( अनुच्छेद 338-क के अंतर्गत ) में विभाजित कर दिया गया |

Composition of NCSC and NCST

  • The Commission shall consist of a Chairperson, a Vice-Chairperson and three other members.
  • They are appointed by the President by warrant under his hand and seal.
  • Their conditions of service and tenure of office are also determined by the President.

एनसीएससी और एनसीएसटी की बनावट-

  • आयोग में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष एवं तीन अन्य सदस्य हैं |
  • वे राष्ट्रपति द्वारा उसके आदेश एवं मुहर लगे आदेश द्वारा नियुक्त किये जाते हैं |
  • उनकी सेवा की शर्तें और कार्यकाल भी राष्ट्रपति द्वारा ही निर्धारित किये जाते हैं |

Functions of the NCSC and NCST

  • To investigate and monitor all matters relating to the constitutional and other legal safeguards for the SCs/STs and to evaluate their working.
  • To inquire into specific complaints with respect to the deprivation of rights and safeguards of the SCs/STs.
  • To participate and advise on the planning process of socio-economic development of the SCs/STs and to evaluate the progress of their development under the Union or a state.
  • To present to the President, annually and at such other times as it may deem fit, reports upon the working of those safeguards.
  • To make recommendations as to measures that should be taken by the Union or a state for the effective implementation of those safeguards and other measures for the protection, welfare and socio-economic development of the SCs/STs.
  • To discharge such other functions in relation to the protection, welfare and development and advancement of the SCs/STs as the President may specify.

एनसीएससी और एनसीएसटी के कार्य-

  • अनुसुच्चित जातियों / जनजातियों के सरंक्षण से सम्बंधित सभी मामलों का निरीक्षण एवं अधीक्षण करना तथा उनके क्रियान्वयन की समीक्षा करना |
  • अनुसूचित जातियों / जनजातियों के हितों का उल्लंघन करने वाले किसी मामले की जाँच-पड़ताल एवं सुनवाई करना |
  • अनुसूचित जातियों / जनजातियों के समाजार्थिक विकास से सम्बंधित योजनाओं के निर्माण के समय सहभागिता निभाना  एवं संघशासित प्रदेशों एवं अन्य राज्यों में उनके विकास से सम्बंधित कार्यों का निरीक्षण एवं मूल्याङ्कन करना |
  • इनके सरंक्षण के सम्बन्ध में उठाये गए क़दमों एवं किये जा रहे कार्यों के बारे में राष्ट्रपति को प्रतिवर्ष या जब भी आवश्यक हो प्रतिवेदन प्रस्तुत करना |
  • इन सरंक्षात्मक उपायों के सन्दर्भ में केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा उठाए गए क़दमों की समीक्षा करना एवं इस सम्बन्ध में आवश्यक सिफारिशों तथा अनुसूचित जातियों / जनजातियों के समाजार्थिक विकास एवं लाभ के लिए प्रयास करना |
  • यदि राष्ट्रपति आदेश दे तो अनुसूचित / जनजातियों के समाजार्थिक विकास, हितों के सरंक्षण एवं संवैधानिक सरंक्षण से सम्बंधित सौंपे गए किसी अन्य कार्य को संपन्न करना |

Report of the NCSC and NCST

  • The Commission presents an annual report to the President. It can also submit a report as and when it thinks necessary.
  • The President places all such reports before the Parliament, along with a memorandum explaining the action taken on the recommendations made by the Commission. The memorandum should also contain the reasons for the non-acceptance of any of such recommendations.
  • The President also forwards any report of the Commission pertaining to a state government to the state governor. The Governor places it before the state legislature, along with a memorandum explaining the action taken by the recommendations of the Commission. The memorandum should also contain the reasons for the non-acceptance of any of such recommendations.

एनसीएससी और एनसीएसटी का प्रतिवेदन-

  • आयोग अपना वार्षिक प्रतिवेदन राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है | वह जब भी उचित समझे अपना प्रतिवेदन दे सकता है |
  • राष्ट्रपति इस प्रतिवेदन को संसद में आयोग द्वारा की गई सिफारिशों पर किये गए कार्यों के ज्ञापन के विवरण के साथ पेश करता है | इस ज्ञापन में उन सिफारिशों को अस्वीकृत करने के कारण भी शामिल होने चाहिए |
  • राष्ट्रपति किसी राज्य सरकार से सम्बंधित किसी आयोग के प्रतिवेदन को भी राज्य के राज्यपाल के पास भेजता है | राज्यपाल इसे आयोग की सिफारिशों पर की गई कारवाई का उल्लेख करते हुए ज्ञापन के साथ राज्य विधानमंडल के समक्ष पेश करता है | इस ज्ञापन में ऐसी किन्हीं सिफारिशों को स्वीकार नहीं किये जाने के कारण भी होने चाहिए |

Powers of the NCSC and NCST

The Commission, while investigating any matter or inquiring into any complaint, has all the powers of a civil court trying a suit and in particular in respect of the following matters:

  • Summoning and enforcing the attendance of any person from any part of India and examining him on oath.
  • Requiring the discovery and production of any document.
  • Requiring evidence on affidavits.
  • Requisitioning any public record from any court or office.
  • Issuing summons for the examination of witnesses and documents.
  • Any other matter which the President may determine.
  • The Central government and the state governments are required to consult the Commission on all major policy matters affecting the SCs/STs.
  • The National Commission for SCs has to investigate all matters relating to the constitutional and other legal safeguards for the OBCs and the Anglo-Indian Community and report to the President upon their working.

एनसीएससी और एनसीएसटी की शक्तियां-

जब आयोग किसी कार्य की जांच-पड़ताल कर रहा हो या किसी शिकायत की जाच कर रहा है तो इसे दीवानी न्यायालय की शक्तियां प्राप्त होंगी, जहाँ याचिका दायर की जा सकती है तथा विशेषकर निम्नांकित मामलों में :

  • भारत के किसी भी भाग से किसी व्यक्ति को समन करना और हाज़िर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना ;
  • किसी दस्तावेज को प्रकट और पेश करने करने की अपेक्षा करना ;
  • शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना ;
  • किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख की अपेक्षा करना ;
  • साक्षियों और दस्तावेजों की परीक्षा के लिए समन निकालना |
  • कोई अन्य विषय जो राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित किया जा सकता है |
  • संघ और प्रत्येक राज्य सरकार अनुसूचित जातियों / जनजातियों को प्रभावित करने वाली सभी महत्वपूर्ण नीतिगत विषयों पर आयोग से परामर्श करेगी |
  • अनुसूचित जातियों की राष्ट्रीय आयोग पिछड़े वर्गों एवं आंग्ल-भारतीय समुदाय के संवैधानिक सरंक्षण एवं अन्य विधिक सरंक्षणों के सम्बन्ध में भी जाँच करेगा और इस सम्बन्ध में राष्ट्रपति को इसका प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगा |

Other Functions of NCST

In 2005, the President specified the following other functions of the Commission in relation to the protection, welfare and development and advancement of STs:

  • Measures to be taken over conferring ownership rights in respect of minor forest produce to STs living in forest areas.
  • Measures to be taken to safeguard rights of the tribal communities over mineral resources, water resources etc., as per law.
  • Measures to be taken for the development of tribals and to work for more viable livelihood strategies.
  • Measures to be taken to improve the efficacy of relief and rehabilitation measures for tribal groups displaced by development projects.
  • Measures to be taken to prevent alienation (अलगाव की भावना ) of tribal people from land and to effectively rehabilitate such people in whose case alienation has already taken place.
  • Measures to be taken to elicit maximum cooperation and involvement of tribal communities for protecting forests and undertaking social afforestation.
  • Measures to be taken to ensure full implementation of the Provisions of Panchayats (Extension to the Scheduled Areas) Act, 1996.
  • Measures to be taken to reduce and ultimately eliminate the practice of shifting cultivation by tribals that lead to their continuous disempowerment and degradation of land and the environment.

एनसीएसटी के अन्य कार्य-

2005 में अनुसूचित जनजातियों के विकास, कल्याण, उन्नति और सरंक्षण के सम्बन्ध में आयोग के निम्नलिखित अन्य कार्यों को राष्ट्रपति ने निर्दिष्ट किया :

  • जंगली क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों के जीवन यापन के लिए एक छोटे से वन के सम्बन्ध में स्वामित्व प्रदान करने के लिए उपाय किये जाने चाहिए |
  • कानून के अनुसार खनिज स्रोत, जल स्रोत इत्यादि के ऊपर जनजाति समुदाय के अधिकारों का सरंक्षण के लिए उपाय किये जाने चाहिए |
  • जनजातियों के विकास एवं और अधिक व्यवहार्य आजीविका रणनीतियों के लिए कार्य करने के लिए उपाय लिए जाने चाहिए |
  • विकास योजनाओं के द्वारा हटाये गए जनजाति समूहों के लिए पुनःस्थापन के लिए उपाय और राहत के प्रभावोत्पादकता को बेहतर बनाने के लिए उपाय किये जाने चाहिए |
  • जनजाति लोगों के जमीन से स्वत्वाधिकार के अंतरण को रोकने के लिए और जिन लोगों के मामले में स्वत्वाधिकार का अंतरण पहले ही हो चुका है उनके पुनः स्थापन के लिए उपाय किये जाने चाहिए |
  • सामाजिक वनरोपण शुरू करने और जंगलों की रक्षा के लिए जनजाति समुदायों की अधिकतम सहयोग और भागीदारी को शामिल करने के लिए उपाय किये जाने चाहिए |
  • पंचायत के प्रावधान के पूर्ण संलग्नता  (अनुसूचित क्षेत्रों के विस्तार ) अधिनियम, 1996 के लिए उपाय किये जाने चाहिए |
  • जनजातियों द्वारा झूम खेती के प्रचलन को कम करने तथा अंततः समाप्त करने सम्बन्धी उपाय, जिसके कारण उनके लगातार अशक्तिकरण के साथ भूमि तथा पर्यावरण का अपरदन होता है |

 

 

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