Emergency Provisions Indian Polity Notes | UPSC IAS Exam 2018

Emergency Provisions Indian Polity Notes | UPSC IAS Exam 2018

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Emergency Provisions Indian Polity Notes | UPSC IAS Exam 2018

Emergency Provisions-

  • Art. 352-360 in Part XVII of the Constitution deals with the emergency provisions.
  • During an emergency situation, the federal structure is converted into a unitary one without a formal amendment of the Constitution.

3 kinds of emergencies:

    • Emergency due to war, external aggression or armed rebellion (Art. 352). This is known as ‘National Emergency’.
    • Emergency due to the failure of the constitutional machinery in the states (Art. 356). This is known as ‘President’s Rule’ or ‘State Emergency’ or ‘Constitutional Emergency’.
    • Financial Emergency due to a threat to the financial stability or credit of India (Art. 360).

आपातकालीन प्रावधान-

  • संविधान के सत्रहवें भाग के अनुच्छेद 352-360 में आपातकालीन प्रावधानों का जिक्र है |
  • एक आपातकालीन परिस्थिति के दौरान, एक संघीय व्यस्वस्था को एक एकात्मक प्रणाली में बिना एक औपचारिक सांविधानिक संशोधन के बदला जा सकता है | 

3 प्रकार के आपातकाल:

युद्ध, बाह्य आक्रमण और सशस्त्र विद्रोह के कारण आपातकाल ( अनुच्छेद 352 ) | इसे राष्ट्रीय आपातकाल” के नाम से भी जाना जाता है |

राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता के कारण आपातकाल ( अनुच्छेद 356 ) | इसे “राष्ट्रपति शासन” या ‘राज्य आपातकाल’ या ‘संवैधानिक आपातकाल’ के नाम से भी जाना जाता है |

भारत की वित्तीय स्थायित्व अथवा साख के खतरे के कारण वित्तीय आपातकाल ( अनुच्छेद 360 ) |

National Emergency-Grounds of Declaration-

  • Under Art. 352, the President can declare a national emergency even before the actual occurrence of war or external aggression or armed rebellion, if he is satisfied that there is an imminent danger.
  • When a national emergency is declared on the ground of ‘war’ or ‘external aggression’, it is known as ‘External Emergency’. If it is declared on the ground of ‘armed rebellion’, it is known as ‘Internal Emergency’.
  • A proclamation of national emergency may be applicable to the entire country or only a part of it. The 42nd Amendment Act, 1976 enabled the President to limit the operation of national emergency to a specific part of India.
  • The original Constitution mentioned the word ‘internal disturbance’. When the government led by Mrs. Indira Gandhi in 1975 declared Emergency on the ground of ‘internal disturbance’ after her election to Lok Sabha was declared void by Allahabad High Court, 44th Amendment Act substituted ‘internal disturbance’ with ‘armed rebellion’.
  • The President can proclaim a national emergency only after receiving a written recommendation from cabinet.
  • The declaration of national emergency is subjected to judicial review.
  • The national emergency has been proclaimed three times so far- external emergency in 1962 (India-China war) & in 1971 (India-Pakistan war) and internal emergency in 1975 by Indira government.

राष्ट्रीय आपातकाल-घोषणा के आधार –

  • अनुच्छेद 352 के तहत, राष्ट्रपति वास्तविक युद्ध या बाह्य आक्रमण या सशक्त विद्रोह से पहले भी राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर सकता है, यदि उसे यह प्रतीत हो कि हमारे देश में एक आसन्न खतरा है |
  • जब कोई राष्ट्रीय आपातकाल ‘युद्ध’ या ‘बाह्य आक्रमण’ के आधार पर घोषित किया जाता है तो इसे ‘बाह्य आपातकाल’ के नाम से जाना जाता है | यदि यह ‘सशक्त विद्रोह’ के आधार पर घोषित किया जाता है तो इसे ‘आंतरिक आपातकाल’ के नाम से जाना जाता है |
  • एक राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा पुरे देश में भी लागू हो सकती है और इसके सिर्फ एक भाग में भी | 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 ने संविधान राष्ट्रपति को यह शक्ति दी है कि वह राष्ट्रीय आपातकाल को भारत के किसी विशेष भाग पर लागू कर सकता है |
  • मूल संविधान ने “आंतरिक गड़बड़ी” शब्द का जिक्र किया था | जब 1975 में श्रीमती इंदिरा गाँधी की सरकार थी तो उस समय इलाहाबाद न्यायालय द्वारा उनके लोक सभा चुनाव को अवैध किये जाने पर “आंतरिक गड़बड़ी” के आधार पर आपातकाल की घोषणा की गई थी | 44वें संशोधन अधिनियम ने “आंतरिक गड़बड़ी” शब्द को “सशक्त विद्रोह” शब्द से बदल दिया |
  • सिर्फ कैबिनेट के लिखित सिफारिश प्राप्त होने के बाद राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर सकता है |
  • राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा न्यायिक समीक्षा के अधीन है |
  • अब तक तीन बार राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा हुई है – 1962 ( भारत-चीन युद्ध ) और 1971 ( भारत-पाकिस्तान युद्ध ) में बाह्य आपातकाल और 1975 में इंदिरा सरकार द्वारा आंतरिक आपातकाल |

Parliamentary Approval and Duration

  • Initially the Proclamation shall remain in force for 1 month.
  • During this time, the cabinet has to get it approved by the Parliament.
  • Every proclamation made under Art. 352 (except a Proclamation revoking the previous Proclamation) should be laid before each House of Parliament and must be approved by them with special majority.If Parliament fails to approve such a Proclamation, then it ceases to be in operation on the expiry of one month after the Proclamation is made.
  • If Parliament approves such a Proclamation, then it will be in force for 6 months from the date on which it was approved by Parliament, unless revoked earlier.
  • It can be approved by Parliament any number of times, but not beyond 6 months at a time.
  • If the Lok Sabha stands dissolved before giving approval to the Proclamation, then Rajya Sabha needs to approve it within 1 month and thereafter should be ratified by Lok Sabha within 30 days of the date on which the Lok Sabha first sits.

संसदीय मंजूरी और समयावधि-

  • प्रारंभ में घोषणा 1 माह के लिए लागू रहता है |
  • इस अवधि में कैबिनेट को इसके लिए संसद द्वारा मंजूरी लेनी होती है |
  • अनुच्छेद 352 के तहत की गई प्रत्येक घोषणा ( सिवाय उस घोषणा के जो पूर्व की घोषणा को जीवित करने के लिए की गई हो ) संसद के दोनों सदनों में पेश किया जाना चाहिए और विशेष बहुमत के साथ उनकी मंजूरी आवश्यक है |
  • यदि संसद उस उदघोषणा को अनुमति नहीं देता है तो यह आपातकाल घोषणा होने के एक माह के बाद समाप्त हो जाति है |
  • यदि संसद उदघोषणा को अनुमति देता है तब यह 6 माह के लिए संसद द्वारा अनुमति दी गई तिथि से लागू हो जाता है, जब तक कि इसे पहले ही समाप्त न कर दिया गया हो |
  • यह संसद द्वारा अनंत समय के लिए बढ़ाया जा सकता है, पर 6 माह से पहले नहीं |
  • यदि लोकसभा का विघटन उदघोषणा को मंजूरी मिलने से पहले हो जाता है तो राज्यसभा को इसे मंजूरी देना होता है और उसके बाद लोकसभा की पुनर्गठन के बाद पहली बैठक के 30 दिनों के अन्दर लोकसभा द्वारा इसे पुष्टि करना होता है | 

Revocation of Proclamation –

  • The Proclamation of emergency may be revoked by the President by another Proclamation at any time during its continuance. Such a proclamation need not be approved by the Parliament.
  • However, if the Lok Sabha disapproves a Proclamation of emergency or its continuance, the President is bound to revoke the emergency. If not less than 1/10th of the members of Lok Sabha issue a notice with the intention of disapproving an emergency, to the President if the Lok Sabha is not in session,or to the Speaker if the Lok Sabha is in session, a special sitting of the Lok Sabha shall be held within next 14 days for the purpose of considering such a resolution.

Resolution of disapproval vs. resolution approving continuance of a proclamation-

  • The first one is required to be passed by the Lok Sabha only, while the second one needs to be passed by both the Houses of Parliament.
  • The first one is to be adopted by a simple majority only, while the second one needs to be adopted by a special majority.

उदघोषणा की समाप्ति-

  • आपातकाल की उदघोषणा की समाप्ति राष्ट्रपति द्वारा इसके जारी रहने के दौरान किसी और उदघोषणा द्वारा की जा सकती है | ऐसी उदघोषणा को संसद की मजूरी की आवश्यकता नहीं होती है |
  • राष्ट्रपति को ऐसी आपातकाल को समाप्त कर देना आवश्यक हो जाता है जिसे लोकसभा द्वारा उसके उदघोषणा को या उसकी निरंतरता को मंजूरी नहीं मिलती है | यदि लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 1/10 सदस्य अध्यक्ष को, यदि लोक सभा सत्र में हो, या राष्ट्रपति को, यदि लोकसभा में सत्र में नहीं हो, लिखित रूप में आपातकाल की असहमति के लिए नोटिस दे तो 14 दिनों के भीतर इस प्रकार के संकल्प पर विचार-विमर्श के लिए लोकसभा की एक विशेष बैठक बुलाई जा सकती है |

उदघोषणा का अस्वीकार करने का प्रस्ताव बनाम उदघोषणा को जारी रखने का प्रस्ताव –

  • पहले वाले को केवल लोकसभा द्वारा पारित करने की आवश्यकता होती है जबकि दुसरे वाले को संसद के दोनों सदनों की मंजूरी आवश्यक होती है |
  • पहले को केवल एक साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है जबकि दुसरे को एक विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है | 

Changes made by 44th Amendment Act, 1978

  • It introduced the expression “armed rebellion” in place of “internal disturbances” as the third ground for proclamation of national emergency under Art. 352.
  • It made the approval of whole cabinet necessary which must be communicated to the President in writing to proclaim an emergency. Before, the President could proclaim an emergency on the oral advice tendered by the Prime Minister.
  • Before the act, a Proclamation issued by the President had to be approved by the Parliament within 2 months after the Proclamation is made. Now it must be approved within 1 month. Once approved, earlier it could remain in force for an indefinite period. But after the act, it can remain in force for 6 months only. Before, the approval needed a simple majority, but presently it needs a special majority.
  • Under Art. 358, before this act came into force, the Fundamental Rights enumerated under Art. 19 were automatically suspended. After this act, under Art. 358, Article 19 is suspended only when an emergency is declared on the basis of war or external aggression.
  • After this act, during an emergency, enforcement of the rights conferred by Art. 20 and 21 cannot be suspended.

44वें संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा किये गए परिवर्तन-

  • इसने अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल के तीसरे आधार “आंतरिक गड़बड़ी” शब्द को “सशक्त विद्रोह” शब्द से बदला |
  • इसने एक आपातकाल की उदघोषणा के लिए पुरे कैबिनेट की सहमति को आवश्यक कर दिया जो राष्ट्रपति को लिखित में दिया जाना है | प्रधान मंत्री द्वारा मौखिक सलाह पर राष्ट्रपति एक आपातकाल की उदघोषणा कर सकता है |
  • इस अधिनियम के पहले राष्ट्रपति द्वारा जारी किये गए आपातकाल को 2 माह के भीतर  संसद द्वारा मंजूरी लेना होता था | अब इसे 1 माह के भीतर मंजूरी लेना होता है | एक बार मंजूरी मिलने के बाद यह पहले एक अनिश्चित काल के लिए जारी रह सकता था | लेकिन अधिनियम के बाद यह सिर्फ 6 माह तक ही जारी रह सकता है | पहले इसे एक साधारण बहुमत द्वारा मंजूरी मिल जाती थी लेकिन अब इसे एक विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है |
  • अनुच्छेद 358के तहत इस अधिनियम के आने से पहले अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाले मूल अधिकार स्वतः निलंबित हो जाते थे | इस अधिनियम आने के बाद अनुच्छेद 19 का निलंबन सिर्फ युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर आपातकाल में ही किया जा सकता है |
  • इस अधिनियम के बाद एक आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा प्रदान किये गए अधिकारों का निलंबन नहीं हो सकता है | 

Effects of National Emergency –

The consequences of national emergency can be grouped into 3 categories:

  • Effect on the Centre-state relations-
      • Executive
      • Legislative
      • Financial
  • Effect on the life of Lok Sabha and State assembly
  • Effect on the Fundamental Rights-
    • Suspension of Fundamental Rights under Art. 19
    • Suspension of other Fundamental Rights 

Executive-

  • While a Proclamation of emergency is in operation, the President is empowered to issue directions to States in the manner in which their executive power is to be exercised.
  • In normal times, the President has the power to give directions to States only on some matters like maintenance of communication, protection of railways etc.
  • But during the operation of emergency, he can issue directions to States on all matters. 

Legislative-

  • When a Proclamation of emergency is in operation, Parliament can enact laws on subjects under the State List, which become inoperative 6 months after the emergency has ceased to operate.
  • The Legislature of State are not suspended, but the distribution of legislative powers between the Union and the State is suspended for the duration of the emergency.
  • During emergency, President can issue ordinances on the state subjects also, if Parliament is not in session. 

Financial-

  • The President may, when a proclamation of emergency is in operation, modify the provisions of the Constitution relating to the distribution of financial resources between the Centre and the states (Art. 269-279).
  • Such an order of the President shall not have effect beyond the financial year in which the Proclamation of the emergency ceases to be operative.
  • The order of President is subject to the approval of Parliament. Parliament can also levy any tax which ordinarily falls in the State List (Art. 250). 

राष्ट्रीय आपातकाल के प्रभाव –

  • राष्ट्रीय आपातकाल के प्रभावों को 3 श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता हैं:
  • केंद्र-राज्य संबंधों पर प्रभाव –
    • कार्यपालक
    • विधायी
    • वित्तीय
  • लोकसभा और राज्य विधानसभा के कार्यकाल पर प्रभाव
  • मूल अधिकारों पर प्रभाव-
    • अनुच्छेद 19 के तहत मूल अधिकारों का निलंबन
    • अन्य मूल अधिकारों का निलंबन 

कार्यपालक-

  • एक आपातकाल के समय राष्ट्रपति के पास इस बात की शक्ति रहती है कि वह राज्यों को उनके कार्यकारी शक्तियों को सञ्चालन करने के तरीकों का निर्देश दे |
  • सामान्य परिस्थितियों में राष्ट्रपति के पास राज्य को कुछ ही मामलों जैसे संचार, रेलवे की सुरक्षा इत्यादि पर ही निर्देश दे सकता है |
  • लेकिन आपातकाल के समय वह राज्यों को सभी मामलों पर निर्देश जारी कर सकता है | 

विधायी-

  • आपातकाल के समय संसद राज्य सूची के विषय पर कानूनों को बना सकता है जो 6 माह बाद आपातकाल के ख़त्म होने के बाद निष्क्रिय हो जाता है |
  • राज्यों के विधान मंडल निलंबित नहीं होता लेकिन केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण आपातकाल के समय निलंबित हो जाता है |
  • आपातकाल के समय यदि संसद सत्र में नहीं हो तो राष्ट्रपति राज्यों के विषय पर अध्यादेशों को जारी कर सकता है | 

वित्तीय-

  • आपातकाल के समय यदि राष्ट्रपति चाहे तो वह केंद्र और राज्य के बीच वित्तीय स्रोतों के वितरण सम्बन्धी संविधान के प्रावधानों को संशोधित कर सकता है ( अनुच्छेद 269-279 ) |
  • राष्ट्रपति की ऐसे किसी आदेश का प्रभाव उस वित्तीय वर्ष के बाद नहीं होगा जिसमें आपातकाल निष्क्रिय हो जाता है |
  • राष्ट्रपति का आदेश संसद के मंजूरी के अधीन होता है | संसद राज्य सूची के करों को भी लगा सकता है ( अनुच्छेद 250 )

Effect on the Life of the Lok Sabha and State Assembly-

  • Parliament is empowered to extend by law, the life of the Lok Sabha beyond the 5 year term for a period not exceeding 1 year at a time, but in any case not exceeding 6 months after the Proclamation of emergency has ceased to be in operation.
  • The life of State Legislative Assemblies can also be extended by law by Parliament in a similar manner (Art. 172).

Effect on the Fundamental Rights-

Suspension of Fundamental Rights under Art. 19-

  • According to Art. 358, when a proclamation of national emergency is made, the six Fundamental Rights under Art. 19 are automatically suspended.
  • The State is freed from the limitations imposed by Art. 19.
  • The citizens cannot move the courts for the enforcement of Fundamental Rights under Art. 19.

Suspension of other Fundamental Rights-

  • The President, under Art. 359, may by order, suspend the operation of any of the other Fundamental Rights when an emergency declared on grounds of war or external aggression or armed rebellion is in force.
  • Such order has to be laid for approval before each house of the Parliament.
  • The Fundamental Rights guaranteed under Art. 20 (Protection in respect of conviction of offences) and Art. 21 (Right to life and personal liberty) cannot be suspended.

लोकसभा और राज्य विधानसभा के कार्यकाल पर प्रभाव-

  • संसद के पास लोकसभा के कार्यकाल को 5 साल से आगे करने की शक्ति है जो कि एक समय में एक वर्ष तक का हो सकता है पर आपातकाल के ख़त्म होने के बाद किसी भी सूरत में इसे 6 माह से ज्यादा नहीं बढाया जा सकता है |
  • राज्यों के विधानसभाओं के कार्यकाल को भी संसद द्वारा कानून द्वारा समान तरीके से बढाया जा सकता है ( अनुच्छेद 172 ) | 

मूल अधिकारों पर प्रभाव-

अनुच्छेद 19 के तहत मूल अधिकारों का निलंबन-

  • अनुच्छेद 358 के अनुसार जब एक राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की जाती है तो अनुच्छेद 19 के तहत दिए गए 6 मूल अधिकार स्वतः निलंबित हो जाते हैं |
  • राज्य अनुच्छेद 19 के द्वारा लगाए गए सीमाओं से आजाद हो जाते हैं | 
  • नागरिक अनुच्छेद 19 के तहत मूल अधिकारों के लागू करने के लिए न्यायालय का रुख नहीं कर सकते|

अन्य मूल अधिकारों का निलंबन-

  • अनुच्छेद 359 के तहत राष्ट्रपति चाहे तो युद्ध या बाह्य आक्रमण या सशक्त विद्रोह के आधार पर लागू आपातकाल के समय एनी मूल अधिकारों में से किसी को भी निलंबित करने का आदेश दे सकता है |
  • ऐसे किसी आदेश को संसद के प्रत्येक सदन में मंजूरी के लिए पेश किया जाता है |
  • अनुच्छेद 20 के तहत ( अपराध के आरोप के सम्बन्ध में सरंक्षण ) और अनुच्छेद 21 के तहत ( जीवन और व्यतिगत आजादी का अधिकार ) गारंटी किये गए मूल अधिकार को निलंबित नहीं किया जा सकता है | 

 

 

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