HCS History Exam Notes | Complete Study Notes | Online Preparation

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Peasant movement (1857-1947), Civil and Tribal uprising

Peasant movements (1857-1947)

During the war:

  • Because of a pro-War line adopted by the communists, the AIKS was split on communist and non-communist lines and many veteran leaders like Sahianand, Indulal Yagnik and N.G. Ranga left the sabha.
  • But the Kisan Sabha continued to work among the people. It did notable work during the famine of 1943′.

Post-war Phase:

Tebhaga Movement:

  • In Sept 1946, the Bengal Provincial Kisan Sabha gave a call to implement, through mass struggle, the Flood Commission recommendations of tebhaga.
  • Recommendations were: Two-thirds’ share to the bargardars, the share croppers also known as bagehasi or adhyar, instead of the one-half share.
  • The bargardars worked on lands rented from the jotedars.

Telangana Movement:

  • This was the biggest peasant guerilla war of modern Indian history affecting 3000 villages and 3 million population.
  • The princely state of Hyderabad under Asajahi Nizams was marked by a combination of religious-linguistic domination, total lack of political and civil liberties, grossest forms of forced exploitation by deshmukhs, jagirdars, doras (landlords) in forms of forced labour (vethi) and illegal exactions.

The Telangana movement had many positive achievement to its credit:

  • In the villages controlled by guerrillas, vethi and forced labour disappeared.
  • Agricultural wages were raised.
  • Illegally seized lands were restored.
  • Steps were taken to fix ceilings and redistribute lands.
  • Measures were taken to improve irrigation and fight cholera.

HCS History Exam Notes

कृषक आंदोलन (1857-1947 )

युद्ध के दौरान :

  • साम्यवादियों द्वारा युद्ध समर्थक धारा अपना लेने के कारण, अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS )    साम्यवादियों तथा गैर-साम्यवादियों में विभाजित हो गयी तथा कई वरिष्ठ नेता जैसे सहजानंद, इंदुलाल याग्निक, तथा एन.जी. रंगा इस सभा से अलग हो गए |
  • किंतु किसान सभा ने लोगों के बीच  कार्य करना जारी रखा | इसने 1943 के अकाल के दौरान उल्लेखनीय कार्य किया |

युद्धोत्तर काल :

तेभागा आंदोलन :

  • सितम्बर 1946 में, बंगाल प्रांतीय किसान सभा ने जन संघर्ष के माध्यम से  तेभागा के बाढ़ आयोग द्वारा की गयी सिफारिशों को लागू करने की माँग की |
  • इस आन्दोलन में मांग की गई कि फसल का दो-तिहाई हिस्सा बर्गदारों (किसानों) को दिया जाये ( बेघासी अथवा अध्यार भी कहा जाता है )
  • बर्गदार जोतदारों की भूमियों पर खेती करते थे |

तेलंगाना आंदोलन :

  • यह आधुनिक भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा कृषक गुरिल्ला युद्ध था जिसमें 3000 गाँव तथा 30 लाख आबादी प्रभावित हुई |
  • आसफ जाही निजामों के शासन वाली हैदराबाद की रियासत को धार्मिक-भाषाई प्रभुत्व से पहचाना जाता था, जहाँ राजनीतिक एवं नागरिक स्वतंत्रता का पूर्णतः अभाव था एवं देशमुखों, जागीरदारों, दोरा (भू-स्वामी ) द्वारा वेठी तथा अवैध मांग के रूप में किसानों का बलपूर्वक शोषण किया जाता था |

तेलंगाना आंदोलन की कई महत्वपूर्ण  उपलब्धियाँ इस प्रकार थी :-

  • गुरिल्ला छापामारों (वेठीयों) ने गावों पर नियन्त्रण स्थापित कर  लिया तथा बेगार प्रथा को समाप्त कर दिया|
  • खेतिहर किसानों की मजदूरियां बढ़ा दी गयीं |
  • अवैध रूप से कब्जा की गयी किसानों की जमीन लौटा दी गयी |
  • लगान को तय करने तथा भूमियों के पुनर्वितरण के लिए कई कदम उठाये गए |
  • हैजे को समाप्त  करने तथा सिंचाई सुविधाओं को बेहतर करने के लिए कई कदम उठाये गए |

Civil Rebellions and Tribal Uprisings(1757-1900)

Civil Rebellions and Tribal Uprising Bengal and Eastern India

The Sanyasi Revolt:

  • The coming of the British brought with it economic hardships symbolised by the massive famine of 1770, and a general callousness on the part of the Company’s stooges.
  • The restrictions  imposed on visits to holy places estranged the sanyasis.
  • The sanyasis retaliated by organising raids on the Company’s factories and state treasuries.

Chuar Uprising:

  • Place: Chuar aboriginal tribesmen of Midnapore district
  • Causes: Famine, enhanced land revenue demands and economic distress.

Ho Rising

  • Place: The Ho and Munda tribesmen of Chotanagpur
  • Causes: Dislocation in socio economic alienation of their land led to discontentment.

Kandh Uprising (1837-56):

  • Place: This covered Ghumsar, Chinaki-Medi, Kalahandi and Patna.
  • The Kandhs retaliated under Chakra Bisoi against the British efforts to put an end to the Kandh’s practice of human sacrifice (mariah) first through persuasion and later through force.

Ahom Revolt

  • The British had pledged to withdraw after the First Burma War (1824-26) from Assam.
  • But, after the war, instead of withdrawing, the British attempted to incorporate the Ahoms’ territories in the Company’s dominion.
  • This sparked off a rebellion in 1828 under the leadership of Gomdhar Konwar.

नागरिक तथा आदिवासी विद्रोह(1757-1900)

नागरिक विद्रोह तथा जनजातीय विद्रोह :

बंगाल तथा पूर्वी भारत

सन्यासी विद्रोह :

  • ब्रिटिशों के आने से 1770 के भारी अकाल के कारण आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा पूरा देश इस अकाल से जूझ रहा था रहा था एवं तत्कालीन अंग्रेजी सरकार की उपेक्षा ने इस आन्दोलन को ओर उग्र कर दिया   
  • सरकार ने सन्यासियों की धार्मिक स्थलों की यात्रा पर रोक लगा दी |
  • सन्यासियों ने इसका बदला कंपनी के कारखानों तथा राज्य कोषागारों पर धावा बोलकर लिया |

चुआड़ विद्रोह :

  • स्थान : मिदनापुर जिले के चुआड़ आदिवासी |
  • कारण : अकाल, भू-राजस्व की माँग में वृद्धि तथा आर्थिक संकट |

हो विद्रोह :

  • स्थान : छोटा नागपुर के हो एवं मुंडा आदिवासी |
  • कारण :   उनकी भूमि के सामाजिक आर्थिक हस्तांतरण में विस्थापन असंतोष की वजह बना |

खोंड विद्रोह (1837-56 ) :

  • स्थान : इस विद्रोह का विस्तार घुमसर, चीन की मेदी, कालाहांडी तथा पाटन तक था |
  • अंग्रेजों द्वारा खोंडो में मानव बलिदान (मारियाह ) की प्रथा को समाप्त करने के प्रयासों का बदला खोंडो ने चक्र बिसाई के नेतृत्व में पहले समझा-बुझाकर तथा फिर बलपूर्वक लिया |

अहोम विद्रोह :

  • अंग्रेजों ने प्रथम बर्मा युद्ध (1824-26)  के बाद अहोमों के राज्य असम से सेना की वापसी का वादा किया
  • किंतु, युद्ध के बाद, वापस लौटने के स्थान पर, अंग्रेजों ने अहोम के प्रदेश को कंपनी के साम्राज्य में मिलाने की कोशिश की |
  • कम्पनी ने  1828 में गोमधर कुंवर को यहाँ का राजा घोषित कर दिया और इस विद्रोह को चिंगारी दी

Civil Rebellions and Tribal Uprisings(1757-1900)

Koli Risings:

  • The Kolis living in the neighbourhood of Bhils rose up in rebellion against the Company’s rule in 1829, 1839 and again during 1844-48.
  • They resented the imposition of Company’s rule which brought with it large-scale unemployment for them and the dismantling of their forts.

Ramosi Risings:

  • The Ramosis, the hill tribes of the Western Ghats, had not reconciled to British rule and the British pattern of administration.
  • Again, there were eruptions in 1825-26 and the disturbances continued till 1829.
  • The disturbance occurred again in 1839 over deposition and banishment of Raja Pratap Singh of Satara, and disturbances erupted in 1840-41 also.

Kolhapur and Sawantwadi Revolts:

  • The Gadkari’s were a hereditary military class which was garrisoned in the Maratha forts.
  • These garrisons were disbanded during administrative reorganisation in Kolhapur state after 1844.

North India

Wahabi Movement:

  • Islamic revivalist movement
  • Founded by Syed Ahmed of Rai Bareilly who was inspired by the teachings of Abdul Wahab (1703-87) of Saudi Arabia and Shah Waliullah of Delhi.
  • Syed Ahmed condemned the western influence on Islam and advocated a return to pure Islam and, society as it was in the Arabia of the Prophet’s time.

नागरिक तथा आदिवासी विद्रोह(1757-1900)

कोलिय विद्रोह :

  • भीलों के पड़ोस में रहने वाले कोलिय लोगों ने 1829, 1839 तथा 1844-48 के दौरान कंपनी के शासन के खिलाफ विद्रोह किया |
  • उन्होंने कंपनी के शासन के खिलाफ असंतोष व्यक्त किया जो उनके लिए बेरोज़गारी तथा उनके दुर्गों का विध्वंस लेकर आई थी |

रामोसी विद्रोह :

  • पश्चिमी घाट में रहने वाले ‘रामोसी जाति’ के लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ  1822 ई. में अपने नेता सरदार ‘चित्तर सिंह’ के नेतृत्व में यह विद्रोह किया।
  • 1825-1826 ई. में भयंकर अकाल और अन्नाभाव के कारण यह विद्रोह फिर आरम्भ हो गया एवं 1829 तक चला |
  • सतारा के राजा प्रताप सिंह को अपदस्थ करने तथा उन्हें देश निकाला दे दिए जाने के कारण 1839 में  एकबार फिर से ये विद्रोह हुआ, तथा 1840-41 में भी यह विद्रोह भड़का |

कोल्हापुर तथा सावंतवाडी विद्रोह :

  • गडकरी वंशानुगत सैन्य वर्ग से थे जो मराठा दुर्गों में दुर्ग रक्षक थे |
  • 1844 के बाद कोल्हापुर राज्य के प्रशासनिक पुनर्गठन के दौरान इन दुर्ग रक्षकों को बर्खास्त कर दिया गया |

उत्तर भारत :

वहाबी आंदोलन :

  • इस्लाम पुनरुत्थानवादी आंदोलन |
  • इसकी शुरुआत राय बरेली के  सैयद अहमद के के द्वारा की गयी जो सऊदी अरब के अब्दुल वहाब तथा दिल्ली के शाह वलीउल्लाह  के विचारों  से प्रेरित थे |
  • सैयद अहमद ने इस्लाम पर पश्चिमी प्रभाव की निंदा की तथा वास्तविक इस्लाम एवं वैसे समाज की तरफ लौटने की अपील की जो पैगम्बर के समय सऊदी अरब में था |

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