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Swarajist, No changers and Revolutionary Terrorism in 1920s

Swarajists and No-Changers

Genesis of Congress-Khilafat Swarajya Party

  • After Gandhi’s arrest (March 1922), there was disintegration, disorganisation and demoralisation among nationalist ranks.
  • A debate started among Congressmen on what to do during the transition period, i.e., the passive phase of the movement.
  • One section led by C.R. Das, Motilal Nehru and Ajmal Khan wanted an end to the boycott of legislative councils so that the nationalists could enter them to expose the basic weaknesses of these assemblies.
  • They wanted to use these councils as an arena of political struggle to arouse popular enthusiasm.
  • Those advocating entry into legislative councils came to be known as the Swarajists.

Swarajists’ Arguments

  • Entering the councils would not negate the non-cooperation programme; in fact, it would be like carrying on the movement through other means.
  • In a time of political vacuum, council work would serve to enthuse the masses and keep up their morale.
  • Entry of nationalists would deter the Government from stuffing the councils with undesirable elements.

No-Changers’ Arguments

  • Parliamentary work would lead to neglect of constructive work, loss of revolutionary zeal and to political corruption.
  • Constructive work would prepare everyone for the next phase of civil disobedience.

The Swarajist Manifesto for Elections

  • Released in October 1923
  • It said- the guiding motive of the British in governing India is to secure selfish interests of their own country.
  • The real objective being to continue exploitation of the unlimited resources of the country by keeping.

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स्वराज्यवादी तथा यथास्थितिवादी (परीवर्तन विरोधी )

कांग्रेस-ख़िलाफ़त स्वराज्य पार्टी का उदय:

  • गाँधी जी की गिरफ्तारी ( मार्च 1922 )  के बाद राष्ट्रवादी खेमे में बिखराव आने लगा,संगठन टूटने लगा तथा नेताओं का मनोबल गिरने लगा |
  • कांग्रेसियों के बीच एक बहस शुरू हुई कि संक्रमण काल अर्थात आंदोलन के निष्क्रिय चरण में कौन सा रस्ता अपनाया जाये |
  • वे इन परिषदों का प्रयोग राजनीतिक संघर्ष की रणभूमि के रूप में करना चाहते थे ताकि लोगों के उत्साह को जगाया जा सके |
  • विधान परिषदों में प्रवेश की वकालत करने वाले स्वराज्यवादी कहलायें |

स्वराज्यवादियों के तर्क :

  • विधान परिषद में प्रवेश से असहयोग आन्दोलन की प्रगति अवरुद्ध नही होगी इससे आन्दोलन और प्रभावी बनेगा तथा इस से संघर्ष के नए द्वार खुलेंगे
  • राजनीतिक शुन्यता के समय में, परिषद का कार्य लोगों को उत्साहित करने तथा उनके मनोबल को ऊँचा रखने  में सहायता करेगा |
  • राष्ट्रवादियों का प्रवेश सरकार को परिषद में अवांछनीय तत्वों को प्रवेश कराने से रोकेगा |

परीवर्तन विरोधियों  के तर्क :

  • संसदीय कार्य,  रचनात्मक कार्यों की उपेक्षा, क्रांतिकारी उत्साह में गिरावट एवं राजनीतिक भ्रष्टाचार की वजह बनेगा |
  • रचनात्मक कार्य हर किसी को सविनय अवज्ञा के अगले चरण के लिए तैयार करेंगे |

चुनावों के लिए स्वराज्यवादियों का घोषणापत्र

  • अक्टूबर 1923 में जारी किया गया |
  • भारत पर अंग्रेजी हुकुमत का मुख्य लक्ष्य इंग्लैंड के स्वार्थी हितों की पूर्ति करना था |
  • वास्तविक उद्देश्य देश के असीमित संसाधनों का दोहन जारी रखना है |

Gandhi’s Attitude

  • Gandhi was initially opposed to the Swarajist proposal of council entry.
  • But after his release from prison on health grounds in February 1924, he gradually moved towards a reconciliation with the Swarajists because:
  • He felt public opposition to the programme of council entry would be counter-productive;

Swarajist Activity in Councils

  • By 1924, the Swarajist position had weakened because of widespread communal riots, split among Swarajists themselves on communal and Responsivist-Non-responsivist lines, and the death of C.R. Das in 1925 weakened it further.
  • The Responsivists among Swarajists: Lala Lajpat Rai, Madan Mohan Malaviya and N.C. Kelkar

Achievements of Swarajists:

  • With coalition partners, they outvoted the Government several times, even on matters relating to budgetary grants, and passed adjournment motions.
  • They agitated through powerful speeches on self government, civil liberties and industrialisation.

Their Drawbacks

  • Lacked a policy to coordinate their militancy inside legislatures with the mass struggle outside.
  • They relied totally on newspaper reporting to communicate with the public.

Constructive Work by No-Changers

  • Ashrams sprang up where young, men and women worked, among tribals and lower castes (especially in Kheda and Bardoli areas of Gujarat), and popularised charkha and khadi.
  • National schools and colleges were set up where students were trained in a non-colonial ideological framework.
  • Significant work was done for Hindu-Muslim unity, removing untouchability, boycott of foreign cloth and liquor, and for flood relief.

गाँधी का रुख :

  • गाँधी आरम्भ में परिषद में प्रवेश करने के स्वराज्यवादी प्रस्ताव से सहमत नहीं थे |
  • किंतु फरवरी 1924 में  स्वास्थ्य कारणों के आधार पर जेल से छूटने के बाद , वे धीरे-धीरे स्वराज्यवादियों के साथ सुलह करने के लिए बढ़े, क्योंकि : –
  • उन्होंने महसूस किया की विधान परिषदों में हिस्सेदारी आरम्भ हो जाने के पश्चात इससे पीछे हटना या विरोध करने से गलत संदेश जायेगा

परिषदों में स्वराज्यवादी गतिविधि :

  • 1924 तक, व्यापक सांप्रदायिक दंगों के कारण  स्वराज्यवादियों की स्थिति कमज़ोर हुई थी, स्वराज्यवादी, साम्प्रदायिक तथा परिवर्तनवादी एवं यथास्थितिवादी धाराओं में विभाजित हो गए, तथा 1925 में सी.आर. दास की मृत्यु ने इसे और कमज़ोर कर दिया |
  • स्वराज्यवादियों में  परिवर्तनवादी : लाला लाजपत राय, मदन मोहन मालवीय, तथा एन.सी. केलकर |

स्वराज्यवादियों की उपलब्धियाँ :

  • गठबंधन के सहयोगियों के साथ उन्होंने कई बार,  यहाँ तक कि बजटीय मंजूरी से सम्बंधित मामलों में भी सरकार के खिलाफ मतदान किया तथा स्थगन प्रस्ताव पारित किया |
  • उन्होंने स्वराज, नागरिक स्वतंत्रता, तथा औद्योगीकरण पर  शक्तिशाली भाषणों के माध्यम से आंदोलन किया |

स्वराजियों की  कमियाँ :

  • बाहर के व्यापक राजनीतिक संघर्ष तथा सदन के भीतर अपनी जुझारुता  को समन्वित करने की नीति का अभाव |
  • वे जनता से संवाद करने के लिए पूरी तरह से समाचार पत्रों के समाचार लेखन पर निर्भर रहे |

यथास्थितिवादियों द्वारा रचनात्मक कार्य :

  • आश्रमों की स्थापना की गयी जहाँ युवा, पुरुषों , तथा महिलाओं ने जनजातियों तथा निम्न जातियों (विशेष रूप से गुजरात के खेड़ा तथा बरदोली जिले में )  के बीच कार्य किया तथा इन्होने चरखा एवं खादी को लोकप्रिय बनाया |
  • राष्ट्रीय विद्यालयों तथा महाविद्यालयों की स्थापना की गयी जहाँ छात्रों को गैर-उपनिवेशी वैचारिक ढाँचे में प्रशिक्षित किया गया |
  • हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए महत्वपूर्ण कार्य किये गए, छुआछूत की समाप्ति, विदेशी वस्त्रों एवं शराब का बहिष्कार, तथा बाढ़ राहत के लिए भी कार्य किये गये |

Emergence of new forces during the 1920s:

Spread of Marxism and Socialist Ideas

  • These ideas inspired many socialist and communist groups to come into existence and resulted in the rise of a left wing, within the Congress, represented by Jawaharlal Nehru and Subhash Bose.
  • These young nationalists, inspired by the Soviet Revolution and dissatisfied with Gandhian ideas and political programme, began advocating radical solutions for economic, political and social ills of the country.

Activism of Indian Youth

  • All over, students’ leagues were being established and students conferences were being held.

Peasants’ Agitations

  • In the United Provinces these agitations were for revision of tenancy laws, including lower rents, protection against eviction and relief from indebtedness.
  • Similar peasant agitations took place in the Rampa region of Andhra, in Rajasthan, in ryotwari areas of Bombay and Madras.

Growth of Trade Unionism

  • The trade union movement was led by All India Trade Union Congress (AITUC) founded in 1920.
  • Lala Lajpat Rai was its first president and Dewan Chaman Lal its general secretary.
  • Tilak was also one of the moving spirits.
  • The major strikes during the 1920s included those in Kharagpur Railway Workshops,Tata Iron and Steel Works (Jamshedpur), Bombay Textile Mills (this involved 1,50,000 workers and went on for 5 months), and Buckingham Carnatic Mills.

1920 के दशक में नयी शक्तियों का उदय :

मार्क्सवाद तथा समाजवादी विचारों का प्रसार

  • इन विचारों ने कई समाजवादी एवं साम्यवादी समूहों को अस्तित्व में आने के लिए प्रेरित किया तथा इसका परिणाम कांग्रेस के भीतर जवाहरलाल नेहरु तथा सुभाषचंद्र बोस के नेतृत्व में  वाम दल के उदय के रूप में हुआ |
  • सोवियत क्रान्ति से प्रभावित तथा गाँधीवादी विचारों  एवं राजनीतिक कार्यक्रमों से असंतुष्ट ये युवा राष्ट्रवादी देश की आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक समस्याओं के मौलिक समाधान की वकालत करने लगे |

भारतीय युवाओं की सक्रियता :

  • हर जगह छात्रसंघों की स्थापना की जा रही थी तथा छात्र सम्मेलनों का आयोजन किया जा रहा था |

किसानों का आंदोलन :

  • संयुक्त प्रांतों में, ये आंदोलन काश्तकारी क़ानून में संशोधन के लिए किये गए थे, जिनमें भू राजस्व में कमी , बेदखली के विरुद्ध सुरक्षा, तथा कर्जदारी से राहत जैसे मुद्दे शामिल थे |
  • इसी तरह के किसान आंदोलन आंध्र प्रदेश के रामपा क्षेत्र, राजस्थान, बॉम्बे के रैयतवारी क्षेत्रों तथा मद्रास में भी हुए |  

श्रमिक संघवाद का विकास :

  • श्रमिक संघ आंदोलन का नेतृत्व अखिल भारतीय श्रमिक संघ कांग्रेस के द्वारा किया गया था जिसकी स्थापना 1920 में हुई थी |
  • लाला लाजपत राय इसके प्रथम अध्यक्ष थे तथा दीवान चमन लाल इसके महासचिव थे |
  • तिलक ने भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया |
  • 1920 के दशक में हुए मुख्य हड़तालों में खड़गपुर रेलवे वर्क-शॉप, टाटा आयरन एंड स्टील वर्क्स (जमशेदपुर ), बॉम्बे वस्त्र मिल ( इसमें 1,50,000 श्रमिक शामिल थे तथा यह पाँच महीने तक जारी रहा )  तथा बकिंघम कर्नाटक मिल में कि गई हड़ताल शामिल थे |

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